गुरुवार, 1 नवंबर 2012

टी आर पी चक्रम



टी आर पी चक्रम
सब गोलमाल है भई गोलमाल है
-अजामिल
      भारत में टेलीविज़न प्रसारण का सफर 15 अगस्त 1959 को दूरदर्शन टी.वी. चैनल के साथ हुआ था यह एक सरकारी टी.वी. चैनल था और सरकार की गाईड लाईन्स पर सरकार के लिए ही काम कर रहा था इसकी बंधी-बंधाई सीमा थी सरकारी नीतियों और योजनाओं का प्रचार-प्रसार करना इसका मुख्य काम था उस समय दूरदर्शन चैनल की विकास की गति को देख कर कोई सोच भी नहीं सकता था कि पांच दशक पूरा करते-करते तक टेलिविज़न प्रसारण देश के सबसे बड़े उद्योगों की पहली पंक्ति में पहुँच जायेगा. आज टेलिविज़न इंडस्ट्री का जो विस्तार हमें दिखाई दे रहा है वह केबल क्रांति का नतीजा तो है ही लाखों केबल ऑपरेटर्स के समर्पण, त्याग और परिश्रम का भी फल है. उन लाखों केबल ऑपरेटर्स का जिन्होंने विषम से विषम परिस्थितियों में इस उद्योग को संभाले रखा ये अलग बात है कि आज मलाई और मख्खन खाने के लिए बड़े उद्योग पतियों और विदेशी कम्पनियों की जमात इस धंधे में कूद पड़ी है और केबल ऑपरेटर्स के हक और हुकूक संकट में आ गये हैं. दरअसल टेलिविज़न उद्योग ने सामाजिक सरोकारों को हाशिए पर डाल दिया है और अब इस इंडस्ट्री में सारा खेल अधिक से अधिक मुनाफा कमाने को लेकर चल रहा है. ज़ाहिर है कि प्रतिस्पर्धा प्रतियोगता में बदल चुकी है आज अच्छे बुरे 200 के लगभग विभिन्न भाषाओँ के राष्ट्रीय और क्षेत्रीय टी.वी. चैनल मैदान में हैं. इनके बीच दांत काट प्रतिस्पर्धा है. सभी की कोशिश ये है कि जैसे भी हो बाज़ार में आगे बने रहो. मूल्यों और संस्काओं की चिन्ता अब इन चैनलों को नहीं है. ये अपना काम बनता, भाड़ में जाए जनता के सिद्धांत पर चल रहे हैं. तभी तो इतना लंबा सफर तय कर लेने के बाद भी भारतीय टेलिविज़न की कोई पहचान नही बन पायी है. इन टेलिविज़न चैनलों से अगर फिल्म इंडस्ट्री का कचरा साफ़ कर दिया जाए तो इन चैनलों के पास दिखने को कुछ नहीं बचेगा.
            लंबे समय तक दूरदर्शन के पास कोई ऐसा रास्ता नहीं था जिससे दूरदर्शन चैनल दर्शकों के बीच अपनी लोकप्रियता का आकलन कर पाता और ना ही विज्ञापन दाताओं के पास ऐसा कोई साधन था कि वे ये पता लगा पाते कि कौन सा चैनल दर्शकों के बीच ज्यादा लोकप्रिय हो रहा है. इस अभाव के बावजूद 70-80 के दशक में दूरदर्शन के पास काफी विज्ञापन थे. भारत में टी.वी. कार्यक्रमों की लोकप्रियता को मापने का काम 1983 में शुरू हुआ. हिन्दुस्तान थॉमसन एसोशिएट और सर्वे एजेंसी इंडियन मार्केट रिसर्च ब्यूरो ये दो ऐसी एजेंसीज़ थी जिन्होंने पहली बार दूरदर्शन कार्यक्रमों की लोकप्रियता का दर्शकों के बीच जाकर सर्वेक्षण किया और यह बताया कि कौन सा कार्यक्रम कितना लोकप्रिय है और लोग उसे किस समय में देखते हैं. बाद में इस एजेंसी के साथ आई.एम्.आरपी. और एम्.