शनिवार, 20 अक्टूबर 2012

माओ की असलियत ?

भारत-चीन युद्ध के 20 अक्टूबर को 50 साल पूरे हो रहे हैं। आठ दिन चले इस युद्ध में भारत के 1383 सैनिक मारे गए थे जबकि 1047 घायल हुए थे। 1696 सैनिक लापता हो गए थे और 3968 सैनिकों को चीन ने गिरफ्तार कर लिया था। वहीं चीन के कुल


722 सैनिक मारे गए थे और 1697 घायल हुए थे। एशिया की इन दो ताकतों के बीच जंग के हालात क्‍यों बने, रणनीति तौर पर इसके क्‍या नतीजे हुए, ऐसे तमाम मसलों पर बहस जारी है। लेकिन चीन के ही एक रणनीतिकार ने इस जंग की वजह के बारे में बड़ा खुलासा किया है। चीन की पेंकिंग यूनिवर्सिटी में स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज के डीन वांग जिसि ने कहा है कि चीन के नेता माओ त्से तुंग ने 1962 में भारत के खिलाफ युद्ध का आदेश दिया था ताकि सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी पर उनकी पकड़ बनी रहे। वांग चीनी विदेश मंत्रालय की नीति सलाहकार समिति के भी सदस्य हैं। वांग ने कहा कि खेती आधारित से आधुनिक समाज बनाने का माओ का अभियान 'ग्रेट लीप फारवर्ड' संकट में तब्दील हो गया। हिंसा में लाखों लोगों की जान गई। वांग ने कहा कि इस स्थिति में कम्युनिस्ट पार्टी में माओ की स्थिति कमजोर हो गई। तब सेना पर अपनी पकड़ मजबूत दिखाने के लिए उन्होंने तिब्बत रेजीमेंट के सेना के कमांडर को बुलाया। उससे पूछा कि क्या भारत से युद्ध जीत सकते हो। उसने कहा निश्चित तौर पर। इस पर माओ ने हरी झंडी दे दी।

- जय प्रकाश मानस

मुझे कुछ प्रश्नों के जवाब चाहिए....

जब हमारे पास "गीता" थी तो यह 14 देशों से चोरी करके यह बोझिल सविंधान क्यों बनाया गया?

जब हमारे पास "हिंदी" "संस्कृत" जैसी पवित्र और समृद्ध भाषा थी तो यह अंग्रेजी भाषा क्यों थोपी गई? जब हमारे पास "गुरुकुल प्रणाली" थी तो यह कॉन्वेंट के नाम पर हमें क्यों लुटा गया? हमारे पास आयुर्वेद था तो क्यों नहीं उस पर अनुसंधान किये? हमारे पास पुरात्न अपनी शिक्षा प्रणाली जो ऋषियों मुनियो ने चलाई थी तो क्यों अंग्रेज मैकले की काली शिक्षा व्यवस्था हमारे ऊपर थोपी गई ??

जब हमारे इतिहास में "स्वामी विवेकानंद" जैसे महान विचारशील व्यक्ति थे तो क्यों अंग्रेजों के चरित्र हीन चाटुकार गाँधी परिवार को सब कुछ मान लिया गया??

जब हमारे पास भगत सिंह और उधम सिंह का परिवार था, लौहपुरुष पटेल और श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे महान देशभक्त थे तो क्यों ''नेहरुद्दीन'' को सत्ता दिया गया?

जब हमारे पास वन्देमातरम जैसा ओजस्वी गान था तो क्यों इसे ज्यादा सम्मान नहीं दिया गया?

जब हमारे देश में भगत सिंह, राजगुरू, आजाद, उधम सिंह, लाला लाजपत राए, बाल गंगाधर तिलक, वीर सावरकर और बहुत से देशभक्त थे तो फ़िर क्यों अंग्रेजो गद्दारों के नाम पर देश के समारकों, चौराहों, शहरों आदि के नाम रखे गए ????

जब हमारे देश का इतना सुन्दर नाम भारत__हिन्दुस्तान था क्यो गुलामी का नाम इण्डिया रखा हुआ है ??

-अमित त्रिपाठी

सोमवार, 15 अक्टूबर 2012

राजनीतिक पार्टियों की आमदनी !

