सब गोलमाल है भई गोलमाल है
-अजामिल
भारत
में टेलीविज़न प्रसारण का सफर 15 अगस्त 1959 को दूरदर्शन टी.वी. चैनल के साथ हुआ था
यह एक सरकारी टी.वी. चैनल था और सरकार की गाईड लाईन्स पर सरकार के लिए ही काम कर
रहा था इसकी बंधी-बंधाई सीमा थी सरकारी नीतियों और योजनाओं का प्रचार-प्रसार करना
इसका मुख्य काम था उस समय दूरदर्शन चैनल की विकास की गति को देख कर कोई सोच भी
नहीं सकता था कि पांच दशक पूरा करते-करते तक टेलिविज़न प्रसारण देश के सबसे बड़े
उद्योगों की पहली पंक्ति में पहुँच जायेगा. आज टेलिविज़न इंडस्ट्री का जो विस्तार
हमें दिखाई दे रहा है वह केबल क्रांति का नतीजा तो है ही लाखों केबल ऑपरेटर्स के
समर्पण, त्याग और परिश्रम का भी फल है. उन लाखों केबल ऑपरेटर्स का जिन्होंने विषम
से विषम परिस्थितियों में इस उद्योग को संभाले रखा ये अलग बात है कि आज मलाई और मख्खन
खाने के लिए बड़े उद्योग पतियों और विदेशी कम्पनियों की जमात इस धंधे में कूद पड़ी
है और केबल ऑपरेटर्स के हक और हुकूक संकट में आ गये हैं. दरअसल टेलिविज़न उद्योग ने
सामाजिक सरोकारों को हाशिए पर डाल दिया है और अब इस इंडस्ट्री में सारा खेल अधिक
से अधिक मुनाफा कमाने को लेकर चल रहा है. ज़ाहिर है कि प्रतिस्पर्धा प्रतियोगता में
बदल चुकी है आज अच्छे बुरे 200 के लगभग विभिन्न भाषाओँ के राष्ट्रीय और क्षेत्रीय
टी.वी. चैनल मैदान में हैं. इनके बीच दांत काट प्रतिस्पर्धा है. सभी की कोशिश ये
है कि जैसे भी हो बाज़ार में आगे बने रहो. मूल्यों और संस्काओं की चिन्ता अब इन
चैनलों को नहीं है. ये अपना काम बनता, भाड़ में जाए जनता के सिद्धांत पर चल रहे
हैं. तभी तो इतना लंबा सफर तय कर लेने के बाद भी भारतीय टेलिविज़न की कोई पहचान नही
बन पायी है. इन टेलिविज़न चैनलों से अगर फिल्म इंडस्ट्री का कचरा साफ़ कर दिया जाए
तो इन चैनलों के पास दिखने को कुछ नहीं बचेगा.
लंबे
समय तक दूरदर्शन के पास कोई ऐसा रास्ता नहीं था जिससे दूरदर्शन चैनल दर्शकों के
बीच अपनी लोकप्रियता का आकलन कर पाता और ना ही विज्ञापन दाताओं के पास ऐसा कोई
साधन था कि वे ये पता लगा पाते कि कौन सा चैनल दर्शकों के बीच ज्यादा लोकप्रिय हो
रहा है. इस अभाव के बावजूद 70-80 के दशक में दूरदर्शन के पास काफी विज्ञापन थे.
भारत में टी.वी. कार्यक्रमों की लोकप्रियता को मापने का काम 1983 में शुरू हुआ.