आर.एस.ब्रुक एजेंसियां भी जुड गयी. इन एजेंसियों के एक साथ काम करने पर सर्वेक्षण का यह काम ज्यादा गंभीरता से होने लगा. विज्ञापन दाताओं को यह सूचना आसानी से मिलने लगी कि उनके उत्पाद का विज्ञापन टेलिविज़न सेट पर कब देखा जा रहा है उस दौर में इस सर्वेक्षण के दौरान दर्शकों को एक डायरी में टी.वी. कार्यक्रमों के बारे में अपनी राय दर्ज करने के लिए कहा गया था गौरतलब है कि उस ज़माने में दर्शकों की तुलना में टेलिविज़न सेट्स कम हुआ करते थे मोहल्ले में पैसे वाले घरों में टेलिविज़न सेट होता था अडोस-पड़ोस के लोग सुबह-शाम टी.वी. देखने के लिए पहुँच जाया करते थे. लिहाज़ा सर्वेक्षण कंपनियों ने जो डायरी बाटी दर्शकों ने उसमे काफी रूचि दिखाई एजेंसियों ने इस डायरी में दर्शकों के कमेंट्स को टी.वी. कार्यक्रमों की लोकप्रियता का आधार बनाया और इस तरह टी.आर.पी. की सहेजने की प्रक्रिया शुरू हुई. आगे चल कर केबल टी.वी. के आने के बाद सीएनएन, स्टार और एम् टी.वी. जैसे बड़े चैनल जब मैदान में आये और इनका प्रसारण शुरू हुआ तब टी.आर.पी. तय करते समय इनके कार्यक्रमों को भी शामिल कर लिया गया ये अलग बात है कि ये टी.वी. चैनल लंबे समय तक दूरदर्शन के विकल्प के रूप में देखे जाते रहे.
            शुरूआती दौर में दूरदर्शन ने टी.आर.पी. के चक्कर और ज़रूरत से निपटने के लिए दूरदर्शन ऑडियंस रिसर्च टेलिविज़न रेटिंग विंग तैयार किया था यह विंग दूरदर्शन की दर्शक अनुसन्धान इकाई द्वारा 40 केन्द्रों और 100 आकाशवाणी केन्द्रों द्वारा दर्शक और श्रोता की कार्यक्रम लोकप्रियता के आंकड़े एकत्र करता था धीरे-धीरे सर्वेक्षण का यह काम विस्तृत होता गया तब इसमें कठिनाइयाँ पैदा होने लगीं दर्शकों की संख्या में इजाफा हुआ तब दर्शकों तक पहुंचना मुश्किल हो गया डायरी सर्वेक्षण न काफी और अमहत्वपूर्ण दिखाई देने लगा लेकिन टी.आर.पी. का जानना बेहद ज़रूरी था. विज्ञापन दाताओं सर्वेक्षण एजेंसियों और चैनल के प्रतिनिधियों ने मिलजुल कर इस समस्या से निपटने के लिए एक संयुक्त समिति बनाई तय यह किया गया कि टी.आर.पी. को जानने की व्यवस्था पारदर्शी और वैज्ञानिक होने चाहिए ताकि अविश्वसनीयता की कहीं कोई गुन्जायिश न रहे. आई.एम्.आर.बी. और ए.सी.नीलसन ने मिलकर उस समय यह प्रस्ताव रखा कि टी.आर.पी. का काम टैम से करवाया जाना चाहिए यह प्रस्ताव स्वीकार भी कर लिया गया लेकिन बजट से बाहर की यह योजना थी लिहाज़ा टैम के साथ सौदा नहीं पट पाया इस बीच ओ.आर.जी. मार्ग ने इन टैम के माध्यम से टेलिविज़न रेटिंग के सर्वेक्षण का काम शुरू किया. 1998 में टैम के ज़रिये से यह काम विधिवत शुरू हो गया दरअसल टैम को इस काम में उतारने का श्रेय इंडियन सोसायटी ऑफ एडवरटाईजर्स, इंडियन ब्रोडकास्ट फौंडेशन और एडवरटाईजिंग एजेंसीज़ असोशिएसन ऑफ इंडिया को दिया जाना चाहिए.