मित्रों,अभी कुछ दिनों पहले ही भारत की प्रमुख राजनीतिक पार्टियों की आमदनी के बारे में अखबारों में पढ़ने को मिला। देखकर मेरी आँखें फटी-की-फटी रह गईँ। हर्रे लगे न फिटकरी और रंग भी चोखा होए। तेल भी नहीं लगता और पूड़ी भी पकती जाती है,पकती जाती है। कहना न होगा आज राजनीति भी एक व्यवसाय है जिसमें शुरू में जनता में विश्वास बनाना पड़ता है और कुछ पैसा अपने पास से भी लगाना पड़ता है। एक बार पार्टी जनता के बीच स्थापित हो गई फिर तो बीसों ऊंगलियाँ घी में और सिर चाशनी की कड़ाही में। पारिवारिक वर्चस्व के चलते आज सारे दल चापलूसी के बेहतरीन अड्डे बन गए हैं। कोई भी नेता अपने पार्टी-नेतृत्व के खिलाफ जुबान ही नहीं खोल पाता। विरोध करते ही उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। क्या इस तानाशाही को लोकतंत्र का नाम दिया जा सकता है? जब पार्टियों में ही लोकतंत्र नहीं है तो वे क्या खाकर देश में लोकतंत्र और लोकतांत्रिक-संस्कृति को मजबूत करेंगी?
मित्रों,बैठे-बिठाये इतनी आमदनी तो शायद भारत के सबसे बड़े धनकुबेरों को भी नहीं होती होगी जितनी आज हमारे राजनीतिक दलों को हो रही है। आमदनी भरपूर और जिम्मेदारी कुछ भी नहीं। यहाँ तक कि 20000 रूपये से कम प्राप्त चंदे का विवरण देना भी आवश्यक नहीं और इस पर भी वे पूरा और सही विवरण नहीं देती हैं। कोई 10 प्रतिशत आमदनी का विवरण दे रहा है तो कोई 40 प्रतिशत का और कानून और न्यायालय फिर भी कुछ कर नहीं पा रहे हैं,क्यों? जब केजरीवाल अपने दल का आय-व्यय बताने को तैयार हैं तो अन्य पार्टियों को क्या परेशानी है और क्यों है? यह 20000 रूपये वाली सीमा भी सिर्फ जनता को धोखा देने के लिए है। अगर कोई 20000 रूपये की 20000 किस्तों में पैसा दे तो या फिर इस तरह ही चंदे की रकम दर्ज की जाए तो? इसलिए इन दलों के लिए एक-एक पैसे का हिसाब देना अनिवार्य किया जाए। पार्टियाँ बातें तो आम आदमी की करती हैं और काम पूंजीपतियों का करती हैं। उनको बताना ही चाहिए उनके खजाने में पैसा कहाँ से आता है। वे कौन-से लोग हैं जो उनकी पार्टी के फंड में करोड़ों-करोड़ रुपए देते हैं और क्यों देते हैं? इसके बदले में धनपतियों को क्या मिला,पार्टी ने क्या दिया तभी तो सामने आ पाएगा? दोनों मुद्दे एक-दूसरे से अंतर्गुंथित हैं। करोड़ों रुपए पार्टी फंड में देनेवाले पूंजीपति ऐसा कोई परोपकार की भावना से नहीं करते हैं बल्कि उनकी कुछ-न-कुछ बदले में पाने की उम्मीद लगी रहती है फिर चाहे लाभार्थी दल सत्ता में हो या विपक्ष में। सत्ता में हुआ तो वह धनपति को सीधे लाभ पहुँचाने की स्थिति में होता है जैसे बाड्रा और हरियाणा सरकार या फिर कोयला आबंटन में टाटा,अंबानी और जिंदल को प्राप्त लाभ का उदाहरण भी हम ले सकते हैं और अगर विपक्ष में हुआ तो फिर मंत्री को सिफारिशी पत्र तो लिख ही सकता है जैसा पिछले दिनों गडकरी ने संचेती के लिए लिखा। इतना ही नहीं कई बार तो धनपति राजनीतिक दलों को पैसा देकर सीधे लोकसभा या राज्यसभा का सदस्य ही बन जाते हैं जैसे अनिल अंबानी या विजय माल्या। वैसे हमारे कई परंपरागत नेता भी अब उद्योगों और व्यापार में हाथ आजमाने में पीछे नहीं हैं। चाहे वे दिवंगत विलासराव देशमुख हों या शरद पवार हों या फिर कमलनाथ जी हों। जाहिर है ये लोग भी सरकार में रहते हुए सरकार की नीतियों को अपने व्यापार के हितार्थ प्रभावित करते ही होंगे और बदले में पार्टी फंड में अपना अमूल्य योगदान भी करते होंगे।
         मित्रों,राजनीतिक दलों के लिए आय के स्रोत के साथ-साथ उन्होंने चंदे से प्राप्त धन का व्यय कहाँ-कहाँ किया यह बताना भी कानूनन जरूरी बनाया जाए। हवाई-यात्रा पर खर्च कर दिया या 8000 रूपये प्रति प्लेट वाला खाना खाया गया या पार्टियों और चुनावों के समय दारू की नदी बहा दी गई या इनका दुरूपयोग वोट खरीदने में किया गया? 'माल महाराज के मिर्जा खेले होली' बहुत दिन चल गया अब नहीं चलने वाला है,किसी भी कीमत पर नहीं। वोट हमारा काम तु्म्हारा आखिर कहाँ का न्याय है?
          मित्रों,क्या विडंबना है कि लगभग पूरा देश,पूरा शासन-प्रशासन आरटीआई के दायरे में है और शासन-प्रशासन को चलानेवाले दल ही इसके दायरे में नहीं हैँ। जबकि उनके बारे में जानने का जनता का अधिकार तो और भी ज्यादा है? जनता के लिए य़ह जानना तो और भी ज्यादा जरूरी है कि वे जिन राजनीतिक दलों को वोट दे रहे हैं वे कर क्या रहे हैं? कहीं वे लेन-देन की दुकान तो नहीं बन गए हैं?
           मित्रों, जैसा कि हम इस आलेख की शुरुआत में भी अर्ज कर चुके हैं कि आज लोकतंत्र की सबसे महत्त्वपू्र्ण ईकाई राजनीतिक पार्टियों में ही लोकतंत्र नहीं है। भाजपा और साम्यवादी दलों को छोड़कर सारे दल पारिवारिक कंपनियों की तरह हैं। पार्टियों का दुकानों में बदल जाना और वो भी खानदानी दुकानों में किसी भी तरह से भारतीय लोकतंत्र की प्रगति की दिशा में स्वस्थ गतिविधि नहीं है। जब जी चाहा पार्टी का संविधान बदल दिया। यह अधिकार उनको दिया ही क्यों गया है और कैसे दिया जा सकता है? इन दलों के हित सिर्फ इनके व्यक्तिगत हित नहीं हैं बल्कि इनसे हमारे देश और प्रदेशों के हित भी प्रभावित होते हैं,जुड़े हुए हैं। हमारे देश में एक ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि जिससे सारे दलों के लिए एक समान नियम हों। जैसे कि पार्टी के पंजीकृत-कार्यकर्ता सीधे पार्टी-पदाधिकारियों का चुनाव करें। जैसे कि कोई व्यक्ति या उसका रक्त-संबंधी लगातार एक या दो बार से ज्यादा एक ही पद को धारण नहीं कर पाए। ऐसी व्यवस्था हमारे यहाँ प्राचीन काल में भी थी। संगम काल में या चोल-शासन में तमिलनाडु में स्थानीय-निकायों में एक ही व्यक्ति या उसका रक्त-संबंधी लगातार दो सालों तक एक ही पद के लिए चुना नहीं जा सकता था। ऐसा नहीं होता था कि खुद पद से हटना पड़े तो भाई,लड़के या पत्नी को बिठा दिया। जब ऐसा प्राचीन काल में हो सकता था तो अब ऐसा क्यों संभव नहीं है?
मित्रों,सिर्फ व्यवस्था बना देने से भी कुछ नहीं होगा यह भी देखना पड़ेगा कि नियमों-उपनियमों का अनुपालन हो भी रहा है कि नहीं। तो इसके लिए या तो चुनाव आयोग को ही अधिकृत कर दिया जाए या ज्यादा अच्छा हो कि किसी पूरी तरह से स्वायत्त-निकाय की स्थापना की जाए जिसके अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति की प्रक्रिया पूरी तरह से पारदर्शी हो और जिसकी चयन समिति में न तो सरकार का बहुमत हो और न तो अन्य राजनीतिक दलों का ही। इसके साथ ही नियमों-कानूनों का उल्लंघन करने पर पार्टियों के लिए सख्त सजा का भी प्रावधान होना चाहिए। उनकी मान्यता रद्द कर देनी चाहिए और उनके प्रमुख नेताओं के चुनाव लड़ने पर आजीवन प्रतिबंध लगा दिया जाना चाहिए।
मित्रों,आर्थिक सुधारों से कम महत्वपूर्ण नहीं हैं ये प्रस्तावित और विलंबित सुधार क्योंकि इन सुधारों पर ही हमारे लोकतंत्र का भविष्य टिका हुआ है न कि आर्थिक सुधारों पर। दलों के संचालन और नियंत्रण के मामले में पारदर्शिता लाना जरूरी ही नहीं महाजरूरी है क्योंकि ऐसा नहीं होने से ही देश-प्रदेश में भ्रष्टाचार और धनिकतंत्र को बढ़ावा मिलता है। इसके चलते ही राजनीति आज एक गंदी गाली बनकर रह गई है। इस तरह के ऐहतियाती उपायों के बावजूद अगर धनपति चाहें तो पार्टी फंड में पैसा नहीं देकर उसी तरह से पार्टी नेतृत्व को लाभ पहुँचा सकते हैं जैसा कि वाड्रा के मामले में डीएलएफ ने किया फिर भी इससे काफी हद तक राजनीति के क्षेत्र से गंदगी को साफ करने में मदद मिल सकेगी, इसमें सन्देह नहीं। इन उपायों को लागू करने के लिए अगर संविधान में हजारों संशोधन भी करना पड़े,यहाँ तक कि संविधान को ही फिर से लिखना पड़े तो वह भी किया जाए क्योंकि ऐसा किए बिना राह से भटके हुए भारतीय लोकतंत्र को फिर से पटरी पर लाया ही नहीं जा सकता।