हिन्दुस्तान थॉमसन एसोशिएट और सर्वे एजेंसी इंडियन मार्केट रिसर्च ब्यूरो ये दो
ऐसी एजेंसीज़ थी जिन्होंने पहली बार दूरदर्शन कार्यक्रमों की लोकप्रियता का दर्शकों
के बीच जाकर सर्वेक्षण किया और यह बताया कि कौन सा कार्यक्रम कितना लोकप्रिय है और
लोग उसे किस समय में देखते हैं. बाद में इस एजेंसी के साथ आई.एम्.आरपी. और एम्.आर.एस.ब्रुक
एजेंसियां भी जुड गयी. इन एजेंसियों के एक साथ काम करने पर सर्वेक्षण का यह काम
ज्यादा गंभीरता से होने लगा. विज्ञापन दाताओं को यह सूचना आसानी से मिलने लगी कि
उनके उत्पाद का विज्ञापन टेलिविज़न सेट पर कब देखा जा रहा है उस दौर में इस
सर्वेक्षण के दौरान दर्शकों को एक डायरी में टी.वी. कार्यक्रमों के बारे में अपनी
राय दर्ज करने के लिए कहा गया था गौरतलब है कि उस ज़माने में दर्शकों की तुलना में
टेलिविज़न सेट्स कम हुआ करते थे मोहल्ले में पैसे वाले घरों में टेलिविज़न सेट होता
था अडोस-पड़ोस के लोग सुबह-शाम टी.वी. देखने के लिए पहुँच जाया करते थे. लिहाज़ा
सर्वेक्षण कंपनियों ने जो डायरी बाटी दर्शकों ने उसमे काफी रूचि दिखाई एजेंसियों
ने इस डायरी में दर्शकों के कमेंट्स को टी.वी. कार्यक्रमों की लोकप्रियता का आधार
बनाया और इस तरह टी.आर.पी. की सहेजने की प्रक्रिया शुरू हुई. आगे चल कर केबल
टी.वी. के आने के बाद सीएनएन, स्टार और एम् टी.वी. जैसे बड़े चैनल जब मैदान में आये
और इनका प्रसारण शुरू हुआ तब टी.आर.पी. तय करते समय इनके कार्यक्रमों को भी शामिल
कर लिया गया ये अलग बात है कि ये टी.वी. चैनल लंबे समय तक दूरदर्शन के विकल्प के
रूप में देखे जाते रहे.
शुरूआती
दौर में दूरदर्शन ने टी.आर.पी. के चक्कर और ज़रूरत से निपटने के लिए दूरदर्शन
ऑडियंस रिसर्च टेलिविज़न रेटिंग विंग तैयार किया था यह विंग दूरदर्शन की दर्शक
अनुसन्धान इकाई द्वारा 40 केन्द्रों और 100 आकाशवाणी केन्द्रों द्वारा दर्शक और
श्रोता की कार्यक्रम लोकप्रियता के आंकड़े एकत्र करता था धीरे-धीरे सर्वेक्षण का यह
काम विस्तृत होता गया तब इसमें कठिनाइयाँ पैदा होने लगीं दर्शकों की संख्या में
इजाफा हुआ तब दर्शकों तक पहुंचना मुश्किल हो गया डायरी सर्वेक्षण न काफी और
अमहत्वपूर्ण दिखाई देने लगा लेकिन टी.आर.पी. का जानना बेहद ज़रूरी था. विज्ञापन
दाताओं सर्वेक्षण एजेंसियों और चैनल के प्रतिनिधियों ने मिलजुल कर इस समस्या से
निपटने के लिए एक संयुक्त समिति बनाई तय यह किया गया कि टी.आर.पी. को जानने की
व्यवस्था पारदर्शी और वैज्ञानिक होने चाहिए ताकि अविश्वसनीयता की कहीं कोई
गुन्जायिश न रहे. आई.एम्.आर.बी. और ए.सी.नीलसन ने मिलकर उस समय यह प्रस्ताव रखा कि
टी.आर.पी. का काम टैम से करवाया जाना चाहिए यह प्रस्ताव स्वीकार भी कर लिया गया लेकिन
बजट से बाहर की यह योजना थी लिहाज़ा टैम के साथ सौदा नहीं पट पाया इस बीच ओ.आर.जी.
मार्ग ने इन टैम के माध्यम से टेलिविज़न रेटिंग के सर्वेक्षण का काम शुरू किया.
