शुक्रवार, 9 फ़रवरी 2018

Facebook मेरा अनुभव

फेसबुक पर वापसी:मेरा अनुभव
         आज बहुत दिनों के बाद फेसबुक पर वापस आ रहा हूँ। इस बीच यही आकलन करता रहा क़ि फेसबुक पर रहकर मुझे क्या हासिल हुआ और क्या मैंने खो दिया। यह सच है क़ि फेसबुक पर होना धीरे धीरे एक लत के साथ होना जैसा है। एक नशा कुछ मजेदार तो कुछ दुःख दायी। लगभग तीन साल हो गए मुझे इस माध्यम का इस्तेमाल करते। चार हज़ार मित्र हैं। इनमें चालीस ऐसे है जिनके साथ निकटता महसूस करता हूँ। बाकी मित्रों के साथ संवाद तो कभी नहीं हुआ लेकिन इनकी पोस्ट पढता रहा हूँ। बहरहाल इतने दोस्तों का होना और इनका स्नेह पाना कोई कम बड़ी बात नहीं है। इस तथाकतिथ आभासी दुनिया में बड़े प्यारे लोग हैं जो स्पेस बनाकर बड़ी गरिमापूर्ण दोस्ती निभा रहे है। दोस्तों का ये भरापूरा परिवार मेरी ताकत और आदत दोनों बन गए है। कुछ दोस्त तो इतने प्यारे हैं क़ि ये अगर मुझसे दोस्ती समाप्ति की घोषणा कर दें तो मै रो पडूं ।फेसबुक ने मुझे खासी पहचान भी दी। बहुत से मित्रों से मिलना जुलना भी हुआ। मज़ा आ गया उनसे मिलकर। चेटिंग वेटिग में बेहद कंजूसी बरतने के बावजूद कुछ अपनों से बतिया ही लिया। मुझे ख़ुशी है क़ि फेसबुक पर मेरे अधिकतर दोस्त सह्रदय हैं। और इस माध्यम पर अपने होने की ज़रूरत क। लेकर काफी गंभीर है। ये लोग फेसबुक को सार्थकता दे रहे है। फेसबुक ने मेरा कई नुक्सान भी किया। इसके चलते मेरी आँखे कमजोर हुई। एकाग्रता में कमी आई । लिखने पढने की आदत बहुत कम हो गयी। मै अब कही आना जाना एवाइ करने लगा हूँ। भीड़ का हिस्सा तो मै पहले भी कभी नहीं बना पर फेसबुक ने मुझे अकेले जीने की कला सिखा दिया। ये कला मुझे पसंद नहीं। समाज मुझे प्रिय है। कभी दो किताबें लेकर मै यमुना किनारे घंटों पढता रहता था। आज अपने मोबाइल के साथ कमरे में कैद हो गया हूँ। सेहत में भी गिरावट महसूस कर रहा हूँ। फेसबुक ने मुझे अकेला कर दिया है।
      मित्रों अधिकता हर चीज़ की बुरी होती है। फेसबुक बुरा नहीं है पर इसके प्रति मेरा अधिकता का आग्रह नुक्सान देह है। बदलूँगा इस बुरी आदत को।
      आपसे मुलाक़ात होती रहेगी। इसी फेसबुक पर। कम मिलेंगे लेकिन जब मिलेंगे पूरी गर्माहट के साथ मिलेगे। आपसे बातों के लिए सबसे अच्छा माध्यम भी तो है फेसबुक।......

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