- ब्रज किशोर सिंह 

राजनीति भी एक व्यवसाय है

मित्रों,अभी कुछ दिनों पहले ही भारत की प्रमुख राजनीतिक पार्टियों की आमदनी के बारे में अखबारों में पढ़ने को मिला। देखकर मेरी आँखें फटी-की-फटी रह गईँ। हर्रे लगे न फिटकरी और रंग भी चोखा होए। तेल भी नहीं लगता और पूड़ी भी पकती जाती है,पकती जाती है। कहना न होगा आज राजनीति भी एक व्यवसाय है जिसमें शुरू में जनता में विश्वास बनाना पड़ता है और कुछ पैसा अपने पास से भी लगाना पड़ता है। एक बार पार्टी जनता के बीच स्थापित हो गई फिर तो बीसों ऊंगलियाँ घी में और सिर चाशनी की कड़ाही में। पारिवारिक वर्चस्व के चलते आज सारे दल चापलूसी के बेहतरीन अड्डे बन गए हैं। कोई भी नेता अपने पार्टी-नेतृत्व के खिलाफ जुबान ही नहीं खोल पाता। विरोध करते ही उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। क्या इस तानाशाही को लोकतंत्र का नाम दिया जा सकता है? जब पार्टियों में ही लोकतंत्र नहीं है तो वे क्या खाकर देश में लोकतंत्र और लोकतांत्रिक-संस्कृति को मजबूत करेंगी?
मित्रों,बैठे-बिठाये इतनी आमदनी तो शायद भारत के सबसे बड़े धनकुबेरों को भी नहीं होती होगी जितनी आज हमारे राजनीतिक दलों को हो रही है। आमदनी भरपूर और जिम्मेदारी कुछ भी नहीं। यहाँ तक कि 20000 रूपये से कम प्राप्त चंदे का विवरण देना भी आवश्यक नहीं और इस पर भी वे पूरा और सही विवरण नहीं देती हैं। कोई 10 प्रतिशत आमदनी का विवरण दे रहा है तो कोई 40 प्रतिशत का और कानून और न्यायालय फिर भी कुछ कर नहीं पा रहे हैं,क्यों? जब केजरीवाल अपने दल का आय-व्यय बताने को तैयार हैं तो अन्य पार्टियों को क्या परेशानी है और क्यों है? यह 20000 रूपये वाली सीमा भी सिर्फ जनता को धोखा देने के लिए है। अगर कोई 20000 रूपये की 20000 किस्तों में पैसा दे तो या फिर इस तरह ही चंदे की रकम दर्ज की जाए तो? इसलिए इन दलों के लिए एक-एक पैसे का हिसाब देना अनिवार्य किया जाए। पार्टियाँ बातें तो आम आदमी की करती हैं और काम पूंजीपतियों का करती हैं। उनको बताना ही चाहिए उनके खजाने में पैसा कहाँ से आता है। वे कौन-से लोग हैं जो उनकी पार्टी के फंड में करोड़ों-करोड़ रुपए देते हैं और क्यों देते हैं? इसके बदले में धनपतियों को क्या मिला,पार्टी ने क्या दिया तभी तो सामने आ पाएगा? दोनों मुद्दे एक-दूसरे से अंतर्गुंथित हैं। करोड़ों रुपए पार्टी फंड में देनेवाले पूंजीपति ऐसा कोई परोपकार की भावना से नहीं करते हैं बल्कि उनकी कुछ-न-कुछ बदले में पाने की उम्मीद लगी रहती है फिर चाहे लाभार्थी दल सत्ता में हो या विपक्ष में। सत्ता में हुआ तो वह धनपति को सीधे लाभ पहुँचाने की स्थिति में होता है जैसे बाड्रा और हरियाणा सरकार या फिर कोयला आबंटन में टाटा,अंबानी और जिंदल को प्राप्त लाभ का उदाहरण भी हम ले सकते हैं और अगर विपक्ष में हुआ तो फिर मंत्री को सिफारिशी पत्र तो लिख ही सकता है जैसा पिछले दिनों गडकरी ने संचेती के लिए लिखा। इतना ही नहीं कई बार तो धनपति राजनीतिक दलों को पैसा देकर सीधे लोकसभा या राज्यसभा का सदस्य ही बन जाते हैं जैसे अनिल अंबानी या विजय माल्या। वैसे हमारे कई परंपरागत नेता भी अब उद्योगों और व्यापार में हाथ आजमाने में पीछे नहीं हैं। चाहे वे दिवंगत विलासराव देशमुख हों या शरद पवार हों या फिर कमलनाथ जी हों। जाहिर है ये लोग भी सरकार में रहते हुए सरकार की नीतियों को अपने व्यापार के हितार्थ प्रभावित करते ही होंगे और बदले में पार्टी फंड में अपना अमूल्य योगदान भी करते होंगे।
         मित्रों,राजनीतिक दलों के लिए आय के स्रोत के साथ-साथ उन्होंने चंदे से प्राप्त धन का व्यय कहाँ-कहाँ किया यह बताना भी कानूनन जरूरी बनाया जाए। हवाई-यात्रा पर खर्च कर दिया या 8000 रूपये प्रति प्लेट वाला खाना खाया गया या पार्टियों और चुनावों के समय दारू की नदी बहा दी गई या इनका दुरूपयोग वोट खरीदने में किया गया? 'माल महाराज के मिर्जा खेले होली' बहुत दिन चल गया अब नहीं चलने वाला है,किसी भी कीमत पर नहीं। वोट हमारा काम तु्म्हारा आखिर कहाँ का न्याय है?