1998 में टैम के ज़रिये से यह काम विधिवत शुरू हो गया दरअसल टैम को इस काम में
उतारने का श्रेय इंडियन सोसायटी ऑफ एडवरटाईजर्स, इंडियन ब्रोडकास्ट फौंडेशन और
एडवरटाईजिंग एजेंसीज़ असोशिएसन ऑफ इंडिया को दिया जाना चाहिए.
2002 में एसी नीलसन का अधिग्रहण ओ.आर.जी.
मार्ग की प्रमुख कम्पनी वी.एन.यू. ने कर लिया इसी के साथ इनटैम टैम में मर्ज हो
गयी और नई कम्पनी का नाम टैम मिडिया रिसर्च टी.वी. रेटिंग सर्वेक्षण करने वाली भारत
की अकेली संस्था बन गयी. 2004 में एक और कम्पनी एमैप भी बाज़ार में आई लेकिन टैम
नीलसन कम्पनी और कंटर मिडिया रिसर्च के काम को आज ज्यादा महत्व दिया जा रहा है.
टेलिविज़न
रेटिंग पॉइंट की आकलन व्यवस्था को दुरस्त किये जाने के प्रयास अभी भी चल रहे हैं टी.वी.
चैनल प्रसारकों और विज्ञापन क्षेत्र की बड़ी कम्पनियों ने मिलकर इस काम के लिए
ब्रोडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउन्सिल यानी बार्क का गठन किया है यह कम्पनी अधिनियम
1956 की धारा 25 के तहत काम कर रही है यह एक गैर लाभकारी संस्था है और ब्रिटेन की
ब्रोडकास्टर्स ऑडियंस रिसर्च बोर्ड यानी बार्ब के मॉडल को अपनाये हुए है
विशेषज्ञों का मानना है कि यह मॉडल भारतीय टेलिविज़न इंडस्ट्री का आकलन ठीक प्रकार
नहीं कर पाता शायद यही वजह है कि बार्ब अभी तक कुछ भी उल्लेखनीय परिणाम नहीं दे
पाया जबकि कुछ विशेषज्ञ भारतीय टेलिविज़न इंडस्ट्री के हालातों का आकलन करते हुए बार्ब
की कार्य पद्धिति को सबसे ज्यादा उपयोगी मान रहे हैं उनका मानना है कि इसके पैनल
का डिजाईन सामान अनुपात में है और भौगोलिक और जनसँख्या से जुड़े अनुपात हीनता को दूर
करने में सक्षम है. बार्ब के पैनल में समाज के सभी आयु वर्ग और सामाजिक वर्ग का प्रतिनिधित्व सुनिशिचित किया गया है बाब अपने
सर्वेक्षण के दौरान लगभग 52,000 लोगो से मिलता है और इंटरव्यू के ज़रिये निष्कर्षों
पर पहुचता है बार्ब एक ऐसी सर्वेक्षण कम्पनी है जो अकेले काम नहीं करती यह अपना हर
काम किसी दूसरी कम्पनी या एजेंसी के साथ मिलकर करती है इसका परिणाम यह होता है कि
इस कम्पनी द्वारा संकलित आंकड़ो के साथ छेड़-छाड संभव नहीं हो पाती. बार्ब के आंकड़े
हर रोज भी मिल सकते हैं और साप्ताहिक स्तर पर भी. इसके बावजूद टी.आर.पी. ज़ारी करने
वाली एजेंसी टैम मिडिया रिसर्च के सर्वेक्षण में आई.आर.एस.और एन.आर.एस. की तरह न
तो पारदर्शिता है और न आंकड़ो की जाँच की कोई व्यवस्था. इसीलिए टैम का टी.आर.पी.
सर्वेक्षण संदेह के दायरे में रहता है जब तक इसे जांचने का कोई रास्ता नहीं निकलता
तब तक टी.आर.पी. का खेल ऐसे ही चलेगा.
टी.आर.पी.
