शुक्रवार, 3 मार्च 2017

सच्चे कवि शमशेर सम्मान से सम्मानित हुए

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Friday, March 3, 2017

असली कवियों को मिला शमशेर सम्मान

मौजूदा दौर में जब की तमाम भाषाओं के साहित्यिक जगत में दिए जाने वाले सम्मान और पुरस्कार में अधिकतर दागदार हो चुके हैं और इनका लेनदेन पूरी तरह से साहित्यक माफियाओं द्वारा जुगाड़ तंत्र पर आधारित हो गया है ऐसे भी अभी भी कुछ ऐसे सम्मान और पुरस्कार हैं जो काजल की कोठरी में भी अपनी अस्मिता को न सिर्फ बनाए हुए हैं बल्कि तमाम सच्चे साहित्यकार अपने साहित्य की योगदान से उसे सुरक्षित भी किए हैं इसी सिलसिले में हिंदी के महत्वपूर्ण कवि शमशेर बहादुर सिंह स्मृति सम्मान अपनी विश्वसनीयता को आज भी बनाए हुए हैं यह बहुत प्रसन्नता की बात है की सारी जद्दोजहद के बाद यह सम्मान वर्ष 2015 और 2016 के अंतर्गत हिंदी के वरिष्ठ कवि हरीश चंद्र पांडे पंकज राग एकांत श्रीवास्तव और यतींद्र मिश्र को दिया गया है इसमें कोई संदेह नहीं कि ये कवि उन महत्वपूर्ण कवियों में हैं जिनकी कविताओं को आज के दौर की महत्वपूर्ण कविता धारा की पहचान के रूप में शुमार किया जाता है इनकी कविताएं अच्छी कविताओं के प्रतिमान के रूप में देखी जा रही है इससे बड़ी बात यह है की बहुत बड़ी संख्या में इन कवियों को विशेषण सामान्य पाठकों का प्यार मिला है यह बात इसलिए भी उल्लेखनीय है क्योंकि आज के दौर के कवियों पर यह आरोप लगता रहा है कि अधिकतर कवि अपने मित्र कवियों के लिए ही कविताएं लिख रहे हैं और उन्हें आम पाठकों की कोई चिंता नहीं है यह अलग बात है कि शमशेर स्वयं जनता के कवि नहीं रहे उनकी कविताओं को बुद्धिवादी कवियों ने ही पहचाना और सराहा परंतु इसमें दो राय नहीं कि शमशेर की कविताएं कविता समय की विशेष पहचान के रुप में आज साहित्य में मौजूद हैं और विचार कविता की प्रतिनिधि कविताएं हैं इसमें दो राय नहीं कि चारों कवि शमशेर सम्मान के पूरी तरह हकदार हैं हिंदी साहित्य जगत इन कवियों के चयन पर अपने विश्वास की मुहर लगा रहा है गौरतलब है कि शमशेर सम्मान हरीश चंद्र पांडे के कविता संकलन कविता के लिए लेखक पंकज राग को सर्जनात्मक गद्य के लिए एकांत श्रीवास्तव को कविता के लिए तथा यतींद्र मित्र को उनके सृजनातमक लेखन के लिए दिया गया है इन चारों कवियों की कविताएं और उनका लेखन मनुष्य और मनुष्यता में लगातार हो रहे क्षरण रेखांकित करते हैं और अपने ढंग से इसे देखने और बदलने का हौसला देते हैं विचार के स्तर पर यह चारों कवि और लेखक बेहद पठनीय है और सबसे बड़ी बात यह है की सामान्य पाठ को द्वारा स्वीकार्य जा रहे हैं इनका लेखन बुद्धि विलास नहीं है बल्कि समाज के प्रति एक जिम्मेदारी से भरा हुआ लेखन है अब तक यह सम्मान मंगलेश डबराल राजेश जोशी विजय कुमार अरुण कमल नरेंद्र जैन लीलाधर मंडलोई सुदीप बनर्जी वीरेंद्र डंगवाल ज्ञानरंजन अरविंद जैन राजेंद्र शर्मा विष्णु नागर विनोद दास पुष्पिता नर्मदा प्रसाद उपाध्याय मनमोहन महेश कटारे इब्बार रब्बी सुधीश पचौरी कर्मेंदु शिशिर पंकज सिंह अभिमन्यु अनत बद्रीनारायण विश्वनाथ प्रसाद त्रिपाठी कमला प्रसाद पांडे नरेश सक्सेना प्रभात त्रिपाठी ओम थानवी ऋतुराज और अनामिका को दिया जा चुका है शमशीर सम्मान के लिए कवियों और लेखकों का चयन देश के अनेक जाने माने साहित्यकारों की समिति करती है इस बार शमशेर सम्मान की निर्णायक समिति में लीलाधर मंडलोई नरेश सक्सेना और बद्रीनारायण भी शामिल रहे ।
इलाहाबाद से शमशेर सम्मान  हरीश चंद्र पांडे को दिए जाने पर इलाहाबाद के साहित्यिक जगत में खुशी की लहर है हरीश चंद्र पांडे उन कवियों में हैं जो कम लिखते हैं पर जब लिखते हैं तब सर्व स्वीकार होता है समकालीन मुक्तिबोध चारों वरिष्ठ कवियों और लेखकों को दिए जाने वाले सम्मान को साहित्य जगत का सम्मान मानता है और उन्हें इस सफलता के लिए हृदय से बधाई देता है ।
- अजामिल

** कवियों और लेखकों के सभी चित्र वरिष्ठ कवि संतोष चतुर्वेदी के सौजन्य से


बुधवार, 1 मार्च 2017

हिंदी रंगमंच पर दर्शकों की कमी / कोई रंगकर्मी दूसरे रंगकर्मी की प्रस्तुति क्यों नहीं देखता

कर्णभारम ,इन्दवती नाट्य समिति सीधी की प्रस्तुति
सभी चित्रों के छायाकार विकास चौहान
कला समीक्षक अजामिल

उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र में आयोजित दो दिवसीय नाट्य उत्सव में इंद्रवती नाते समिति सीधी छत्तीसगढ़ के कलाकारों ने लोकरंग में डूबी कर्णभारम् की अत्यंत मर्मस्पर्शी और अपने देश की संस्कृति का गहरा एहसास कराती प्रस्तुति की इस लोकनाट्य मैं कर्ण की भूमिका सहित सभी कलाकारों ने अपने शानदार अभिनय से सब का मन मोह लिया लोक नाट्य मैं नदी के प्रवाह जैसी गति थी हृदय में उतर जाने वाला संगीत सबको बांधे हुए था और सभी कलाकार अपनी भूमिकाओं को पूरी शिद्दत के साथ जी रहे थे वेशभूषा अत्यंत खूबसूरत थी और कलाकार भी अपनी भूमिका के अनुसार सुंदर और आंखों को लुभा लेने वाले थे 800 किलोमीटर की दूरी तय करके छत्तीसगढ़ के यह कलाकार इलाहाबाद इसलिए आए थे कि उन्हें यह मालूम था की रंगमंच के क्षेत्र में इलाहाबाद एक सर्वस्वीकृत मानक है पर यहां आने पर छत्तीसगढ़ के उन मेहमान रंगकर्मियों को उस समय बहुत दुख हुआ जब प्रेक्षागृह में 15 और 20 लोग भी की प्रस्तुति को देखने के लिए उपस्थित नहीं थे लोग क्यों नहीं आए यह पूछने का साहस ना उन कलाकारों में था ना इसका कारण बताने की की हिम्मत इलाहाबाद के किसी रंगकर्मी में थी कौन बताता इलाहाबाद में रंगकर्मी ही एक दूसरे की नाट्य प्रस्तुतियां देखने के लिए नहीं जाते शायद यही वजह है कि इलाहाबाद के रंगमंच पर सब कुछ है परंतु इस सब कुछ को सहने वाले दर्शक नहीं है जिन लोगों ने छत्तीसगढ़ के उन बेहतरीन कलाकारों की प्रस्तुति कर्णभारम् नहीं देखी उन्होंने एक बहुत अच्छी प्रस्तुति है देखने और उससे कुछ सीखने का अवसर खो दिया रंगकर्मी यदि चाहते हैं कि उनकी प्रस्तुतियों में नए रंगकर्मी छूटते रहे तो इसके लिए आवश्यक है कि पहले वह एक दूसरे की प्रस्तुति को देखने और सराहने की आदत डालें दर्शक सच्चे दर्शक आखिर उनका ही तो अनुकरण करेंगे रंगकर्मियों का भरोसा दर्शकों का भरोसा होगा । कुछ वरिष्ठ कर्मियों को इस बात की शिकायत थी कि यह प्रस्तुति कर दी गई और प्रचार-प्रसार कर इसकी सूचना किसी को नहीं दी गई दर्शकों के संकट का एक बड़ा कारण यह भी है कि दर्शकों तक अच्छी प्रस्तुतियों की सूचना नहीं पहुंच पाती ऐसी स्थिति में कोई कैसे पहुंच सकता है रंग संस्थाएं यदि किसी प्रस्तुति के प्रचार-प्रसार को अनावश्यक मानती है तो क्या इससे यह साबित नहीं होता कि दर्शक भी उनके लिए कोई महत्व नहीं रखता अनुदान मैं इतना बड़ा बजट संस्कृति मंत्रालय से हासिल करने के बाद भी उसका कुछ हिस्सा प्रस्तुति के प्रचार-प्रसार में क्यों नहीं खर्च किया जाता जाहिर है कि सारा दोष रंगकर्मियों और दर्शकों नहीं दिया जा सकता प्रस्तुति के आयोजक भी इसके लिए जिम्मेदार हैं शत-प्रतिशत यह भी नहीं है कि रंगकर्मी दूसरों के नाटक नहीं देखना चाहते परंतु इसके लिए सूचना का प्रसारण आवश्यक है हम उन रंगकर्मियों की बात नहीं कर रहे हैं जो हर प्रस्तुति में प्रेक्षागृह तक जाते अवश्य है पर नाटक को पूरे मन से बैठकर देखने के जगह प्रेक्षागृह के बाहर खड़े होकर प्रस्तुति देखे बगैर उसकी चर्चा में समय जाया करते हैं नाटक को संभवता ऐसे रंगकर्मियों की आवश्यकता भी नहीं है ।
रंग समीक्षक अजामिल
इस विशेष लोकरंग प्रस्तुति के चित्रों का छायांकन वरिष्ठ छायादार विकास चौहान ने किया है ।

मंगलवार, 28 फ़रवरी 2017

कार्यक्रमों की विलंबित लय

कल कार्यक्रम शाम 6:00 बजे आरंभ होना था लेकिन 6:00 बजे शाम को कार्यक्रम स्थल पर कुर्सियां व्यवस्थित की जा रही थी फूल मालाओं से मंच को सुसज्जित किए जाने की जद्दोजहद चल रही थी लोग आराम से धीरे धीरे मंच पर दरी चादर बिछा रहे थे पता चला कि कार्यक्रम के अध्यक्ष और मुख्य अतिथि को कुछ समय लगेगा आने में समय लगा और अध्यक्ष और मुख्य अतिथि कार्यक्रम के निर्धारित समय से केवल ढाई घंटा लेट आए इस बीच लगभग 200 दर्शक पंडाल में आ कर बैठ चुके थे कार्यक्रम मैं मजे का विलंब हो चुका था दुख तब हुआ जब अध्यक्ष और मुख्य अतिथि ने विलंब से आने के अपराध के लिए दशकों से न कोई क्षमा मांगी और ना कोई अफसोस व्यक्त किया बल्कि उनके व्यवहार से ऐसा लग रहा था जैसे उन्हें विलंब से आने का कोई अफसोस भी नहीं है शायद यह दोनों देर से आने को अपना विशेष अधिकार मांग रहे थे जबकि सच यह है कि उन्होंने अपनी विलंब से आने की गलती के चलते पंडाल में इंतजार करते 200 लोगों के लगभग 400 घंटों को बर्बाद कर दिया था 400 घंटे कम नहीं होते इतने समय में लोग अपने कितनी जरूरी काम निपट आ चुके होते पर उन्होंने पंडाल के नीचे बैठ कर यह वक्त केवल और केवल बर्बाद किया अध्यक्ष और मुख्य अतिथि ने कार्यक्रम में देर से आकर कार्यक्रम के आयोजकों को एक अनावश्यक तनाव में रखा आयोजक बार बार फोन करके उनसे आने का आग्रह करते रहे और अध्यक्ष और मुख्य अतिथि थे कि बार-बार यही कहते रहे बस घर से निकल रहा हूं रास्ते में हूं 5 मिनट में पहुंच रहा हूं यह सब कितना सच था कितना झूठ कोई नहीं जानता पर उन्होंने कार्यक्रम के नैसर्गिक उत्साह को संकट में जरूर बनाए रखा कार्यक्रमों को देर से शुरू करने की परंपरा आज एक लाइलाज बीमारी हो गई है शायद ही कोई ऐसी संस्था हो जो अपने कार्यक्रम समय से शुरू करती हो यह बात अध्यक्ष या मुख्य अतिथि तक ही सीमित नहीं है दर्शक भी समय से नहीं आते उन्हें मालूम है कि भारतीय परंपरा के अनुसार कार्यक्रम निर्धारित समय पर कभी शुरू नहीं होगा आधे घंटे से लेकर 2 घंटे तक इस में विलंब होना ही है इसलिए वह पहले से ही निर्धारित समय से घंटे आधे घंटे देर से घर से निकलता है कोई भी नाटक देखने चाहिए कभी समय से आरंभ नहीं होता इस देश में तो सरकारी गैर सरकारी कार्यालयों में भी कर्मचारी तो 2 घंटे देर से पहुंचता है और तब कार्यालयों में कामकाज शुरु होता है बड़े अधिकारी कभी समय से दफ्तर नहीं पहुंचते राजनीतिक रैलियों में लल्लू पंजू नेताओं से लेकर प्रधानमंत्री तक चार चार घंटे लेट पहुंचते हैं और कार्यक्रम स्थल पर मौजूद हैं लाखों लोगों के लाखों घंटे सिर्फ प्रतीक्षा में बर्बाद करवा देते हैं सच तो यह है कि हमारे यहां यह सोचने का रिवाज नहीं है कि समय की सीमा में ही जरूरी काम निपटाए जाते हैं विलंब करने पर सिर्फ समय का ही नुकसान नहीं होता बल्कि काम का भी नुकसान होता है और इस नुकसान की भरपाई आगे करनी पड़ती है तब उसके लिए हमें नए समय की आवश्यकता होती है और जो मानवीय उर्जा बर्बाद हुई उसकी भरपाई तो कभी संभव ही नहीं होती कार्यक्रम को भारतीय समय के अनुसार विलंब से शुरू करने की आदत पूरे देश का बड़ा नुकसान है इसे बदलने की आवश्यकता है कार्यक्रम सही समय से शुरू होने चाहिए इसके लिए जो भी संभव प्रयास हो उसे किया जाना चाहिए देश की जो भी व्यवस्था अपने कार्यक्रम समय से आरंभ करती हैं उनसे सबक लेने की आवश्यकता है कार्यक्रम समय से शुरू होना चाहिए किसी भी औपचारिकता के लिए दर्शकों और श्रोता का समय पर बात करने का किसी भी आयोजक को कोई अधिकार नहीं है ।
**ब्लॉग खरी बात में अजामिल की टिप्पणी