          मित्रों,क्या विडंबना है कि लगभग पूरा देश,पूरा शासन-प्रशासन आरटीआई के दायरे में है और शासन-प्रशासन को चलानेवाले दल ही इसके दायरे में नहीं हैँ। जबकि उनके बारे में जानने का जनता का अधिकार तो और भी ज्यादा है? जनता के लिए य़ह जानना तो और भी ज्यादा जरूरी है कि वे जिन राजनीतिक दलों को वोट दे रहे हैं वे कर क्या रहे हैं? कहीं वे लेन-देन की दुकान तो नहीं बन गए हैं?
           मित्रों, जैसा कि हम इस आलेख की शुरुआत में भी अर्ज कर चुके हैं कि आज लोकतंत्र की सबसे महत्त्वपू्र्ण ईकाई राजनीतिक पार्टियों में ही लोकतंत्र नहीं है। भाजपा और साम्यवादी दलों को छोड़कर सारे दल पारिवारिक कंपनियों की तरह हैं। पार्टियों का दुकानों में बदल जाना और वो भी खानदानी दुकानों में किसी भी तरह से भारतीय लोकतंत्र की प्रगति की दिशा में स्वस्थ गतिविधि नहीं है। जब जी चाहा पार्टी का संविधान बदल दिया। यह अधिकार उनको दिया ही क्यों गया है और कैसे दिया जा सकता है? इन दलों के हित सिर्फ इनके व्यक्तिगत हित नहीं हैं बल्कि इनसे हमारे देश और प्रदेशों के हित भी प्रभावित होते हैं,जुड़े हुए हैं। हमारे देश में एक ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि जिससे सारे दलों के लिए एक समान नियम हों। जैसे कि पार्टी के पंजीकृत-कार्यकर्ता सीधे पार्टी-पदाधिकारियों का चुनाव करें। जैसे कि कोई व्यक्ति या उसका रक्त-संबंधी लगातार एक या दो बार से ज्यादा एक ही पद को धारण नहीं कर पाए। ऐसी व्यवस्था हमारे यहाँ प्राचीन काल में भी थी। संगम काल में या चोल-शासन में तमिलनाडु में स्थानीय-निकायों में एक ही व्यक्ति या उसका रक्त-संबंधी लगातार दो सालों तक एक ही पद के लिए चुना नहीं जा सकता था। ऐसा नहीं होता था कि खुद पद से हटना पड़े तो भाई,लड़के या पत्नी को बिठा दिया। जब ऐसा प्राचीन काल में हो सकता था तो अब ऐसा क्यों संभव नहीं है?
मित्रों,सिर्फ व्यवस्था बना देने से भी कुछ नहीं होगा यह भी देखना पड़ेगा कि नियमों-उपनियमों का अनुपालन हो भी रहा है कि नहीं। तो इसके लिए या तो चुनाव आयोग को ही अधिकृत कर दिया जाए या ज्यादा अच्छा हो कि किसी पूरी तरह से स्वायत्त-निकाय की स्थापना की जाए जिसके अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति की प्रक्रिया पूरी तरह से पारदर्शी हो और जिसकी चयन समिति में न तो सरकार का बहुमत हो और न तो अन्य राजनीतिक दलों का ही। इसके साथ ही नियमों-कानूनों का उल्लंघन करने पर पार्टियों के लिए सख्त सजा का भी प्रावधान होना चाहिए। उनकी मान्यता रद्द कर देनी चाहिए और उनके प्रमुख नेताओं के चुनाव लड़ने पर आजीवन प्रतिबंध लगा दिया जाना चाहिए।
मित्रों,आर्थिक सुधारों से कम महत्वपूर्ण नहीं हैं ये प्रस्तावित और विलंबित सुधार क्योंकि इन सुधारों पर ही हमारे लोकतंत्र का भविष्य टिका हुआ है न कि आर्थिक सुधारों पर। दलों के संचालन और नियंत्रण के मामले में पारदर्शिता लाना जरूरी ही नहीं महाजरूरी है क्योंकि ऐसा नहीं होने से ही देश-प्रदेश में भ्रष्टाचार और धनिकतंत्र को बढ़ावा मिलता है। इसके चलते ही राजनीति आज एक गंदी गाली बनकर रह गई है। इस तरह के ऐहतियाती उपायों के बावजूद अगर धनपति चाहें तो पार्टी फंड में पैसा नहीं देकर उसी तरह से पार्टी नेतृत्व को लाभ पहुँचा सकते हैं जैसा कि वाड्रा के मामले में डीएलएफ ने किया फिर भी इससे काफी हद तक राजनीति के क्षेत्र से गंदगी को साफ करने में मदद मिल सकेगी, इसमें सन्देह नहीं। इन उपायों को लागू करने के लिए अगर संविधान में हजारों संशोधन भी करना पड़े,यहाँ तक कि संविधान को ही फिर से लिखना पड़े तो वह भी किया जाए क्योंकि ऐसा किए बिना राह से भटके हुए भारतीय लोकतंत्र को फिर से पटरी पर लाया ही नहीं जा सकता।