            2002 में एसी नीलसन का अधिग्रहण ओ.आर.जी. मार्ग की प्रमुख कम्पनी वी.एन.यू. ने कर लिया इसी के साथ इनटैम टैम में मर्ज हो गयी और नई कम्पनी का नाम टैम मिडिया रिसर्च टी.वी. रेटिंग सर्वेक्षण करने वाली भारत की अकेली संस्था बन गयी. 2004 में एक और कम्पनी एमैप भी बाज़ार में आई लेकिन टैम नीलसन कम्पनी और कंटर मिडिया रिसर्च के काम को आज ज्यादा महत्व दिया जा रहा है.
            टेलिविज़न रेटिंग पॉइंट की आकलन व्यवस्था को दुरस्त किये जाने के प्रयास अभी भी चल रहे हैं टी.वी. चैनल प्रसारकों और विज्ञापन क्षेत्र की बड़ी कम्पनियों ने मिलकर इस काम के लिए ब्रोडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउन्सिल यानी बार्क का गठन किया है यह कम्पनी अधिनियम 1956 की धारा 25 के तहत काम कर रही है यह एक गैर लाभकारी संस्था है और ब्रिटेन की ब्रोडकास्टर्स ऑडियंस रिसर्च बोर्ड यानी बार्ब के मॉडल को अपनाये हुए है विशेषज्ञों का मानना है कि यह मॉडल भारतीय टेलिविज़न इंडस्ट्री का आकलन ठीक प्रकार नहीं कर पाता शायद यही वजह है कि बार्ब अभी तक कुछ भी उल्लेखनीय परिणाम नहीं दे पाया जबकि कुछ विशेषज्ञ भारतीय टेलिविज़न इंडस्ट्री के हालातों का आकलन करते हुए बार्ब की कार्य पद्धिति को सबसे ज्यादा उपयोगी मान रहे हैं उनका मानना है कि इसके पैनल का डिजाईन सामान अनुपात में है और भौगोलिक और जनसँख्या से जुड़े अनुपात हीनता को दूर करने में सक्षम है. बार्ब के पैनल में समाज के सभी आयु वर्ग और सामाजिक  वर्ग का प्रतिनिधित्व सुनिशिचित किया गया है बाब अपने सर्वेक्षण के दौरान लगभग 52,000 लोगो से मिलता है और इंटरव्यू के ज़रिये निष्कर्षों पर पहुचता है बार्ब एक ऐसी सर्वेक्षण कम्पनी है जो अकेले काम नहीं करती यह अपना हर काम किसी दूसरी कम्पनी या एजेंसी के साथ मिलकर करती है इसका परिणाम यह होता है कि इस कम्पनी द्वारा संकलित आंकड़ो के साथ छेड़-छाड संभव नहीं हो पाती. बार्ब के आंकड़े हर रोज भी मिल सकते हैं और साप्ताहिक स्तर पर भी. इसके बावजूद टी.आर.पी. ज़ारी करने वाली एजेंसी टैम मिडिया रिसर्च के सर्वेक्षण में आई.आर.एस.और एन.आर.एस. की तरह न तो पारदर्शिता है और न आंकड़ो की जाँच की कोई व्यवस्था. इसीलिए टैम का टी.आर.पी. सर्वेक्षण संदेह के दायरे में रहता है जब तक इसे जांचने का कोई रास्ता नहीं निकलता तब तक टी.आर.पी. का खेल ऐसे ही चलेगा.
