झूठ बोले कौवा काटे
अगर ऐसा है तो है
रंग निर्देशक बनना बहुत आसान है संस्कृति मंत्रालय नई दिल्ली से नाटक का कोई प्रोजेक्ट जुगाड़ लगा कर पास करा लीजिए उसके बाद नाटक की प्रस्तुति के लिए कोई मजबूर सच्ची मुच्ची का रंग निर्देशक मोल भाव करके हायर कीजिए वही निर्देशन करेगा और आपकी प्रस्तुति को प्रस्तुति के योग्य बना देगा हां याद रखिए संस्कृति मंत्रालय के नियमानुसार जो भी प्रचार सामग्री अथवा पोस्टर आदि प्रकाशित होगा उस पर आपको प्रोजेक्ट पास कराने वाले को अपना नाम प्रस्तुति के रंग निदेशक के रूप में बड़े-बड़े फोंट में प्रकाशित करना होगा नहीं इसमें झूठ कुछ भी नहीं है आजकल अधिकतर रंग संस्थाएं यही कर रही हैं काम कोई करता है नाम किसी का होता है और यह तो हमेशा से होता है तो इसमें आश्चर्य कैसा तो भैया निर्देशन को मारो गोली पहले प्रोजेक्ट पास कराओ रंग निर्देशक तो तुम संस्कृति मंत्रालय के नियमानुसार माने ही जाओगे रंग निर्देशक बनना पहले कभी इतना आसान नहीं था यही कारण है कि आज अभिनेता कम है निर्देशक ज्यादा है ।
खरी बात.. अन्याय के खिलाफ चुप हो जाने से बड़ा अपराध कोई नहीं ! खरी बात कहिये चुप मत रहिये....
रविवार, 26 मार्च 2017
बहुत आसान है रंग निर्देशक बनना
शनिवार, 4 मार्च 2017
दो कौड़ी का मान सम्मान
व्यंग
असली इज्जतदार दो कौड़ी के हो गए हैं
अपने मान सम्मान को लेकर हम भारतीय खतरे के निशान तक संवेदनशील है मान सम्मान की हम सबसे ज्यादा चिंता करते हैं सड़क पर चलते हुए हम सामने से आ रहे वाहन से टकरा जाते हैं लेकिन बड़ी से बड़ी टक्कर में हम अपने मान सम्मान को चोट नहीं लगने देते बावजूद इसके विचित्र किंतु सत्य यह है कि भारतीय
अदालतों में सबसे कम विवाद मानहानि को लेकर फैसले के लिए पहुंचते है हमारा मान सम्मान कभी इतना घायल नहीं होता कि हम अदालतों की शरण में जाकर उसकी रक्षा की गुहार लगाएं मान सम्मान के विवादों के फैसले शायद कभी होते भी नहीं ऐसे विवादों में मान-सम्मान धारक चुप मार कर बैठने मैं ही अपने मान सम्मान को सुरक्षित मानता है अदालतों में मान सम्मान के विवाद चतुर्थ श्रेणी के विवाद माने जाते हैं विद्वानों का यह मानना है कि औसत भारतीय का मान-सम्मान न कहीं आता है ना कहीं जाता है मान सम्मान उस आत्मा की तरह है जो कभी मरता नहीं प्रयत्न करके इस आत्मा को कोई बदल तो कर सकता है पर इस आत्मा को कभी नष्ट नहीं कर सकता बावजूद इसके बहुत से लोग मान सम्मान को लेकर बड़े व्याकुल दिखाई देते है इनका कर्म कुकर्म इनके तथाकथित मान सम्मान को लेकर चलते ही रहते हैं बहुत से लोग ऐसे होते हैं जिनका कोई मान सम्मान नहीं होता लेकिन ऐसे लोगों को हमेशा लगता रहता है क़ि लोग जो कुछ कर रहे हैं वह इनके मान सम्मान से जुड़ा है पिछले एक दशक में मान सम्मान की परिभाषा में बड़े परिवर्तन हुए हैं इज्जतदार की इज्जत को देखने का नजरिया बदल गया है एक से बढ़कर एक कुख्यात अपराधी भ्रष्टाचारी बलात्कारी और आतंकवादी इज्जतदार मान लिए गए हैं और सच्चे इज्जतदार हाशिए पर धकेल दिए गए कुख्यात इज्जतदार की इज्जत आज खराब नहीं होती पर उसकी सामाजिक बेज्जती पर दाग लग जाता है आज के समाज में मर्दो की इज्जत