भाजपा उनसे ज्यादा भयभीत है।

जल्द ही नया राजनीतिक दल बनाने जा रहे अरविंद केजरीवाल भले ही लगातार दिल्ली सरकार व सोनिया गांधी के जवांई राबर्ड वाड्रा के बहाने कांग्रेस पर हमले बोलते जा रहे हों, मगर भाजपा उनसे ज्यादा भयभीत है। उसे डर है कि वे न केवल कांग्रेस विरोधी वोटों में, जो कि इस बार भाजपा को मिलने की उम्मीद थी, में हिस्सा बांटेंगे, अपितु भाजपा से निराश मतदाताओं में भी सेंध डालेंगे।
हिंदूवादी भाजपा केजरीवाल से कितनी भयभीत है, इसका अनुमान इस विश्लेषण के साथ दिए गए चित्र से, जो कि किसी हिंदूवादी ने फेसबुक पर लगाया है, से लगाया जा सकता है। जैसे ही यह चित्र फेसबुक पर लगा, टिप्पणियों का तांता लग गया। हिंदूवादियों ने केजरीवाल को न केवल भद्दी-भद्दी गालियां बकीं, अपितु उन्हें कांग्रेस व सोनिया का एजेंट तक करार दे दिया। इस बहसबाजी में बेचारे केजरीवाल समर्थक बार-बार शालीन भाषा में सफाई देते रहे, मगर हिंदूवादियों ने उन पर ताबड़तोड़ हमले जारी रखे।
असल में प्रतीत ये होता है कि जो केजरीवाल पहले कांग्रेस पर हमले बोलने के कारण भाजपा को बड़े प्रिय लग रहे थे और इसी वजह से भाजपाइयों ने उनका साथ दिया, वे ही जब दोधारी तलवार की तरह भाजपा पर भी हमले करने लगे तो भाजपाइयों को सांप सूंघ गया है। संघ व भाजपा ने टीम अन्ना का पीछे से साथ दिया ही इस कारण था कि जो काम वह खुद नहीं कर पाई, वह टीम अन्ना कर रही थी। जो माहौल भाजपा के दिग्गज लाल कृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा से नहीं बन पाया, वह टीम अन्ना ने खड़ा करके दिखा दिया। जाहिर सी बात है कि खुद भी भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी भाजपा स्वयं तो कांग्रेस के विरोध में सशक्त आंदोलन खड़ा नहीं कर पाई, मगर बिना स्वार्थ के केवल देशभक्ति के लिए आंदोलन करने वाली टीम अन्ना ने वह माहौल खड़ा कर दिया, जिसका सीधा-सीधा लाभ भाजपा को होना था। तब तक इस बात की आशंका नहीं थी कि केजरीवाल अलग से पार्टी बनाएंगे, इस कारण भाजपा यही सोच रही थी कि वह टीम अन्ना के आंदोलन से बना कांग्रेस विरोधी माहौल अपने पक्ष में वोटों के रूप में भुना लेगी। मगर जैसे ही केजरीवाल टीम अन्ना से अलग हो कर नई पार्टी बनाने का उतारु हुए, भाजपा का सोचा हुआ प्लान बिगड़ गया। इतना ही नहीं केजरीवाल ने भाजपा को भी निशाने पर ले लिया। कोयला घोटाले में तो उन्होंने कांग्रेस व भाजपा को एक ही तराजू में तोल दिया। इससे बड़ा नुकसान ये हुआ कि जो भाजपा कांग्रेस के विकल्प के रूप में लोगों को स्वीकार्य थी, उस पर भी कालिख पुत गई। कांग्रेस तो चलो पहले से बदनाम थी, इस कारण कोयला घोटाले की कालिख से जहां सत्यानाश, वहां सवा सत्यानाश वाली कहावत की चरितार्थ हो रही थी, मगर दूध की धुली कहलाने वाली भाजपा की सफेद कमीज पर लगी थोड़ी भी कालिख उभर कर मुंह चिढ़ा रही है। इतने पर भी भाजपा ने सबक नहीं लिया। बिजली बिल को लेकर दिल्ली में चल रहे आंदोलन में भाजपा नेता विजय गोयल ने सदाशयता में केजरीवाल को मंच पर बुला लिया और केजरीवाल ने सिला ये दिया कि पलट कर भाजपा पर ही हमला बोल दिया। गोयल पछताए तो बहुत, मगर रोने के सिवाय उनके पास कोई चारा नहीं था। इस घटना के बाद अब भाजपा बेहद सतर्क हो गई है।
इसी कड़ी में किसी भाजपाई ने फेसबुक पर मुहिम के रूप में यह चित्र शाया किया, ताकि हिंदूवादी वोट खिसक कर केजरीवाल की ओर न चले जाएं। इस चित्र पर प्रतिक्रिया करते हुए भाजपाइयों ने अनेक उदाहरण देते हुए केजरीवाल को कांग्रेस जैसा ही सेक्युलर कुत्ता करार दिया। ये बहस इतनी घटिया स्तर पर हो रही है कि उसमें प्रयुक्त शब्दों का उल्लेख तक करना मर्यादा के खिलाफ प्रतीत होता है।
कुल मिला कर सच ये है कि कांग्रेस व भाजपा को एक जैसा बताने की कोशिश में केजरीवाल कांग्रेस से ज्यादा नुकसान भाजपा को पहुंचा रहे हैं। आगे आगे देखें होता क्या है?
-तेजवानी गिरधर

किसी को इज्जत की परवाह नहीं !