            टी.आर.पी. के खेल को एक लंबे समय तक महत्वपूर्ण मानकर अपने टी.वी. चैनलों की रीति-नीति तय करने वाले चैनल इन दिनों टी.आर.पी. नाम की खराब व्यवस्था से खुद बहुत परेशान है और उनकी समझ में नहीं आ रहा है कि वे कार्यक्रमों की गुणवत्ता देखे या टी.आर.पी. की प्रतिस्पर्धा में खुद को बरबाद करते रहें उनका मानना है कि टी.आर.पी. की पूरी व्यवस्था ही बीमार और संदेहास्पद है इसमें न तो अभी तक सामाज के हर तबके की भागीदारी सुनिशिचित हो पायी है और न हर क्षेत्र की. टी.आर.पी. को लेकर टी.वी. चैनलों में 24 घंटे तनाव बना रहता है चैनल प्रमुखों के दिलों की धडकन इन दिनों टी.आर.पी. के उतार चढ़ाव पर ही निर्भर कर रही हैं न्यूज़ ब्रेक करने की जल्दबाजी में बड़ी से बड़ी खबर टी.वी. से गायब हो जाती हैं. टी.आर.पी. ने हालात ऐसे कर दिए हैं कि कई चैनलों में तो चैनल प्रमुख की नौकरी मुश्किल में पड़ गयी है इन चुनौतियों के चलते कुछ भी नया करने की न सम्भावना बची है और न उत्साह ही. दूसरी ओर टी.आर.पी. की व्यवस्था पर भी सवाल या निशान लाग रहे हैं.
            सर्विक्षण एजेंसी एमैप के बंद होने की खबर आ रही है लेकिन कम्पनी के प्रबंध निर्देशक का कहना है कि कम्पनी अपना कारोबार समेट नहीं रही है बल्कि इसमें तकनीकी बदलाव किये जा रहे हैं यह कम्पनी अपने शुरूआती दौर में 7200 मीटरों के ज़रिये रेटिंग तैयार कर रही थी उधर 1998 में शुरू हुई टैम के पास कुल मीटरों की संख्या 8150 थी इनमे से 1007 मीटर डी.टी.एच. कैस और आई.पी.टी. वाले घरों में है जबकि 5532 मीटर एनालॉग केबल और 1611 मीटर गैर केबल यानी दूरदर्शन वाले घरों में है. कुल मिलाकर यह भारी भरकम निवेश पर आधारित व्यवस्था है एक मीटर की लागत 75000 से लेकर 100000 रुपये के बीच बैठती है टी.आर.पी. की प्रतिस्पर्धा में बने रहना टी.वी. चैनलों की विवशता भी है उन्हें विज्ञापन दाताओं को अपने चैनलों और कार्यक्रमों के बारे में बताने का टी.आर.पी. के अलावा और कोई जरिया भी नहीं है हालाकि ज़्यादा तर विज्ञापन दाता कम्पनियाँ और ब्रोडकास्ट एडिटर असोशिएसन से जुड़े लोग यह मानते हैं कि टी.आर.पी. के आकलन में तकनीकी बदलाव की बहुत आवश्यकता है. किसी उत्पाद की खपत का बाज़ार में पैटर्न क्या है इसे सिर्फ टी.आर.पी. के ज़रिये कैसे निर्धारित किया जा सकता है विज्ञापन दाताओं को अपने उत्पाद की खपत का आधार और रणनीति खुद बनानी होगी. टी.आर.पी. तो एक इशारा है, फैसला नहीं. दरअसल किसी भी टी.आर.पी. सर्वेक्षण एजेंसी की भूमिका आंकड़े एकत्र करके टेलिविज़न, विज्ञापन उद्योग से जुड़े लोगों और शोध करने वालों को सौंप देने तक ही सीमित है एजेंसियां कभी नहीं कहती कि कोई चैनल टी.आर.पी. के आधार पर कार्यक्रमों में किसी तरह का परिवर्तन करे. कार्यक्रम बनाने और उसे परोसने कि रणनीती चैनल जब चाहे तब बना सकते हैं. आज बहुत से टी.वी. चैनलों के कार्यक्रम प्रमुखों ने खुल कर यह कहना शुरू कर दिया है कि वे दर्शकों के लिए काम नहीं कर रहे हैं उन्हें तो हर हाल में विज्ञापन दाताओं को खुश करना है. आखिर रोटी तो विज्ञापन के बढ़ने पर ही मिलेगी.