शुक्रवार, 3 जून 2016

नाना पाटेकर की दो टूक

.किसी व्यक्ति  की   "निजी उपलब्धि " को  देश के प्रति जिम्मेदारी से  कैसे जोड़ सकते है...??.....सचिन तेंदुलकर या अमिताभ बच्चन जैसे प्रतिभाशाली लोगो ने निसंदेह विश्व में देश का सम्मान बढाया ,.इसमें कोई दो मत नही ,..लेकिन इन्होने अभिनय या क्रिकेट की शुरुवात  " देश की सेवा  की भावना से ओत प्रोत हो कर की थी  इस बात  पे  मुझे  संशय  है  |  सचिन ने  जब 4 साल की उम्र में बल्ला थामा या अमिताभ ने मुंबई आकर  फिल्मो में काम  पाने  स्टूडियो के चक्कर लगाने शुरू किये तो मुझे  इसमें .." देश सेवा "... का जज्बा नही अपनी  रूचि  के  लिए  समर्पण  ज्यादा  दिखता है  |आप मुझसे असहमत हो सकते है | मेरे हिसाब से  क्रिकेट  और फिल्म  इनके गहरी रूचि का विषय था न की देशसेवा .|...इन्होने पूरी तन्मयता से अपने क्षेत्र में अनथक परिश्रम किया और अद्भुत उदाहरण पेश करते हुए सफलता के माउंट एवेरेस्ट पर पहुंचे..|. मैं फिर दोहराना चाहती हूँ.,.....निसंदेह  हम उनकी काबिलियत की इज़्ज़त करते है .....लेकिन इनकी निजी उपलब्धि को   'देशसेवा"  जैसे कीमती  और त्यागी शब्दों से जुड़ने में अभी लंबा सफ़र तय करना होगा .| सचिन तेंदुलकर और अमिताभ बच्चन बेहद शालीन , गंभीर  , व्यवहारिक बुद्धि के व्यवसायिक सफल  इंसान है |  उनके निकट के मित्र अनिल अम्बानी के n.g.o. को भी ये दोनों सपोर्ट कर रहे है जिसमे सचिन ने एक गाँव में बिजली की व्यवस्था का जिम्मा अनिल अम्बानी के साथ लिया है | सचिन तेंदुलकर कांग्रेस द्वारा मनोनित महाराष्ट्र से राज्यसभा सदस्य  है | राज्यसभा सदस्य की 50,000 rs प्रतिमाह वेतन और 15000 प्रतिमाह कार्यालय के रख रखाव के लिए अलग से  |  अभी कुछ दिनों पहले राज्यसभा ने अनुपस्थित सदस्यों की लिस्ट जारी की गई जिसमे पिछले 4 सालो में सचिन को जब न्यूनतम  हाजरी होने से सदस्यता खत्म होने का नोटिस दिया तब वो एक दिन के लिए वहाँ पहुंचे | अपने क्षेत्र में खर्च किये जाने के लिए प्रत्येक राज्यसभा सदस्य को जो  60 लाख सरकारी फण्ड जनकल्याण के लिए  दिए जाते है उसमे से सचिन द्वारा  क्षीण अंश ही की निकासी हुई |   सचिन का कार्यकाल मात्र एक वर्ष रह गया है  , शायद अब वो कुछ वक़्त निकाले .| पिछले लगातार तीन वर्षो से महाराष्ट्र में भीषण सूखा देखते हुए भी उन्हें उस राशि को निकाल जन कल्याण में लगाने की फुरसत नही मिली जो एक मनोनीत सदस्य को अपने क्षेत्र में जनता पे खर्च करने मिलती है |एक कृषि प्रधान देश जहाँ जय जवान जय किसान के नारों से आकाश गुंजायमान है  ,आज उस देश के अन्नदाताओ की  टूटती साँसों को हम सबको मिलकर सम्हालने की जरुरत है  | निश्चित रूप से सचिन  एक व्यस्त क्रिकेटर , bcci से  प्रति  मैच  सबसे  ज्यादा  पैसे  प्राप्त  करने  वाले सफल वेतनप्राप्त बल्लेबाज़ ,  सफल होटल व्यसायी और विभिन्न कम्पनियो के लोकप्रिय ब्रांड अम्बेसडर और सर्वाधिक आय प्राप्त करने वाले पेड कोच  है रिटायरमेंट के बाद भी | लेकिन राज्यसभा  सदस्य के लिए चुना जाना एक नागरिक सम्मान होता है । देश आपको देश से जुडी समस्याओं के प्रति जागरूक , दायित्व के लिए जिम्मेदार और काबिल  नागरिक समझता है ,आप पे भरोसा करता है के आप अपनी ऊर्जा , हुनर ,लोकप्रियता और कीमती वक़्त का कुछ  हिस्सा  राज्यसभा सदस्य के रूप में देश को समर्पित  करेंगे | मुझे लगता है के यदि वो अपने कार्यक्रमों में व्यस्त रहते है तो इस सदस्यता के लिए नम्रता से मना कर देते तो बेहतर होता | फ़िल्म अभिनेत्री रेखा ,  महान पार्श्व गायिका लता  मंगेशकर जी जैसे नामी  व्यस्त  चेहरों  को राजनैतिक पार्टी  वोट  बैंक  बटोरने  की गरज से राज्यसभा  भेजती  है , क्या ये नेता अपने बच्चे को किसी ऐसे शिक्षक के हाथ में सौपेंगे जो पढ़ाने के लिए क्लास में ही न आये ????? व्यक्तिगत लाभ से समझौता नही फिर देशहित से क्यू ????  | इन मशहूर हस्तियों के पास देश  की  समस्याओं  से  जुड़ने का  वक़्त  नही  है  तो  निश्चित  रूप से देशहित के  मद्देनज़र राज्यसभा सदस्यता देना एक  गलत  फैसला  है |  राज्यसभा   के  चयन को  पूरी  गंभीरता  से न  लेने  और  जमीनी  मुद्दों  से  सरोकार न  रखने  वालो  को हम संजीदा कलाकार  और  वैश्विक क्रिकेटर  के  रूप  में  तो  सम्मान  देते  है  लेकिन  जब  देश का मामला हो तो अपने उत्तर दायित्व  को हलके  में लेने और सम्मानित राज्यसभा की गरिमा को ताक पे रख अपने व्यवसाय को प्राथमिकता देने  पर  हम  प्रश्नचिन्ह  भी  लगायेंगे |  हर सफल व्यक्ति को  महानता का  तमगा पहनाना गलत होगा.|..इस लेख को पढ़ने वाले दो चार बुद्धिजीवी जरूर निकलेंगे  जिन्हें  राज्यसभा में अनुपस्थिति का विरोध इन क्रिकेटर या अभिनेता का अपमान लगता है , ये उनकी श्रद्धा का विषय है । यदि कामयाब लोग अपनी अद्भुत योग्यता को किसी भी तरह से देश सेवा कर सार्वजनिक जीवन में एक मिसाल पेश करते तब वो  "जिम्मेदार जनसेवक "  कहलाने के सचमुच हक़दार है । राज्यसभा में  चर्चित नामो के चस्पा कुर्सियों को  लगातार खाली देखना असहनीय है |  महत्वपूर्ण , ,संभावनाओं से भरी सार्थक  देशहित में  होने  वाली  नीतियों की  बहस में  पूरे साल  वक़्त  न दे  अनुपस्थित रह देशसेवा के दुर्लभ अवसर का उपयोग नही कर इस तरह की बेरुखी से  दुःख होता है । .......अच्छे कामो की खुश्बू धीरे धीरे ही सही फ़ैलती तो जरुर  है |