हरियाणा में एक महीने में बलात्कार की 16 घटनाएं हो जाती हैं...पुलिस ज्यादातर मामलों में आरोपियों को गिरफ्तार करने में भी नाकाम साबित होती है...ऐसे में यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी जो कि खुद एक महिला हैं...हरियाणा के जींद में एक पीड़ित दलित परिवार के घर पहुंचती है...सोनिया पीड़ित परिवार को ढ़ांढ़स तो बंधाती हैं...लेकिन घर से बाहर निकलते ही वे भूल जाती हैं कि वे भी शायद एक महिला हैं...ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि बाहर निकलकर सोनिया गांधी से तो कम से कम एक इतने संवेदनशील मुद्दे पर ऐसे बयान की उम्मीद कतई नहीं थी। सोनिया इन घटनाओं के लिए राज्य की कांग्रेस सरकार...जो कि उनकी ही पार्टी की है...पर ये कहते हुए पर्दा डालने की कोशिश करती हैं...कि बलात्कार की घटनाएं तो देशभर में हो रही हैं...खैर सोनिया ने ये कहा सो कहा...सोनिया के इस बयान के बाद से इस मुद्दे पर राजनीति गर्मा जाती है...और तमाम विपक्षी दल सोनिया के इस बयान की आलोचना करते हैं...लेकिन योगगुरु बाबा रामदेव जिनकी कर्मभूमि भले ही हरिद्वार हो लेकिन उनकी जन्मभूमि तो हरियाणा हैं...लगता है इस बयान से कुछ ज्यादा ही आहत हो गए...और सोनिया पर ये कहकर वार करते हैं कि...सोनिया जी अगर ये घटना आपकी बेटी के साथ होती तो क्या तब भी आप ऐसा ही बयान देती। अब रामदेव के इस बयान के पीछे की वजह सिर्फ और सिर्फ सोनिया का बयान ही था या फिर केन्द्र सरकार के खिलाफ उनकी बौखलाहट ये तो आप भी बेहतर समझ गए होंगे। बहरहाल सोनिया के बयान के बाद उठे बवाल को रामदेव ने ये कहकर उबाल जरूर दे दिया...अबकी बार रामदेव ने सीधा सोनिया गांधी पर हमला बोला था...वो भी तीखा तो कांग्रेसी कहां पीछे रहने वाले थे। एक एक कर केन्द्र सरकार के मंत्री और कांग्रेसी नेता रामदेव पर बरस पड़ते हैं...औऱ रामदेव के योगगुरु होने पर ही सवाल खड़े कर देते हैं। बड़ा सवाल ये भी है कि रामदेव के जिस बयान पर कांग्रेस बौखलाई हुई है...शायद कांग्रेस ये भूल गई कि ऐसा ही कुछ बयान कांग्रेस नेता रीता बहुगुणा ने करीब ढाई साल पहले दिया था...जब रीता ने बुलंदशहर में सरेआम एक सभा में कहा था कि उत्तर प्रदेश में अपराध का बोलबाला है और यूपी में लड़कियों की ईज्जत लूटी जा रही है...और बसपा सरकार तसल्ली के लिए मुआवजा बांट रही हैं...इसलिए मैं कहती हूं की दो लाख रूपए मुझ से ले लो और कर दो मायावती का बलात्कार फिर देखते हैं क्या होता है। रीत बहुगुणा जोशी के इस बयान के बाद बसपा कार्यकर्ताओं ने रीता के घर में आग लगा दी थी...लेकिन आज रामदेव सोनिया गांधी पर कुछ ऐसा ही बयान देते हैं तो कांग्रेस बौखला जाती है। राजनीति को इसी लिए सियूटिब्लयूटी का खेल कहा जाता है...जो अपने पर सूट करे वो तो सही है...जो न करे उस पर सामने वाले की जमकर खबर ले लो। बयानों की इस जंग के बीच इनेलो के ओम प्रकाश चौटाला साहब खाप पंचायतों के उस फैसले का समर्थन करते दिखाई देते हैं...जिसमें खाप पंचायतें कहती हैं...कि लड़कियों की शादी 15 वर्ष की उम्र तक कर देनी चाहिए ताकि बलात्कार की घटनाओं को कम किया जा सके। एक नई जुबानी जंग शुरू  जाती है...लेकिन हरियाणा में एक महीने में हुई बलात्कार की घटनाओं के पीड़ित औऱ उनके परिवार पर क्या गुजर रही होगी...इसका ख्याल किसी को नहीं है। विडंबना तो ये है कि पीडितों के हिमायती बनने वाले ये राजनीतिक दल किसी भी घटना के बाद घड़ियाली आंसू बहाते तो दिखाई दे जाते हैं...लेकिन इन घटनाओं को कम करने या रोकने के लिए...और आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए कोई सख्त कदम उठाने के लिए पहल करते नहीं दिखाई देते। इसे देश का दुर्भाग्य ही कहेंगे कि हमारे राजनेता हर घटना पर राजनीति करने से बाज नहीं आते फिर चाहे किसी की बहू – बेटी की इज्जत आबरू की क्यों न दांव पर लगी हो। राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के आंकड़ें तो इसकी भयावहता खुद बयां करते नजर आते हैं कि वाकई में देशभर में महिलाएं कितनी सुरक्षित हैं। हरियाणा की ही अगर बात कर लें तो औसतन यहां रोज दो लड़कियां बलात्कार की शिकार हो रही हैं। पुलिस के आंकड़ें कहते हैं कि 2012 में हरियाणा में अब तक करीब 460 बलात्कार की घटनाएं हो चुकी हैं। जबकि 2011 में ये संख्या 733 थी। ये तो महज वे आंकड़ें हैं जो दर्ज हैं...ऐसे सैंकड़ों मामले और भी हैं जो किसी सरकारी रजिस्टर में लोक लाज के भय से या फिर दबंगों के डर से दर्ज नहीं हो पाते...यानि कि ये घटनाएं जितनी सामने आती हैं...उससे कही ज्यादा होती हैं। ऐसे में सवाल यही उठता है कि आखिर कब भले मानस का लबादा ओढ़कर हमारे बीच में घूम रहे ऐसे वह्शी दरिंदों के खिलाफ पुलिस और राज्य सरकारें उनके रसूख औऱ राजनीतिक कनेक्शन को दरकिनार करते हुए दबंगई से उनके खिलाफ कार्रवाई करेंगी...और उन्हें जेल की सलाखों के पीछे भेजेंगी ताकि युवतियां – महिलाएं बैखौफ होकर घर से बाहर निकल सकें...हालांकि ऐसा तब तो कम से कम संभव नहीं दिखाई देता जब तक सरकार में बैठे लोग भाई भतीजावाद और अपनी कुर्सी की महत्वकांक्षा को त्याग कर काम नहीं करेंगे। उम्मीद करते हैं कि अगली बार देश के जिम्मेदार नेताओं और लोगों से तो कम से कम ऐसे बयान सुनने को न ही मिले...जिनसे लोगों को बड़ी उम्मीदें हैं। उम्मीद तो ये भी कर सकते हैं कि ऐसी घटनाएं ही हमें सुनने को न मिले...हालांकि ऐसी बातें तो हमारे राजनेता भी बखूबी कर लेते हैं...लेकिन कहते हैं न अच्छा सोचना और अच्छा करना दोनों में बड़ा फर्क है...बस जरूरत है तो इस बात को समझने कि...देखते हैं इस चीज को समझने वाले हमारे देश में कितने लोग हैं।
 