के खेल को एक लंबे समय तक महत्वपूर्ण मानकर अपने टी.वी. चैनलों की रीति-नीति तय
करने वाले चैनल इन दिनों टी.आर.पी. नाम की खराब व्यवस्था से खुद बहुत परेशान है और
उनकी समझ में नहीं आ रहा है कि वे कार्यक्रमों की गुणवत्ता देखे या टी.आर.पी. की
प्रतिस्पर्धा में खुद को बरबाद करते रहें उनका मानना है कि टी.आर.पी. की पूरी व्यवस्था
ही बीमार और संदेहास्पद है इसमें न तो अभी तक सामाज के हर तबके की भागीदारी
सुनिशिचित हो पायी है और न हर क्षेत्र की. टी.आर.पी. को लेकर टी.वी. चैनलों में 24
घंटे तनाव बना रहता है चैनल प्रमुखों के दिलों की धडकन इन दिनों टी.आर.पी. के उतार
चढ़ाव पर ही निर्भर कर रही हैं न्यूज़ ब्रेक करने की जल्दबाजी में बड़ी से बड़ी खबर टी.वी.
से गायब हो जाती हैं. टी.आर.पी. ने हालात ऐसे कर दिए हैं कि कई चैनलों में तो चैनल
प्रमुख की नौकरी मुश्किल में पड़ गयी है इन चुनौतियों के चलते कुछ भी नया करने की न
सम्भावना बची है और न उत्साह ही. दूसरी ओर टी.आर.पी. की व्यवस्था पर भी सवाल या
निशान लाग रहे हैं.
सर्विक्षण
एजेंसी एमैप के बंद होने की खबर आ रही है लेकिन कम्पनी के प्रबंध निर्देशक का कहना
है कि कम्पनी अपना कारोबार समेट नहीं रही है बल्कि इसमें तकनीकी बदलाव किये जा रहे
हैं यह कम्पनी अपने शुरूआती दौर में 7200 मीटरों के ज़रिये रेटिंग तैयार कर रही थी उधर
1998 में शुरू हुई टैम के पास कुल मीटरों की संख्या 8150 थी इनमे से 1007 मीटर
डी.टी.एच. कैस और आई.पी.टी. वाले घरों में है जबकि 5532 मीटर एनालॉग केबल और 1611
मीटर गैर केबल यानी दूरदर्शन वाले घरों में है. कुल मिलाकर यह भारी भरकम निवेश पर
आधारित व्यवस्था है एक मीटर की लागत 75000 से लेकर 100000 रुपये के बीच बैठती है टी.आर.पी.
की प्रतिस्पर्धा में बने रहना टी.वी. चैनलों की विवशता भी है उन्हें विज्ञापन
दाताओं को अपने चैनलों और कार्यक्रमों के बारे में बताने का टी.आर.पी. के अलावा और
कोई जरिया भी नहीं है हालाकि ज़्यादा तर विज्ञापन दाता कम्पनियाँ और ब्रोडकास्ट
एडिटर असोशिएसन से जुड़े लोग यह मानते हैं कि टी.आर.पी. के आकलन में तकनीकी बदलाव
की बहुत आवश्यकता है. किसी उत्पाद की खपत का बाज़ार में पैटर्न क्या है इसे सिर्फ
टी.आर.पी. के ज़रिये कैसे निर्धारित किया जा सकता है विज्ञापन दाताओं को अपने
उत्पाद की खपत का आधार और रणनीति खुद बनानी होगी. टी.आर.पी. तो एक इशारा है, फैसला
नहीं. दरअसल किसी भी टी.आर.पी. सर्वेक्षण एजेंसी की भूमिका आंकड़े एकत्र करके
टेलिविज़न, विज्ञापन उद्योग से जुड़े लोगों और शोध करने वालों को सौंप देने तक ही
सीमित है एजेंसियां कभी नहीं कहती कि कोई चैनल टी.आर.पी. के आधार पर कार्यक्रमों
में किसी तरह का परिवर्तन करे. कार्यक्रम बनाने और उसे परोसने कि रणनीती चैनल जब
चाहे तब बना सकते हैं. आज बहुत से टी.वी. चैनलों के कार्यक्रम प्रमुखों ने खुल कर
यह कहना शुरू कर दिया है कि वे दर्शकों के लिए काम नहीं कर रहे हैं उन्हें तो हर
हाल में विज्ञापन दाताओं को खुश करना है. आखिर रोटी तो विज्ञापन के बढ़ने पर ही
मिलेगी.