... बेतरतीब दाढ़ी वाले ,एक बेहद साधारण से चेहरे वाले असाधारण इंसान ..".नाना पाटेकर " ....जिनका नाम लेते ही उनके चेहरे से पहले जो डायलाग  याद आता है..."ये हिन्दू का खून ये मुसलमान का खून "  just kidding.............. अभिनय के क्षेत्र में वो किसी महानायक से कम नही ...लेकिन अभी जिस नेक कार्य से वो चर्चा में आये है वो अद्भुत और अविश्वसनीय है ...|.. उन्होंने अपने अकेले के दम पर 5000 से अधिक ऐसे किसान परिवारों को अपने घर से 15000 रूपये आर्थिक सहायता की जिनके किसान मुखिया ने सूखे से व्याकुल हो आत्महत्या कर ली .|...आप में से शायद कुछ लोगो ने न्यूज़ में देखा हो..नाना जब मृतक  किसान  परिवारों  को  चेक वितरण कर रहे थे ,.कुछ युवा लडको का समूह मोबाइल पे उनकी चेक देती फोटोज लेने लगा..| नाना उन्हें खदेड़ते हुए बिलकुल नाना वाले अंदाज़ में बिफर पड़े .....यहाँ फंक्शन हो रहा है क्या......? ?........ये 5000 लोगो की मय्यत है और तुम जैसे लोग  फोटोज ले रहे हो .| .  मुझे उनकी तिरंगा वाली  सरफिरा, अक्खड़ , सनकी अदा देख  हंसी छुट गयी...लेकिन अगले पांच मिनट में स्टेज पर जो हुआ हर देखने वाले की आँखे नम हो गयी  |..बेहद कम उम्र की  19  या  20 साल  की  नाज़ुक  , गरीब किसान  की  ग्रामीण विधवा कापते हाथो से चेक लेते हुए खुद को सम्हाल न पायी..| चेक  पकड़ते  ही  स्टेज पे   रोते  हुए  कांपने लगी |...पितातुल्य हिम्मत  बंधाते नाना खुद भी भावुक हो गए...| हज़ारो  किसान  परिवार  जिन्होंने  सूखे   से अपने  घर  के  मुखिया  को खोया और  भुखमरी  के  कगार  पर  खड़े  है |...एक किसान की आपबीती से दिल दहल गया ..जो 30 km वापस अपने गाव पैदल जाने वाला था जिसके पास बस किराए के 30 रुपए न थे...|..नाना ने  अपनी जमा पूंजी से 15000 -15000 rs  का चेक प्रत्येक परिवार को स्टेज पर ना बुला उस सभा गृह में  उन 5000 सीट्स पर जा दोनों हाथो से झुक कर नम आँखों से विधवाओ .,बच्चो ..पिता और उन माताओं  को  वितरित किये | अपने जीवन  की सम्पूर्ण जमा पूंजी का  दान कर  नाना को समझ आया के समस्या उनके अनुमान और आर्थिक  हैसियत से ज्यादा विकराल  है |. एकला चलो  रे से  शुरू  हुआ ये  सफर  धीरे धीरे ..." नाम "... संस्था के रूप में सामने  आया है और  दाहिने  हाथ  के  रूप  में  मराठी   फिल्मकार   मकरंद अनासपुरे  का  साथ  मिला  । यहाँ एक नाम "अक्षय कुमार" का जोड़ना जरुरी है जो तुरंत एक करोड़ दान करने वाले पहले फिल्मी कलाकार है., दूसरा नाम आमिर खान का आता  है जिन्होंने नाम को सपोर्ट करते हुए दो सूखाग्रस्त गाँव गोद लिए है  |  "नाम"  नाना  द्वारा  शुरू  की  गयी  सूखा पीड़ित  किसानो  के  लिए  आरम्भ  की हुई  गैर  सरकारी संस्था है | .मैंने अभी अभी न्यूज़ में  नाना को जमीन पर बैठ बेहद साधारण से अपने घर से अपील करते देखा...कोई किसान आत्महत्या ना करे मेरे घर  की आखरी पाई भी दान कर दूंगा , मेरी आंखरी सांस तक मैं  किसानो के साथ हूँ .। आप मेरे पास आ जाओ । मैं आपकी सहायता कर कोई अहसान नही कर रहा | ये मेरा देश है और आप किसानो का देश पे बहुत क़र्ज़ है |मैं तो कुछ अंश लौटाने की कोशिश कर रहा हूँ | देशवासियों को भी ग्लास में आधा पानी पीने के बाद आधा फेकते समय जरुर सोचना चाहिए की इस आधे ग्लास पानी के लिए आपके ही देश के एक हिस्से में लोग जान दे और जान ले रहे है | लोग एक मटकी पानी के लिए 10 किलोमीटर की दूरी तय कर घन्टो की लाइन लगा रहे है । स्थिति की भयानकता को समझिये और सम्हलिये | the hindu के दिए गए आकड़ो से स्पष्ट है के 2015 में सिर्फ महाराष्ट्र में 3228 किसानो ने आत्महत्या कर ली | ये संख्या 2016 के अप्रैल तक और बढ़ गयी । 2001 से यदि महाराष्ट्र का आकलन करे तो  सूखे की वजह से विदर्भ में आत्महत्या करने वाले किसानो की संख्या 20 हज़ार को पार कर जाती है ।  ये सूखा ,अकाल अंतिम सेफ्टी सायरन है |......ग्लैमर की दुनिया को छोड़,  सुदूर बंज़र खेतो में लाचारी का मातम मनाते परिवारों  में, आशा का पानी ले पहुँचे इस हरफनमौला फ़कीर महानायक की सुविधाहीन भटकन को  दिल से सलाम....आपसे भी गुजारिश है कम से कम उनके जज्बे की खबर दूर दूर तक फैलाइए .......MADHU ; writer at film association MUMBAI