उतारी जाती है जबकि महिलाओं की इज्जत लुटे जाने की परंपरा है बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो डरा-धमकाकर लोगों से अपनी इज्जत करवाते हैं बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो पैसा खर्च करके बकायदा मान-सम्मान खरीदने का काम भी करते हैं जुगाड़ तंत्र इतना लचीला है कि इसमें मान सम्मान की कीमत बहुत कम हो गई है आप का जुगाड़ है तो आप बड़ा से बड़ा सम्मान झटक सकते हैं आज खरीदा तो कोई भी सम्मान जा सकता है आज कोई किसी को सम्मान देता नहीं सम्मान पाने की व्यवस्था बनानी पड़ती है दबंग लोग आज भी छोटी जाति के लोगों को पटककर सम्मान देने के लिए विवश कर देते हैं बहुत से लोगों को सम्मान पाने और देने की चिंता नहीं रहती ऐसे लोग असम्मानित होकर भी प्रसन्न रहते हैं सम्मान को ऐसे लोग माया मानते हैं इसकी सीधी छाया से उन्हें बहुत डर लगता है ये लोग बेइज्जती प्रूफ होते हैं इनकी चाहे जितनी बेइज्जती कर दी जाए इन पर कोई असर नहीं होता गैंडे की खाल मैं छुपे ऐसे लोग इस बेज्जती को अपना सम्मान मानते हैं पारंपरिक मान सम्मान को लेकर अब इज्जतदार लोग कोई चिंता नहीं करते ऐसे लोगों का मानना है कि इज्जत तो आती जाती रहती है इज्जत का आना जाना ही जिंदगी का खेल है मजेदार बात यह है कि जो इज्जत दार जिंदा रहते समाज में खूब बेइज्जत होते हैं मरने के बाद उनकी सबसे ज्यादा इज्जत होती है बे इज्जत लोगों के कारनामे और करतूत उनके मरने के बाद माफ कर देने की स्वस्थ परंपरा ने लोगों के दिलों से जिंदा रहते बेइज्जत होने का डर निकाल दिया है आज मान सम्मान और अपमान एक ही थैली के चट्टे बट्टे हैं किसी के मान सम्मान को अपमान और अपमान को मान सम्मान में बदलने का कारोबार भी धड़ल्ले से चल रहा है मीडिया पूरी प्रतिबद्धता के साथ इस काम को बकायदा पैसे लेकर कर रहा है नकली इज्जतदार ने असली इज्जतदार को चलन से बाहर कर दिया है असली इज्जतदार दो कौड़ी के हो गए है ।
- अजामिल
चित्र अजामिल
शुक्रवार, 3 मार्च 2017
सच्चे कवि शमशेर सम्मान से सम्मानित हुए
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Friday, March 3, 2017
असली कवियों को मिला शमशेर सम्मान
मौजूदा दौर में जब की तमाम भाषाओं के साहित्यिक जगत में दिए जाने वाले सम्मान और पुरस्कार में अधिकतर दागदार हो चुके हैं और इनका लेनदेन पूरी तरह से साहित्यक माफियाओं द्वारा जुगाड़ तंत्र पर आधारित हो गया है ऐसे भी अभी भी कुछ ऐसे सम्मान और पुरस्कार हैं जो काजल की कोठरी में भी अपनी अस्मिता को न सिर्फ बनाए हुए हैं बल्कि तमाम सच्चे साहित्यकार अपने साहित्य की योगदान से उसे सुरक्षित भी किए हैं इसी सिलसिले में हिंदी के महत्वपूर्ण कवि शमशेर बहादुर सिंह स्मृति सम्मान अपनी विश्वसनीयता को आज भी बनाए हुए हैं यह बहुत प्रसन्नता की बात है की सारी जद्दोजहद के बाद यह सम्मान वर्ष 2015 और 2016 के अंतर्गत हिंदी के वरिष्ठ कवि हरीश चंद्र पांडे पंकज राग एकांत श्रीवास्तव और यतींद्र मिश्र को दिया गया है इसमें कोई संदेह नहीं कि ये कवि उन महत्वपूर्ण कवियों में हैं जिनकी कविताओं को आज के दौर की महत्वपूर्ण कविता धारा की पहचान के रूप