बुधवार, 1 मार्च 2017

हिंदी रंगमंच पर दर्शकों की कमी / कोई रंगकर्मी दूसरे रंगकर्मी की प्रस्तुति क्यों नहीं देखता

कर्णभारम ,इन्दवती नाट्य समिति सीधी की प्रस्तुति
सभी चित्रों के छायाकार विकास चौहान
कला समीक्षक अजामिल

उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र में आयोजित दो दिवसीय नाट्य उत्सव में इंद्रवती नाते समिति सीधी छत्तीसगढ़ के कलाकारों ने लोकरंग में डूबी कर्णभारम् की अत्यंत मर्मस्पर्शी और अपने देश की संस्कृति का गहरा एहसास कराती प्रस्तुति की इस लोकनाट्य मैं कर्ण की भूमिका सहित सभी कलाकारों ने अपने शानदार अभिनय से सब का मन मोह लिया लोक नाट्य मैं नदी के प्रवाह जैसी गति थी हृदय में उतर जाने वाला संगीत सबको बांधे हुए था और सभी कलाकार अपनी भूमिकाओं को पूरी शिद्दत के साथ जी रहे थे वेशभूषा अत्यंत खूबसूरत थी और कलाकार भी अपनी भूमिका के अनुसार सुंदर और आंखों को लुभा लेने वाले थे 800 किलोमीटर की दूरी तय करके छत्तीसगढ़ के यह कलाकार इलाहाबाद इसलिए आए थे कि उन्हें यह मालूम था की रंगमंच के क्षेत्र में इलाहाबाद एक सर्वस्वीकृत मानक है पर यहां आने पर छत्तीसगढ़ के उन मेहमान रंगकर्मियों को उस समय बहुत दुख हुआ जब प्रेक्षागृह में 15 और 20 लोग भी की प्रस्तुति को देखने के लिए उपस्थित नहीं थे लोग क्यों नहीं आए यह पूछने का साहस ना उन कलाकारों में था ना इसका कारण बताने की की हिम्मत इलाहाबाद के किसी रंगकर्मी में थी कौन बताता इलाहाबाद में रंगकर्मी ही एक दूसरे की नाट्य प्रस्तुतियां देखने के लिए नहीं जाते शायद यही वजह है कि इलाहाबाद के रंगमंच पर सब कुछ है परंतु इस सब कुछ को सहने वाले दर्शक नहीं है जिन लोगों ने छत्तीसगढ़ के उन बेहतरीन कलाकारों की प्रस्तुति कर्णभारम् नहीं देखी उन्होंने एक बहुत अच्छी प्रस्तुति है देखने और उससे कुछ सीखने का अवसर खो दिया रंगकर्मी यदि चाहते हैं कि उनकी प्रस्तुतियों में नए रंगकर्मी छूटते रहे तो इसके लिए आवश्यक है कि पहले वह एक दूसरे की प्रस्तुति को देखने और सराहने की आदत डालें दर्शक सच्चे दर्शक आखिर उनका ही तो अनुकरण करेंगे रंगकर्मियों का भरोसा दर्शकों का भरोसा होगा । कुछ वरिष्ठ कर्मियों को इस बात की शिकायत थी कि यह प्रस्तुति कर दी गई और प्रचार-प्रसार कर इसकी सूचना किसी को नहीं दी गई दर्शकों के संकट का एक बड़ा कारण यह भी है कि दर्शकों तक अच्छी प्रस्तुतियों की सूचना नहीं पहुंच पाती ऐसी स्थिति में कोई कैसे पहुंच सकता है रंग संस्थाएं यदि किसी प्रस्तुति के प्रचार-प्रसार को अनावश्यक मानती है तो क्या इससे यह साबित नहीं होता कि दर्शक भी उनके लिए कोई महत्व नहीं रखता अनुदान मैं इतना बड़ा बजट संस्कृति मंत्रालय से हासिल करने के बाद भी उसका कुछ हिस्सा प्रस्तुति के प्रचार-प्रसार में क्यों नहीं खर्च किया जाता जाहिर है कि सारा दोष रंगकर्मियों और दर्शकों नहीं दिया जा सकता प्रस्तुति के आयोजक भी इसके लिए जिम्मेदार हैं शत-प्रतिशत यह भी नहीं है कि रंगकर्मी दूसरों के नाटक नहीं देखना चाहते परंतु इसके लिए सूचना का प्रसारण आवश्यक है हम उन रंगकर्मियों की बात नहीं कर रहे हैं जो हर प्रस्तुति में प्रेक्षागृह तक जाते अवश्य है पर नाटक को पूरे मन से बैठकर देखने के जगह प्रेक्षागृह के बाहर खड़े होकर प्रस्तुति देखे बगैर उसकी चर्चा में समय जाया करते हैं नाटक को संभवता ऐसे रंगकर्मियों की आवश्यकता भी नहीं है ।
रंग समीक्षक अजामिल
इस विशेष लोकरंग प्रस्तुति के चित्रों का छायांकन वरिष्ठ छायादार विकास चौहान ने किया है ।

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