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2015

यही सच है ...

😢 मेरा दर्द 😢

यह इंडिया है मेरे यार...!

😢 हम बेटियों की पढ़ऐसे देश में रहते हैं जहां पुलिस वालों को देखकर हमाई से ज्यादा उनकी शादी पर खर्च करते हैं।

😢 हम एक ऐसे देश में रहते है जहां हम पुलिस को दरखकर सुरक्षित महसूस करने की बजाय घबरा जाते हैं।

😢 IAS एग्जाम में एक शख्स 'दहेज : एक सामाजिक बुराई' विषय पर 1500 शब्दों का बेहतरीन लेख लिखता है। सबको प्रभावित करता है और एग्ज़ाम पास कर लेता है। एक साल बाद यही शख्स दहेज में 1 करोड़ रुपये मांगता है क्योंकि वह एक IAS अफसर है।

😢 भारतीय बहुत शर्मीले होते हैं लेकिन फिर भी 121 करोड़ हैं।

😢 भारतीयों को स्क्रैचप्रूफ गर्रिला ग्लास वाले स्मार्टफोन पर स्क्रीन गार्ड लगवाना जरूरी लगता है लेकिन बाइक चलाते समय हेल्मेट लगाना नहीं।

😢 भारतीय समाज 'रेप मत करो' की बजाय 'रेप से बचो' सिखाता है।

😢 सबसे बेकार फिल्में सबसे ज्यादा कमाई करती हैं।

😢 यहां का समाज, एक पॉर्न स्टार को तो सिलेब्रिटी के रूप में खास दर्जा दे देता है लेकिन एक रेप पीड़िता को आम इंसान का दर्जा भी नहीं देता।

😢 नेता हमें तोड़ते हैं जबकि आतंकवादी हमें जोड़ते हैं।

😢 हर किसी को जल्दी है लेकिन समय से कोई नहीं पहुंचता।

😢 मैरी कॉम ने जितनी कमाई अपने पूरे करियर में नहीं की, उससे ज्यादा कमाई प्रियंका चोपड़ा ने मैरी कॉम का किरदार निभाकर कर ली।

😢 अजनबियों से बात करना खतरनाक है लेकिन किसी अजनबी से शादी करना हर लिहाज से सही है।

😢 ज्यादातर लोग जो गीता और कुरान पर लड़ते हैं, वे लोग होते हैं जिन्होंने इन्हें कभी पढ़ा भी नहीं है।

😢 जो जूते हम पहनते हैं, वे एयर कंडिशंड शोरूम्स में बिकते हैं और जो सब्जियां हम खाते हैं, वे फुटपाथ पर बिकती हैं।

अब सोचिए ! क्या इन तरीकों से भारत आगे बढ़ेगा?

अगर बात सच्ची लगे तो आगे भेजने से ज़्यादा सिस्टम सुधारो...