सवाल
उठता है कि क्या यह कह देने भर से टी.आर.पी. को लेकर चल रही बहस खत्म हो जाती आंकड़े
बताते हैं कि करीब 10,000 करोड़ रुपय की भारी रकम किन चैनलों पर खर्च की जाये यह
टी.आर.पी. ही तय करती है. ऐसे में तकनीकी स्तर पर टी.आर.पी. से मिलने वाले
निष्कर्ष महत्वपूर्ण होते हैं देश में 607 के लगभग अच्छे बुरे टी.वी. चैनल देखे जा
रहे हैं और 250 के लगभग नए चैनल खोलने के आवेदन सूचना प्रसारण मंत्रालय के पास हैं
ज़ाहिर है कि आने वाले समय में टी.आर.पी. में घमासान युद्ध की संभावनाएं और बढेंगी.
भूत-प्रेत, चुड़ैल और सनसनी बेचने वाले चैनलों को अपनी टी.आर.पी. बढ़ाने के लिए नए-नए
तरीके खोजने पड़ेंगे. जिस चैनल की टी.आर.पी जितनी ज़्यादा होगी उसकी कमाई भी उतनी
ज़्यादा होगी आईबीएन 7 के सम्पादक आशुतोष टी.आर.पी. व्यवस्था को बंद करने की मांग
कर रहे हैं वो इसे दोषपूर्ण और अवैज्ञानिक मानते हैं उनका मानना है कि किसी भी
तबके की क्रय क्षमता से कार्यक्रम या चैनल की लोकप्रियता तय किया जाना गलत है टी.आर.पी.
के लिए चैनलों के लगातार आग्रह ने हिन्दी चैनलों के सोच को ही बदल दिया है. तमाम
देशी-विदेशी टी.वी. चैनलों के मालिकान व्यापारी हो गए हैं और इनकी नज़र सिर्फ अपने
फायेदे पर टिकी हुई है क्रिकेट, क्राईम और सिनेमा न हो तो किसी भी चैनल की
टी.आर.पी. को धराशाई होते वक्त नहीं लगेगा.
ये
सच है कि हजारों-हज़ार करोड़ के इस व्यापार से अब लाभ कमाने की होड़ को डीलीट कर पाना
आसान नहीं है लेकिन उन 13.8 करोड़ घरों में कैसे परिवर्तन होंगे जहाँ टेलिविज़न
पहुँच गया है यह भी तो देखना होगा सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय भी यह मानता है कि
एजेंसियों द्वारा किये गए सर्वेक्षण के आधार पर तैयार की गयी टी.आर.पी. रिपोर्ट
में कई तरह की खामियां हैं आखिर ये भरोसा कैसे किया जाए कि एजेंसियां टी.आर.पी.
आंकड़ों के साथ छेड़-छाड नहीं करती होंगी इन आंकड़ों को कोई बाहरी एजेंसी द्वारा ऑडिट
भी तो नहीं कराया जाता सब मानते हैं कि टी.आर.पी. सर्वेक्षण में कमियां हैं और
विज्ञापन दाता काफी समय से इन कमियों को नज़रअंदाज करते हुए 10,000 करोड़ का दांव बाज़ार
में हर साल लगा रहे हैं कोई पूछने वाला नहीं है कि 150 करोड़ की आबादी वाले इस देश
में टी.वी. दर्शकों की पसंद न पसंद कुछ सर्वेक्षण एजेंसियां 165 शहरों में लगे
8150 मीटरों के ज़रिये कैसे तय कर दे रहीं है. सेम्पल सिर्फ सेम्पल होते हैं प्रयोग
के बाद सेम्पल की आखरी हैसियत तय हो पाती है. चैनल भी मानते हैं कि यह व्यवस्था न
काफी है आंकड़ों पर नज़र डालिए तो लगभग 60 करोड़ लोग टेलिविज़न देखते हैं. 10.3 करोड़
घरों में केबल और डी.टी.एच के ज़रिये टी.वी. देखा जा रहा है शहरों में टी.आर.पी. तय
करने के लिए मीटर लगाये गए हैं. गाँवों और कस्बों में यह व्यवस्था नहीं है.
