मंगलवार, 28 फ़रवरी 2017

कार्यक्रमों की विलंबित लय

कल कार्यक्रम शाम 6:00 बजे आरंभ होना था लेकिन 6:00 बजे शाम को कार्यक्रम स्थल पर कुर्सियां व्यवस्थित की जा रही थी फूल मालाओं से मंच को सुसज्जित किए जाने की जद्दोजहद चल रही थी लोग आराम से धीरे धीरे मंच पर दरी चादर बिछा रहे थे पता चला कि कार्यक्रम के अध्यक्ष और मुख्य अतिथि को कुछ समय लगेगा आने में समय लगा और अध्यक्ष और मुख्य अतिथि कार्यक्रम के निर्धारित समय से केवल ढाई घंटा लेट आए इस बीच लगभग 200 दर्शक पंडाल में आ कर बैठ चुके थे कार्यक्रम मैं मजे का विलंब हो चुका था दुख तब हुआ जब अध्यक्ष और मुख्य अतिथि ने विलंब से आने के अपराध के लिए दशकों से न कोई क्षमा मांगी और ना कोई अफसोस व्यक्त किया बल्कि उनके व्यवहार से ऐसा लग रहा था जैसे उन्हें विलंब से आने का कोई अफसोस भी नहीं है शायद यह दोनों देर से आने को अपना विशेष अधिकार मांग रहे थे जबकि सच यह है कि उन्होंने अपनी विलंब से आने की गलती के चलते पंडाल में इंतजार करते 200 लोगों के लगभग 400 घंटों को बर्बाद कर दिया था 400 घंटे कम नहीं होते इतने समय में लोग अपने कितनी जरूरी काम निपट आ चुके होते पर उन्होंने पंडाल के नीचे बैठ कर यह वक्त केवल और केवल बर्बाद किया अध्यक्ष और मुख्य अतिथि ने कार्यक्रम में देर से आकर कार्यक्रम के आयोजकों को एक अनावश्यक तनाव में रखा आयोजक बार बार फोन करके उनसे आने का आग्रह करते रहे और अध्यक्ष और मुख्य अतिथि थे कि बार-बार यही कहते रहे बस घर से निकल रहा हूं रास्ते में हूं 5 मिनट में पहुंच रहा हूं यह सब कितना सच था कितना झूठ कोई नहीं जानता पर उन्होंने कार्यक्रम के नैसर्गिक उत्साह को संकट में जरूर बनाए रखा कार्यक्रमों को देर से शुरू करने की परंपरा आज एक लाइलाज बीमारी हो गई है शायद ही कोई ऐसी संस्था हो जो अपने कार्यक्रम समय से शुरू करती हो यह बात अध्यक्ष या मुख्य अतिथि तक ही सीमित नहीं है दर्शक भी समय से नहीं आते उन्हें मालूम है कि भारतीय परंपरा के अनुसार कार्यक्रम निर्धारित समय पर कभी शुरू नहीं होगा आधे घंटे से लेकर 2 घंटे तक इस में विलंब होना ही है इसलिए वह पहले से ही निर्धारित समय से घंटे आधे घंटे देर से घर से निकलता है कोई भी नाटक देखने चाहिए कभी समय से आरंभ नहीं होता इस देश में तो सरकारी गैर सरकारी कार्यालयों में भी कर्मचारी तो 2 घंटे देर से पहुंचता है और तब कार्यालयों में कामकाज शुरु होता है बड़े अधिकारी कभी समय से दफ्तर नहीं पहुंचते राजनीतिक रैलियों में लल्लू पंजू नेताओं से लेकर प्रधानमंत्री तक चार चार घंटे लेट पहुंचते हैं और कार्यक्रम स्थल पर मौजूद हैं लाखों लोगों के लाखों घंटे सिर्फ प्रतीक्षा में बर्बाद करवा देते हैं सच तो यह है कि हमारे यहां यह सोचने का रिवाज नहीं है कि समय की सीमा में ही जरूरी काम निपटाए जाते हैं विलंब करने पर सिर्फ समय का ही नुकसान नहीं होता बल्कि काम का भी नुकसान होता है और इस नुकसान की भरपाई आगे करनी पड़ती है तब उसके लिए हमें नए समय की आवश्यकता होती है और जो मानवीय उर्जा बर्बाद हुई उसकी भरपाई तो कभी संभव ही नहीं होती कार्यक्रम को भारतीय समय के अनुसार विलंब से शुरू करने की आदत पूरे देश का बड़ा नुकसान है इसे बदलने की आवश्यकता है कार्यक्रम सही समय से शुरू होने चाहिए इसके लिए जो भी संभव प्रयास हो उसे किया जाना चाहिए देश की जो भी व्यवस्था अपने कार्यक्रम समय से आरंभ करती हैं उनसे सबक लेने की आवश्यकता है कार्यक्रम समय से शुरू होना चाहिए किसी भी औपचारिकता के लिए दर्शकों और श्रोता का समय पर बात करने का किसी भी आयोजक को कोई अधिकार नहीं है ।
**ब्लॉग खरी बात में अजामिल की टिप्पणी

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