गुरुवार, 1 नवंबर 2012

टी आर पी चक्रम



टी आर पी चक्रम
सब गोलमाल है भई गोलमाल है
-अजामिल
      भारत में टेलीविज़न प्रसारण का सफर 15 अगस्त 1959 को दूरदर्शन टी.वी. चैनल के साथ हुआ था यह एक सरकारी टी.वी. चैनल था और सरकार की गाईड लाईन्स पर सरकार के लिए ही काम कर रहा था इसकी बंधी-बंधाई सीमा थी सरकारी नीतियों और योजनाओं का प्रचार-प्रसार करना इसका मुख्य काम था उस समय दूरदर्शन चैनल की विकास की गति को देख कर कोई सोच भी नहीं सकता था कि पांच दशक पूरा करते-करते तक टेलिविज़न प्रसारण देश के सबसे बड़े उद्योगों की पहली पंक्ति में पहुँच जायेगा. आज टेलिविज़न इंडस्ट्री का जो विस्तार हमें दिखाई दे रहा है वह केबल क्रांति का नतीजा तो है ही लाखों केबल ऑपरेटर्स के समर्पण, त्याग और परिश्रम का भी फल है. उन लाखों केबल ऑपरेटर्स का जिन्होंने विषम से विषम परिस्थितियों में इस उद्योग को संभाले रखा ये अलग बात है कि आज मलाई और मख्खन खाने के लिए बड़े उद्योग पतियों और विदेशी कम्पनियों की जमात इस धंधे में कूद पड़ी है और केबल ऑपरेटर्स के हक और हुकूक संकट में आ गये हैं. दरअसल टेलिविज़न उद्योग ने सामाजिक सरोकारों को हाशिए पर डाल दिया है और अब इस इंडस्ट्री में सारा खेल अधिक से अधिक मुनाफा कमाने को लेकर चल रहा है. ज़ाहिर है कि प्रतिस्पर्धा प्रतियोगता में बदल चुकी है आज अच्छे बुरे 200 के लगभग विभिन्न भाषाओँ के राष्ट्रीय और क्षेत्रीय टी.वी. चैनल मैदान में हैं. इनके बीच दांत काट प्रतिस्पर्धा है. सभी की कोशिश ये है कि जैसे भी हो बाज़ार में आगे बने रहो. मूल्यों और संस्काओं की चिन्ता अब इन चैनलों को नहीं है. ये अपना काम बनता, भाड़ में जाए जनता के सिद्धांत पर चल रहे हैं. तभी तो इतना लंबा सफर तय कर लेने के बाद भी भारतीय टेलिविज़न की कोई पहचान नही बन पायी है. इन टेलिविज़न चैनलों से अगर फिल्म इंडस्ट्री का कचरा साफ़ कर दिया जाए तो इन चैनलों के पास दिखने को कुछ नहीं बचेगा.
            लंबे समय तक दूरदर्शन के पास कोई ऐसा रास्ता नहीं था जिससे दूरदर्शन चैनल दर्शकों के बीच अपनी लोकप्रियता का आकलन कर पाता और ना ही विज्ञापन दाताओं के पास ऐसा कोई साधन था कि वे ये पता लगा पाते कि कौन सा चैनल दर्शकों के बीच ज्यादा लोकप्रिय हो रहा है. इस अभाव के बावजूद 70-80 के दशक में दूरदर्शन के पास काफी विज्ञापन थे. भारत में टी.वी. कार्यक्रमों की लोकप्रियता को मापने का काम 1983 में शुरू हुआ. हिन्दुस्तान थॉमसन एसोशिएट और सर्वे एजेंसी इंडियन मार्केट रिसर्च ब्यूरो ये दो ऐसी एजेंसीज़ थी जिन्होंने पहली बार दूरदर्शन कार्यक्रमों की लोकप्रियता का दर्शकों के बीच जाकर सर्वेक्षण किया और यह बताया कि कौन सा कार्यक्रम कितना लोकप्रिय है और लोग उसे किस समय में देखते हैं. बाद में इस एजेंसी के साथ आई.एम्.आरपी. और एम्.आर.एस.ब्रुक एजेंसियां भी जुड गयी. इन एजेंसियों के एक साथ काम करने पर सर्वेक्षण का यह काम ज्यादा गंभीरता से होने लगा. विज्ञापन दाताओं को यह सूचना आसानी से मिलने लगी कि उनके उत्पाद का विज्ञापन टेलिविज़न सेट पर कब देखा जा रहा है उस दौर में इस सर्वेक्षण के दौरान दर्शकों को एक डायरी में टी.वी. कार्यक्रमों के बारे में अपनी राय दर्ज करने के लिए कहा गया था गौरतलब है कि उस ज़माने में दर्शकों की तुलना में टेलिविज़न सेट्स कम हुआ करते थे मोहल्ले में पैसे वाले घरों में टेलिविज़न सेट होता था अडोस-पड़ोस के लोग सुबह-शाम टी.वी. देखने के लिए पहुँच जाया करते थे. लिहाज़ा सर्वेक्षण कंपनियों ने जो डायरी बाटी दर्शकों ने उसमे काफी रूचि दिखाई एजेंसियों ने इस डायरी में दर्शकों के कमेंट्स को टी.वी. कार्यक्रमों की लोकप्रियता का आधार बनाया और इस तरह टी.आर.पी. की सहेजने की प्रक्रिया शुरू हुई. आगे चल कर केबल टी.वी. के आने के बाद सीएनएन, स्टार और एम् टी.वी. जैसे बड़े चैनल जब मैदान में आये और इनका प्रसारण शुरू हुआ तब टी.आर.पी. तय करते समय इनके कार्यक्रमों को भी शामिल कर लिया गया ये अलग बात है कि ये टी.वी. चैनल लंबे समय तक दूरदर्शन के विकल्प के रूप में देखे जाते रहे.
            शुरूआती दौर में दूरदर्शन ने टी.आर.पी. के चक्कर और ज़रूरत से निपटने के लिए दूरदर्शन ऑडियंस रिसर्च टेलिविज़न रेटिंग विंग तैयार किया था यह विंग दूरदर्शन की दर्शक अनुसन्धान इकाई द्वारा 40 केन्द्रों और 100 आकाशवाणी केन्द्रों द्वारा दर्शक और श्रोता की कार्यक्रम लोकप्रियता के आंकड़े एकत्र करता था धीरे-धीरे सर्वेक्षण का यह काम विस्तृत होता गया तब इसमें कठिनाइयाँ पैदा होने लगीं दर्शकों की संख्या में इजाफा हुआ तब दर्शकों तक पहुंचना मुश्किल हो गया डायरी सर्वेक्षण न काफी और अमहत्वपूर्ण दिखाई देने लगा लेकिन टी.आर.पी. का जानना बेहद ज़रूरी था. विज्ञापन दाताओं सर्वेक्षण एजेंसियों और चैनल के प्रतिनिधियों ने मिलजुल कर इस समस्या से निपटने के लिए एक संयुक्त समिति बनाई तय यह किया गया कि टी.आर.पी. को जानने की व्यवस्था पारदर्शी और वैज्ञानिक होने चाहिए ताकि अविश्वसनीयता की कहीं कोई गुन्जायिश न रहे. आई.एम्.आर.बी. और ए.सी.नीलसन ने मिलकर उस समय यह प्रस्ताव रखा कि टी.आर.पी. का काम टैम से करवाया जाना चाहिए यह प्रस्ताव स्वीकार भी कर लिया गया लेकिन बजट से बाहर की यह योजना थी लिहाज़ा टैम के साथ सौदा नहीं पट पाया इस बीच ओ.आर.जी. मार्ग ने इन टैम के माध्यम से टेलिविज़न रेटिंग के सर्वेक्षण का काम शुरू किया. 1998 में टैम के ज़रिये से यह काम विधिवत शुरू हो गया दरअसल टैम को इस काम में उतारने का श्रेय इंडियन सोसायटी ऑफ एडवरटाईजर्स, इंडियन ब्रोडकास्ट फौंडेशन और एडवरटाईजिंग एजेंसीज़ असोशिएसन ऑफ इंडिया को दिया जाना चाहिए.