में शुमार किया जाता है इनकी कविताएं अच्छी कविताओं के प्रतिमान के रूप में देखी जा रही है इससे बड़ी बात यह है की बहुत बड़ी संख्या में इन कवियों को विशेषण सामान्य पाठकों का प्यार मिला है यह बात इसलिए भी उल्लेखनीय है क्योंकि आज के दौर के कवियों पर यह आरोप लगता रहा है कि अधिकतर कवि अपने मित्र कवियों के लिए ही कविताएं लिख रहे हैं और उन्हें आम पाठकों की कोई चिंता नहीं है यह अलग बात है कि शमशेर स्वयं जनता के कवि नहीं रहे उनकी कविताओं को बुद्धिवादी कवियों ने ही पहचाना और सराहा परंतु इसमें दो राय नहीं कि शमशेर की कविताएं कविता समय की विशेष पहचान के रुप में आज साहित्य में मौजूद हैं और विचार कविता की प्रतिनिधि कविताएं हैं इसमें दो राय नहीं कि चारों कवि शमशेर सम्मान के पूरी तरह हकदार हैं हिंदी साहित्य जगत इन कवियों के चयन पर अपने विश्वास की मुहर लगा रहा है गौरतलब है कि शमशेर सम्मान हरीश चंद्र पांडे के कविता संकलन कविता के लिए लेखक पंकज राग को सर्जनात्मक गद्य के लिए एकांत श्रीवास्तव को कविता के लिए तथा यतींद्र मित्र को उनके सृजनातमक लेखन के लिए दिया गया है इन चारों कवियों की कविताएं और उनका लेखन मनुष्य और मनुष्यता में लगातार हो रहे क्षरण रेखांकित करते हैं और अपने ढंग से इसे देखने और बदलने का हौसला देते हैं विचार के स्तर पर यह चारों कवि और लेखक बेहद पठनीय है और सबसे बड़ी बात यह है की सामान्य पाठ को द्वारा स्वीकार्य जा रहे हैं इनका लेखन बुद्धि विलास नहीं है बल्कि समाज के प्रति एक जिम्मेदारी से भरा हुआ लेखन है अब तक यह सम्मान मंगलेश डबराल राजेश जोशी विजय कुमार अरुण कमल नरेंद्र जैन लीलाधर मंडलोई सुदीप बनर्जी वीरेंद्र डंगवाल ज्ञानरंजन अरविंद जैन राजेंद्र शर्मा विष्णु नागर विनोद दास पुष्पिता नर्मदा प्रसाद उपाध्याय मनमोहन महेश कटारे इब्बार रब्बी सुधीश पचौरी कर्मेंदु शिशिर पंकज सिंह अभिमन्यु अनत बद्रीनारायण विश्वनाथ प्रसाद त्रिपाठी कमला प्रसाद पांडे नरेश सक्सेना प्रभात त्रिपाठी ओम थानवी ऋतुराज और अनामिका को दिया जा चुका है शमशीर सम्मान के लिए कवियों और लेखकों का चयन देश के अनेक जाने माने साहित्यकारों की समिति करती है इस बार शमशेर सम्मान की निर्णायक समिति में लीलाधर मंडलोई नरेश सक्सेना और बद्रीनारायण भी शामिल रहे ।
इलाहाबाद से शमशेर सम्मान हरीश चंद्र पांडे को दिए जाने पर इलाहाबाद के साहित्यिक जगत में खुशी की लहर है हरीश चंद्र पांडे उन कवियों में हैं जो कम लिखते हैं पर जब लिखते हैं तब सर्व स्वीकार होता है समकालीन मुक्तिबोध चारों वरिष्ठ कवियों और लेखकों को दिए जाने वाले सम्मान को साहित्य जगत का सम्मान मानता है और उन्हें इस सफलता के लिए हृदय से बधाई देता है ।
- अजामिल
** कवियों और लेखकों के सभी चित्र वरिष्ठ कवि संतोष चतुर्वेदी के सौजन्य से
बुधवार, 1 मार्च 2017
हिंदी रंगमंच पर दर्शकों की कमी / कोई रंगकर्मी दूसरे रंगकर्मी की प्रस्तुति क्यों नहीं देखता
कर्णभारम ,इन्दवती नाट्य समिति सीधी की प्रस्तुति
सभी चित्रों के छायाकार विकास चौहान
कला समीक्षक अजामिल
उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र में आयोजित दो दिवसीय नाट्य उत्सव में इंद्रवती नाते समिति सीधी छत्तीसगढ़ के कलाकारों ने लोकरंग में डूबी कर्णभारम् की अत्यंत मर्मस्पर्शी और अपने देश की संस्कृति का गहरा एहसास कराती प्रस्तुति की इस लोकनाट्य मैं कर्ण की भूमिका सहित सभी कलाकारों ने अपने शानदार अभिनय से सब का मन मोह लिया लोक नाट्य मैं नदी के प्रवाह जैसी गति थी हृदय में उतर जाने वाला संगीत सबको बांधे हुए था और सभी कलाकार अपनी भूमिकाओं को पूरी शिद्दत के साथ जी रहे थे वेशभूषा अत्यंत खूबसूरत थी और कलाकार भी अपनी भूमिका के अनुसार सुंदर और आंखों को लुभा लेने वाले थे 800 किलोमीटर की दूरी तय करके छत्तीसगढ़ के यह कलाकार इलाहाबाद इसलिए आए थे कि उन्हें यह मालूम था की रंगमंच के क्षेत्र में इलाहाबाद एक सर्वस्वीकृत मानक है पर यहां आने पर छत्तीसगढ़ के उन मेहमान रंगकर्मियों को उस समय बहुत दुख हुआ जब प्रेक्षागृह में 15 और 20 लोग भी की प्रस्तुति को देखने के लिए उपस्थित नहीं थे लोग क्यों नहीं आए यह पूछने का साहस ना उन कलाकारों में था ना इसका कारण बताने की की हिम्मत इलाहाबाद के किसी रंगकर्मी में थी कौन बताता इलाहाबाद में रंगकर्मी ही एक दूसरे की नाट्य प्रस्तुतियां देखने के लिए नहीं जाते शायद यही वजह है कि इलाहाबाद के रंगमंच पर सब कुछ है परंतु इस सब कुछ को सहने वाले दर्शक नहीं है जिन लोगों ने छत्तीसगढ़ के उन बेहतरीन कलाकारों की प्रस्तुति कर्णभारम् नहीं देखी उन्होंने एक बहुत अच्छी प्रस्तुति है देखने और उससे कुछ सीखने का अवसर खो दिया रंगकर्मी यदि चाहते हैं कि उनकी प्रस्तुतियों में नए रंगकर्मी छूटते रहे तो इसके लिए आवश्यक है कि पहले वह एक दूसरे की प्रस्तुति को देखने और सराहने की आदत डालें दर्शक सच्चे दर्शक आखिर उनका ही तो अनुकरण करेंगे रंगकर्मियों का भरोसा दर्शकों का भरोसा होगा । कुछ वरिष्ठ कर्मियों को इस बात की शिकायत थी कि यह प्रस्तुति कर दी गई और प्रचार-प्रसार कर इसकी सूचना किसी को नहीं दी गई दर्शकों के संकट का एक बड़ा कारण यह भी है कि दर्शकों तक अच्छी प्रस्तुतियों की सूचना नहीं पहुंच पाती ऐसी स्थिति में कोई कैसे पहुंच सकता है रंग संस्थाएं यदि किसी प्रस्तुति के प्रचार-प्रसार को अनावश्यक मानती है तो क्या इससे यह साबित नहीं होता कि दर्शक भी उनके लिए कोई महत्व नहीं रखता अनुदान मैं इतना बड़ा बजट संस्कृति मंत्रालय से हासिल करने के बाद भी उसका कुछ हिस्सा प्रस्तुति के प्रचार-प्रसार में क्यों नहीं खर्च किया जाता जाहिर है कि सारा दोष रंगकर्मियों और दर्शकों नहीं दिया जा सकता प्रस्तुति के आयोजक भी इसके लिए जिम्मेदार हैं शत-प्रतिशत यह भी नहीं है कि रंगकर्मी दूसरों के नाटक नहीं देखना चाहते परंतु इसके लिए सूचना का प्रसारण आवश्यक है हम उन रंगकर्मियों की बात नहीं कर रहे हैं जो हर प्रस्तुति में प्रेक्षागृह तक जाते अवश्य है पर नाटक को पूरे मन से बैठकर देखने के जगह प्रेक्षागृह के बाहर खड़े होकर प्रस्तुति देखे बगैर उसकी चर्चा में समय जाया करते हैं नाटक को संभवता ऐसे रंगकर्मियों की आवश्यकता भी नहीं है ।
रंग समीक्षक अजामिल
इस विशेष लोकरंग प्रस्तुति के चित्रों का छायांकन वरिष्ठ छायादार विकास चौहान ने किया है ।