- दीपक तिवारी 

हत्या एक जुर्म है, चाहे मनुष्य की हत्या हो या किसी पशु, पंछी की.......

''Right to live'' should be equal for Animals and Human......Think it.

शेर , बाघ या हीरण मारने पर देश का कानून सजा का निर्धारण करता है और बकरा , गौ , मुर्गे और मछली को मारने पर कोई कानून नही जबकि हत्या तो हत्या ही है जिसको भगवान ने धडकता हुआ दिल , सांस लेने का अधिकार दिया है उसकी हत्या एक जुर्म मानी चाहिए और रोक लगाने का कदम उठाना चाहिए वो चाहे मनुष्य की हत्या हो या किसी पशु, पंछी की.......

''जीवन का अधिकार सब का ही है''.......... संविधान में संशोधन की आवश्यकता है......
अगर राक्षस ढूंढने हो तो प्राचीन युग मे जाने की आवश्यकता नहीं .....ये चिकिन,बिरियानी ,मटन आदि खाने वाले गिद्ध आपको अपने आस पास ही मिल जाएगे। सात्विक भोजन के लाखो विकल्प है , अनेक व्यंजन है , पर नहीं ये तो मुर्गो ,और बकरो को काट काट कर ही खाएँगे कलयुग के राक्षस का तमगा तभी तो मिलेगा ऐसे लोगो को ।

थोड़ा सोचो ...मनुष्य हो या पशु......... देह का आकार अलग है , देह कीबनावट अलग है ... पर आत्मा तो दोनों मे एक सी ही है ..... शरीर स्वयं तो नहीं जीता आत्मा ही उसेजीवटता प्रदान करती है तो
एक मनुष्य की हत्या करने पर जितना पाप लगता है उससे भी अधिक पाप एक पशु की हत्या करने पर लगता है , पशु पर अधिक इसलिए क्यो को इंसानगलतिया करते है पाप भी करते है उनकी हत्या पर पाप कम होगा किन्तु तुम कुत्ते जिन निर्मुक जीवो की खाल को खींच खीच कर उनके मास को नोचते हो उन्होने तुम्हारा न कुछ बुरा किया न वो कुछ गलत करते है ।

तुम्हारी एक उंगली थोड़ी सी कट भी जाये तो कितनी पीड़ा होती होगी तुम्हें ..... सोचो उस बेचारेपशु को जब काटा जाता होगा तो क्या उसे पीड़ा नही होती होगी वोचिल्ला नहीं सकता पर आत्मिक चीख तो उसकी भी निकल पड़ती होगी जब वो देखता होगा हा अब उसे काटकर कुछ नीच , राक्षस अपना भोजन बनाने वाले है ।

जो मास खाते है वो ये बताए अगर तुम्हारी संतान को कोई काटकर ऐसे ही .......तो ????? अगर तुम अपनीसंतान की एक उंगली में थोड़ा सा खून भी नहीं देख सकते तो फिर निर्मुक जीवो को काटकर तुम लोग कैसे खा जाते हो ? अगर तुम जानवरो को को मार कर खा सकते हो तो इन्सानो का भी मास खाना तुम लोगो के लिए कोई बड़ी बात नहीं है । तो किसी पशु को खाने का अधिकार तुम्हें तभी होगा यदि तुममे अपनी संतान को काटकर खाने की हिम्मत है और तुम खा भी सकते हो क्यो की दया ,प्रेम जैसे भाव तो तुम्हारे उसी दिन खत्म हो जाते है जब तुम मास सटकते हो ।

तुम जानवरो का मास खा रहे हो .......तो तुम्हारी औलादों इन्सानो का मास खाने से परहेज नहीं करेगी.........जो भी आज इन्हे काट रहे है , या मास भक्षण कर रहे है ... वो याद रखे एक दिन उन्हे भी ऐसे ही काटकर खाया जाएगा .......