            2002 में एसी नीलसन का अधिग्रहण ओ.आर.जी. मार्ग की प्रमुख कम्पनी वी.एन.यू. ने कर लिया इसी के साथ इनटैम टैम में मर्ज हो गयी और नई कम्पनी का नाम टैम मिडिया रिसर्च टी.वी. रेटिंग सर्वेक्षण करने वाली भारत की अकेली संस्था बन गयी. 2004 में एक और कम्पनी एमैप भी बाज़ार में आई लेकिन टैम नीलसन कम्पनी और कंटर मिडिया रिसर्च के काम को आज ज्यादा महत्व दिया जा रहा है.
            टेलिविज़न रेटिंग पॉइंट की आकलन व्यवस्था को दुरस्त किये जाने के प्रयास अभी भी चल रहे हैं टी.वी. चैनल प्रसारकों और विज्ञापन क्षेत्र की बड़ी कम्पनियों ने मिलकर इस काम के लिए ब्रोडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउन्सिल यानी बार्क का गठन किया है यह कम्पनी अधिनियम 1956 की धारा 25 के तहत काम कर रही है यह एक गैर लाभकारी संस्था है और ब्रिटेन की ब्रोडकास्टर्स ऑडियंस रिसर्च बोर्ड यानी बार्ब के मॉडल को अपनाये हुए है विशेषज्ञों का मानना है कि यह मॉडल भारतीय टेलिविज़न इंडस्ट्री का आकलन ठीक प्रकार नहीं कर पाता शायद यही वजह है कि बार्ब अभी तक कुछ भी उल्लेखनीय परिणाम नहीं दे पाया जबकि कुछ विशेषज्ञ भारतीय टेलिविज़न इंडस्ट्री के हालातों का आकलन करते हुए बार्ब की कार्य पद्धिति को सबसे ज्यादा उपयोगी मान रहे हैं उनका मानना है कि इसके पैनल का डिजाईन सामान अनुपात में है और भौगोलिक और जनसँख्या से जुड़े अनुपात हीनता को दूर करने में सक्षम है. बार्ब के पैनल में समाज के सभी आयु वर्ग और सामाजिक  वर्ग का प्रतिनिधित्व सुनिशिचित किया गया है बाब अपने सर्वेक्षण के दौरान लगभग 52,000 लोगो से मिलता है और इंटरव्यू के ज़रिये निष्कर्षों पर पहुचता है बार्ब एक ऐसी सर्वेक्षण कम्पनी है जो अकेले काम नहीं करती यह अपना हर काम किसी दूसरी कम्पनी या एजेंसी के साथ मिलकर करती है इसका परिणाम यह होता है कि इस कम्पनी द्वारा संकलित आंकड़ो के साथ छेड़-छाड संभव नहीं हो पाती. बार्ब के आंकड़े हर रोज भी मिल सकते हैं और साप्ताहिक स्तर पर भी. इसके बावजूद टी.आर.पी. ज़ारी करने वाली एजेंसी टैम मिडिया रिसर्च के सर्वेक्षण में आई.आर.एस.और एन.आर.एस. की तरह न तो पारदर्शिता है और न आंकड़ो की जाँच की कोई व्यवस्था. इसीलिए टैम का टी.आर.पी. सर्वेक्षण संदेह के दायरे में रहता है जब तक इसे जांचने का कोई रास्ता नहीं निकलता तब तक टी.आर.पी. का खेल ऐसे ही चलेगा.
            टी.आर.पी. के खेल को एक लंबे समय तक महत्वपूर्ण मानकर अपने टी.वी. चैनलों की रीति-नीति तय करने वाले चैनल इन दिनों टी.आर.पी. नाम की खराब व्यवस्था से खुद बहुत परेशान है और उनकी समझ में नहीं आ रहा है कि वे कार्यक्रमों की गुणवत्ता देखे या टी.आर.पी. की प्रतिस्पर्धा में खुद को बरबाद करते रहें उनका मानना है कि टी.आर.पी. की पूरी व्यवस्था ही बीमार और संदेहास्पद है इसमें न तो अभी तक सामाज के हर तबके की भागीदारी सुनिशिचित हो पायी है और न हर क्षेत्र की. टी.आर.पी. को लेकर टी.वी. चैनलों में 24 घंटे तनाव बना रहता है चैनल प्रमुखों के दिलों की धडकन इन दिनों टी.आर.पी. के उतार चढ़ाव पर ही निर्भर कर रही हैं न्यूज़ ब्रेक करने की जल्दबाजी में बड़ी से बड़ी खबर टी.वी. से गायब हो जाती हैं. टी.आर.पी. ने हालात ऐसे कर दिए हैं कि कई चैनलों में तो चैनल प्रमुख की नौकरी मुश्किल में पड़ गयी है इन चुनौतियों के चलते कुछ भी नया करने की न सम्भावना बची है और न उत्साह ही. दूसरी ओर टी.आर.पी. की व्यवस्था पर भी सवाल या निशान लाग रहे हैं.
            सर्विक्षण एजेंसी एमैप के बंद होने की खबर आ रही है लेकिन कम्पनी के प्रबंध निर्देशक का कहना है कि कम्पनी अपना कारोबार समेट नहीं रही है बल्कि इसमें तकनीकी बदलाव किये जा रहे हैं यह कम्पनी अपने शुरूआती दौर में 7200 मीटरों के ज़रिये रेटिंग तैयार कर रही थी उधर 1998 में शुरू हुई टैम के पास कुल मीटरों की संख्या 8150 थी इनमे से 1007 मीटर डी.टी.एच. कैस और आई.पी.टी. वाले घरों में है जबकि 5532 मीटर एनालॉग केबल और 1611 मीटर गैर केबल यानी दूरदर्शन वाले घरों में है. कुल मिलाकर यह भारी भरकम निवेश पर आधारित व्यवस्था है एक मीटर की लागत 75000 से लेकर 100000 रुपये के बीच बैठती है टी.आर.पी. की प्रतिस्पर्धा में बने रहना टी.वी. चैनलों की विवशता भी है उन्हें विज्ञापन दाताओं को अपने चैनलों और कार्यक्रमों के बारे में बताने का टी.आर.पी. के अलावा और कोई जरिया भी नहीं है हालाकि ज़्यादा तर विज्ञापन दाता कम्पनियाँ और ब्रोडकास्ट एडिटर असोशिएसन से जुड़े लोग यह मानते हैं कि टी.आर.पी. के आकलन में तकनीकी बदलाव की बहुत आवश्यकता है. किसी उत्पाद की खपत का बाज़ार में पैटर्न क्या है इसे सिर्फ टी.आर.पी. के ज़रिये कैसे निर्धारित किया जा सकता है विज्ञापन दाताओं को अपने उत्पाद की खपत का आधार और रणनीति खुद बनानी होगी. टी.आर.पी. तो एक इशारा है, फैसला नहीं. दरअसल किसी भी टी.आर.पी. सर्वेक्षण एजेंसी की भूमिका आंकड़े एकत्र करके टेलिविज़न, विज्ञापन उद्योग से जुड़े लोगों और शोध करने वालों को सौंप देने तक ही सीमित है एजेंसियां कभी नहीं कहती कि कोई चैनल टी.आर.पी. के आधार पर कार्यक्रमों में किसी तरह का परिवर्तन करे. कार्यक्रम बनाने और उसे परोसने कि रणनीती चैनल जब चाहे तब बना सकते हैं. आज बहुत से टी.वी. चैनलों के कार्यक्रम प्रमुखों ने खुल कर यह कहना शुरू कर दिया है कि वे दर्शकों के लिए काम नहीं कर रहे हैं उन्हें तो हर हाल में विज्ञापन दाताओं को खुश करना है. आखिर रोटी तो विज्ञापन के बढ़ने पर ही मिलेगी.