पूर्वोत्तर और जम्मू-कश्मीर तक तो ये मीटर पहुंचे ही नहीं हैं बिहार में 165 मीटर
लगे हैं सबसे ज़्यादा मीटर दिल्ली और मुंबई में हैं तमाम टी.वी. चैनलों का दबाव
पड़ने पर एक सर्विक्षण एजेंसी ने 165 मीटर और जोड़ दिए हैं लगातार मीटरों की संख्या बढ़ा
कर 30,000 किये जाने की सिफारिश की जा रही है यह मांग भी है कि इनमे से 15,000
मीटर ग्रामीण क्षेत्रों में लगाये जाएँ इस पर तकरीबन 660 करोड़ रुपय का खर्च आएगा.
टी.आर.पी.
को लेकर चैनलों द्वारा कमोबेश उठाये जा रहे अनैतिक क़दमों से भी टी.आर.पी. की
शुचिता प्रभावित हो रही है तमाम चैनलों के एजेंट उन घरों के दर्शकों को उपहार आदि
देकर चैनलों को अधिक से अधिक देखने का आग्रह कर रहे हैं और मीटर रीडिंग पर सीधा
असर पड़ रहा है मुश्किल ये है कि मीटर में चैनल का नाम कहीं नहीं आता बस किसी विशेष
चैनल के फ्रीक्वेंसी ही दर्ज होती है अब किसी विशेष चैनल की टी.आर.पी. गिरानी होगी
तो केबल ऑपरेटर उस चैनल की फ्रीक्वेंसी को बार-बार बदल कर खेल करता रहेगा और इस
तरह किसी विशेष चैनल की टी.आर.पी. गिर जायेगी सर्वेक्षण एजेंसियां ये मानती हैं कि
केबल ऑपरेटर के इस खेल पर कोई अन्खुश नहीं लगाया जा सकता सिवा इसके हम उन पर भरोसा
करें. टी.आर.पी. के लिए काम करने वाली एजेंसियों का न तो पंजीकरण किया गया है और न
इनके लिए कोई आचार सहिंता ही है. इनकी कहीं कोई शिकायत नहीं की जा सकती और इनके
द्वारा किये गए नुकसान की भरपाई के लिए किसी तरह का क्लेम पाने का मुकदमा ही दर्ज
हो सकता है.
टी.आर.पी.
को लेकर केबल टी.वी. चैनलों में जो आपाधापी मची हुई है उसमे परिवर्तन बेहद आवश्यक
हैं. नियम अधिनियम बनाकर सबसे पहले सर्वेक्षण एजेंसियों की सीमा निर्धारित होनी
चाहिए चैनलों को उनके कार्यक्रमों और उनके चैनलों की लोकप्रियता के बारे में
साप्ताहिक रिपोर्ट न देकर उन्हें 6 महीने में एक बार टी.आर.पी. से जोड़ा जाए. ऐसा
करने पर चैनलों के बीच की प्रतिस्पर्धा कम होगी और कार्यक्रमों की गुणवत्ता बढ़ेगी.
विज्ञापन दाताओं को भी विज्ञापन पर निवेश करने में आसानी होगी टी.आर.पी. का मुद्दा
एक महत्वपूर्ण मुद्दा है इसे गंभीरता से लिया जायेगा तो इससे केबल टी.वी. चैनल
इंडस्ट्री का विकास हो पायेगा.
-अजामिल