और में अपनी तरफ से उन्हे एक सुझाव दूंगा --"आगर तुम लोगो की प्रवर्ती राक्षसो जैसी ही हो गयी है .....और असात्विक भोजन ही करना है तो किसी शोचलाय में जाकरमलभक्षण कर लिया करो ...... मास खाने से तो अच्छा रहेगा ये तुम्हारे लिए, पाप भी नहीं लगेगा। और फिर ये तुम लोगो के लिये बड़ी बात थोड़े ही है जब तुम लोगे अंडे से मुर्गे के वीर्य कोनिकालकर तल कर खा सकते हो तो ये कौन सी बड़ी बात है ............... ............... .......... अब भी संभल जाओ........ जय जय श्री राम

- पंडित राजन शर्माजी

रविवार, 14 अक्टूबर 2012

उ.प्र. नीचता में भी लल्लन टॉप !


चोरी-चमारी भ्रष्टाचार हत्या बलात्कार अपहरण घोटाला महा घोटाला नीचता कमीनापन अधर्म कुकर्म की जब कभी भी आगे आने वाले इतिहास में चर्चा होगी तब उत्तर प्रदेश का नाम इन सदगुणों को अपनाने वाले भारतीय राज्यों में सबसे ऊपर स्वर्ण अक्षरों में लिखा जायेगा यह दुर्भाग्यपूर्ण है की उत्तर प्रदेश को आज़ादी के बाद राज्य सँभालने के नाम पर जो भी नेतृत्व मिला वह स्वार्थी भ्रष्ट और नीचता की पराकाष्ठा पर रहा. यहाँ की जनता अपनी छोटी-छोटी समस्याओं को लेकर त्राहि-त्राहि करती रही और यहाँ के अवसर वादी परिवारवादी नेता जनता के पैसे पर अय्याशी करते रहे. दूसरे राज्य के लोग उत्तर प्रदेश का क्या मुकाबला करेंगे. 100-50 करोड़ का घोटाला करके अन्य राज्यों के नेता अपने आपको तीस मार खां समझते हैं उत्तर प्रदेश में महाकुम्भ घोटाला ही हजारों करोड़ का हो गया आपको उत्तर प्रदेश के नेताओं, कार्यदायी संस्थाओं के अधिकारिओं, प्रशासन के लोगों नेताओं और हजारों बाबुओं के चेहरे पर शर्म दिखाई दे रही है. नीचता ने इन्हें बे शर्मी की भी पराकाष्ठा पर पहुंचा दिया है. जबसे उत्तर प्रदेश का शाशन एक पिता ने भावुकता में अपने बच्चे को सौंप दिया है तबसे इस राज्य में खेल ही खेल हो रहा है. विकास के सारे कार्य भरपूर पैसा दिए जाने के बावजूद रुक गए हैं. जिसे देखिये वही अपनी जेब भर रहा है और सरकार भ्रष्टाचारीयों, अपराधियों और मक्कारों की पीठ थप थपा रही है और ऐसा हो भी क्यों न आखिर उत्तर प्रदेश कमीने पन में किसी से पीछे थोई न रहना चाहेगा. बड़े भाई खुशी मनाईये हम नीचता में लल्लन टॉप हैं और इलाहाबादी हैं इसलिए हमसे आगे कौन जायेगा- सत्य वचन से साभार. 

रोजगार दीजिए अखिलेश जी !


उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रदेश के नौ लाख बेरोजगारों को बेरोज़गारी भत्ता देने का इरादा बनाया था खजाने से इस खैरात को बटने के लिए जुगाड भी कर लिया गया था लेकिन हाय रे सरकार की मजबूरियां. कुल मिला कर तीन लाख स्वाभिमानी सम्मानित लोगों ने इस खैरात के लिए फॉर्म भरा और बाकी छे लाख लोगों को खैरात देने के लिए सरकार इंतज़ार ही करती रह गयी. इन तीन लाख लोगों में से लगभग दस हज़ार लोगों को लाखों रुपय खर्च करके एक भिक्षादान कार्यक्रम में प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने खैरात के चेक दिए. बाकी लोग भी चेक का इंतज़ार कर रहे हैं. आशचर्य है कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री इस तरह की खैरात बात कर मुफ्तखोरी और हरामखोरी को तो बढ़ावा दे रहे हैं लेकिन उनकी समझ में यह बात नहीं आ रही है कि बेरोज़गारी भत्ते के उम्मीदवार सम्मानित लोगों को नए उद्योग स्थापित करके काम पर कैसे लगाया जाये. मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की सरकार में जिन मंत्रियों से यथासमय कुछ बोलने की जनता आशा भी करती रही वो मुलायम सिंह यादव के डर के मारे चूहा बने बैठे हैं. बिल से निकले नहीं कि दबोच लिए जायेंगे इसलिए इन मंत्रियों ने सोह लिया है कि चुप रहने में ही फायेदा है कम से कम लाल बत्ती की गाड़ी तो बनी रहेगी पिछले दिनों आज़म खां साहब ने कुछ विचार रखे थे तब मुलायम सिंह यादव ने उनसे कहा था कि आप काफी योग्य हो गए हैं राजनीति की समझ भी आपकी काफी बढ़ गयी है आपको दिल्ली की राजनीति करनी चाहिए उसके बाद आज़म खां साहब को किसी ने बोलते नहीं सुना. ज़ाहिर है कि अब कोई ऐसा नहीं जो प्रदेश के मुख्यमंत्री को समझा सके कि उन्हें देश के युवाओं के बीच बेरोज़गारी भत्ता बाँट कर हरामखोरी को बढ़ावा नहीं देना चाहिए. हाँ यह भी सोचना होगा कि बाकी छे लाख बेरोजगारों की सरकारी अधिकारी कहीं कोई सूची तैयार करवा कर इनके हिस्से का बेरोज़गारी भत्ता कहीं खुद न लेले क्योंकि प्रदेश में यही तो काबिल लोग हैं जो सरकार में आते ही परमानेंट बेरोजगार हो जाते हैं.- सत्य वचन से साभार.