            सवाल उठता है कि क्या यह कह देने भर से टी.आर.पी. को लेकर चल रही बहस खत्म हो जाती आंकड़े बताते हैं कि करीब 10,000 करोड़ रुपय की भारी रकम किन चैनलों पर खर्च की जाये यह टी.आर.पी. ही तय करती है. ऐसे में तकनीकी स्तर पर टी.आर.पी. से मिलने वाले निष्कर्ष महत्वपूर्ण होते हैं देश में 607 के लगभग अच्छे बुरे टी.वी. चैनल देखे जा रहे हैं और 250 के लगभग नए चैनल खोलने के आवेदन सूचना प्रसारण मंत्रालय के पास हैं ज़ाहिर है कि आने वाले समय में टी.आर.पी. में घमासान युद्ध की संभावनाएं और बढेंगी. भूत-प्रेत, चुड़ैल और सनसनी बेचने वाले चैनलों को अपनी टी.आर.पी. बढ़ाने के लिए नए-नए तरीके खोजने पड़ेंगे. जिस चैनल की टी.आर.पी जितनी ज़्यादा होगी उसकी कमाई भी उतनी ज़्यादा होगी आईबीएन 7 के सम्पादक आशुतोष टी.आर.पी. व्यवस्था को बंद करने की मांग कर रहे हैं वो इसे दोषपूर्ण और अवैज्ञानिक मानते हैं उनका मानना है कि किसी भी तबके की क्रय क्षमता से कार्यक्रम या चैनल की लोकप्रियता तय किया जाना गलत है टी.आर.पी. के लिए चैनलों के लगातार आग्रह ने हिन्दी चैनलों के सोच को ही बदल दिया है. तमाम देशी-विदेशी टी.वी. चैनलों के मालिकान व्यापारी हो गए हैं और इनकी नज़र सिर्फ अपने फायेदे पर टिकी हुई है क्रिकेट, क्राईम और सिनेमा न हो तो किसी भी चैनल की टी.आर.पी. को धराशाई होते वक्त नहीं लगेगा.
            ये सच है कि हजारों-हज़ार करोड़ के इस व्यापार से अब लाभ कमाने की होड़ को डीलीट कर पाना आसान नहीं है लेकिन उन 13.8 करोड़ घरों में कैसे परिवर्तन होंगे जहाँ टेलिविज़न पहुँच गया है यह भी तो देखना होगा सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय भी यह मानता है कि एजेंसियों द्वारा किये गए सर्वेक्षण के आधार पर तैयार की गयी टी.आर.पी. रिपोर्ट में कई तरह की खामियां हैं आखिर ये भरोसा कैसे किया जाए कि एजेंसियां टी.आर.पी. आंकड़ों के साथ छेड़-छाड नहीं करती होंगी इन आंकड़ों को कोई बाहरी एजेंसी द्वारा ऑडिट भी तो नहीं कराया जाता सब मानते हैं कि टी.आर.पी. सर्वेक्षण में कमियां हैं और विज्ञापन दाता काफी समय से इन कमियों को नज़रअंदाज करते हुए 10,000 करोड़ का दांव बाज़ार में हर साल लगा रहे हैं कोई पूछने वाला नहीं है कि 150 करोड़ की आबादी वाले इस देश में टी.वी. दर्शकों की पसंद न पसंद कुछ सर्वेक्षण एजेंसियां 165 शहरों में लगे 8150 मीटरों के ज़रिये कैसे तय कर दे रहीं है. सेम्पल सिर्फ सेम्पल होते हैं प्रयोग के बाद सेम्पल की आखरी हैसियत तय हो पाती है. चैनल भी मानते हैं कि यह व्यवस्था न काफी है आंकड़ों पर नज़र डालिए तो लगभग 60 करोड़ लोग टेलिविज़न देखते हैं. 10.3 करोड़ घरों में केबल और डी.टी.एच के ज़रिये टी.वी. देखा जा रहा है शहरों में टी.आर.पी. तय करने के लिए मीटर लगाये गए हैं. गाँवों और कस्बों में यह व्यवस्था नहीं है. पूर्वोत्तर और जम्मू-कश्मीर तक तो ये मीटर पहुंचे ही नहीं हैं बिहार में 165 मीटर लगे हैं सबसे ज़्यादा मीटर दिल्ली और मुंबई में हैं तमाम टी.वी. चैनलों का दबाव पड़ने पर एक सर्विक्षण एजेंसी ने 165 मीटर और जोड़ दिए हैं लगातार मीटरों की संख्या बढ़ा कर 30,000 किये जाने की सिफारिश की जा रही है यह मांग भी है कि इनमे से 15,000 मीटर ग्रामीण क्षेत्रों में लगाये जाएँ इस पर तकरीबन 660 करोड़ रुपय का खर्च आएगा.
            टी.आर.पी. को लेकर चैनलों द्वारा कमोबेश उठाये जा रहे अनैतिक क़दमों से भी टी.आर.पी. की शुचिता प्रभावित हो रही है तमाम चैनलों के एजेंट उन घरों के दर्शकों को उपहार आदि देकर चैनलों को अधिक से अधिक देखने का आग्रह कर रहे हैं और मीटर रीडिंग पर सीधा असर पड़ रहा है मुश्किल ये है कि मीटर में चैनल का नाम कहीं नहीं आता बस किसी विशेष चैनल के फ्रीक्वेंसी ही दर्ज होती है अब किसी विशेष चैनल की टी.आर.पी. गिरानी होगी तो केबल ऑपरेटर उस चैनल की फ्रीक्वेंसी को बार-बार बदल कर खेल करता रहेगा और इस तरह किसी विशेष चैनल की टी.आर.पी. गिर जायेगी सर्वेक्षण एजेंसियां ये मानती हैं कि केबल ऑपरेटर के इस खेल पर कोई अन्खुश नहीं लगाया जा सकता सिवा इसके हम उन पर भरोसा करें. टी.आर.पी. के लिए काम करने वाली एजेंसियों का न तो पंजीकरण किया गया है और न इनके लिए कोई आचार सहिंता ही है. इनकी कहीं कोई शिकायत नहीं की जा सकती और इनके द्वारा किये गए नुकसान की भरपाई के लिए किसी तरह का क्लेम पाने का मुकदमा ही दर्ज हो सकता है.
            टी.आर.पी. को लेकर केबल टी.वी. चैनलों में जो आपाधापी मची हुई है उसमे परिवर्तन बेहद आवश्यक हैं. नियम अधिनियम बनाकर सबसे पहले सर्वेक्षण एजेंसियों की सीमा निर्धारित होनी चाहिए चैनलों को उनके कार्यक्रमों और उनके चैनलों की लोकप्रियता के बारे में साप्ताहिक रिपोर्ट न देकर उन्हें 6 महीने में एक बार टी.आर.पी. से जोड़ा जाए. ऐसा करने पर चैनलों के बीच की प्रतिस्पर्धा कम होगी और कार्यक्रमों की गुणवत्ता बढ़ेगी. विज्ञापन दाताओं को भी विज्ञापन पर निवेश करने में आसानी होगी टी.आर.पी. का मुद्दा एक महत्वपूर्ण मुद्दा है इसे गंभीरता से लिया जायेगा तो इससे केबल टी.वी. चैनल इंडस्ट्री का विकास हो पायेगा.
                                                            -अजामिल है ा ेशक  nा ह्लं   a inidhitvसामाजिक kमें सक्षम है ै कि बार्क