            सवाल उठता है कि क्या यह कह देने भर से टी.आर.पी. को लेकर चल रही बहस खत्म हो जाती आंकड़े बताते हैं कि करीब 10,000 करोड़ रुपय की भारी रकम किन चैनलों पर खर्च की जाये यह टी.आर.पी. ही तय करती है. ऐसे में तकनीकी स्तर पर टी.आर.पी. से मिलने वाले निष्कर्ष महत्वपूर्ण होते हैं देश में 607 के लगभग अच्छे बुरे टी.वी. चैनल देखे जा रहे हैं और 250 के लगभग नए चैनल खोलने के आवेदन सूचना प्रसारण मंत्रालय के पास हैं ज़ाहिर है कि आने वाले समय में टी.आर.पी. में घमासान युद्ध की संभावनाएं और बढेंगी. भूत-प्रेत, चुड़ैल और सनसनी बेचने वाले चैनलों को अपनी टी.आर.पी. बढ़ाने के लिए नए-नए तरीके खोजने पड़ेंगे. जिस चैनल की टी.आर.पी जितनी ज़्यादा होगी उसकी कमाई भी उतनी ज़्यादा होगी आईबीएन 7 के सम्पादक आशुतोष टी.आर.पी. व्यवस्था को बंद करने की मांग कर रहे हैं वो इसे दोषपूर्ण और अवैज्ञानिक मानते हैं उनका मानना है कि किसी भी तबके की क्रय क्षमता से कार्यक्रम या चैनल की लोकप्रियता तय किया जाना गलत है टी.आर.पी. के लिए चैनलों के लगातार आग्रह ने हिन्दी चैनलों के सोच को ही बदल दिया है. तमाम देशी-विदेशी टी.वी. चैनलों के मालिकान व्यापारी हो गए हैं और इनकी नज़र सिर्फ अपने फायेदे पर टिकी हुई है क्रिकेट, क्राईम और सिनेमा न हो तो किसी भी चैनल की टी.आर.पी. को धराशाई होते वक्त नहीं लगेगा.
            ये सच है कि हजारों-हज़ार करोड़ के इस व्यापार से अब लाभ कमाने की होड़ को डीलीट कर पाना आसान नहीं है लेकिन उन 13.8 करोड़ घरों में कैसे परिवर्तन होंगे जहाँ टेलिविज़न पहुँच गया है यह भी तो देखना होगा सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय भी यह मानता है कि एजेंसियों द्वारा किये गए सर्वेक्षण के आधार पर तैयार की गयी टी.आर.पी. रिपोर्ट में कई तरह की खामियां हैं आखिर ये भरोसा कैसे किया जाए कि एजेंसियां टी.आर.पी. आंकड़ों के साथ छेड़-छाड नहीं करती होंगी इन आंकड़ों को कोई बाहरी एजेंसी द्वारा ऑडिट भी तो नहीं कराया जाता सब मानते हैं कि टी.आर.पी. सर्वेक्षण में कमियां हैं और विज्ञापन दाता काफी समय से इन कमियों को नज़रअंदाज करते हुए 10,000 करोड़ का दांव बाज़ार में हर साल लगा रहे हैं कोई पूछने वाला नहीं है कि 150 करोड़ की आबादी वाले इस देश में टी.वी. दर्शकों की पसंद न पसंद कुछ सर्वेक्षण एजेंसियां 165 शहरों में लगे 8150 मीटरों के ज़रिये कैसे तय कर दे रहीं है. सेम्पल सिर्फ सेम्पल होते हैं प्रयोग के बाद सेम्पल की आखरी हैसियत तय हो पाती है. चैनल भी मानते हैं कि यह व्यवस्था न काफी है आंकड़ों पर नज़र डालिए तो लगभग 60 करोड़ लोग टेलिविज़न देखते हैं. 10.3 करोड़ घरों में केबल और डी.टी.एच के ज़रिये टी.वी. देखा जा रहा है शहरों में टी.आर.पी. तय करने के लिए मीटर लगाये गए हैं. गाँवों और कस्बों में यह व्यवस्था नहीं है. पूर्वोत्तर और जम्मू-कश्मीर तक तो ये मीटर पहुंचे ही नहीं हैं बिहार में 165 मीटर लगे हैं सबसे ज़्यादा मीटर दिल्ली और मुंबई में हैं तमाम टी.वी. चैनलों का दबाव पड़ने पर एक सर्विक्षण एजेंसी ने 165 मीटर और जोड़ दिए हैं लगातार मीटरों की संख्या बढ़ा कर 30,000 किये जाने की सिफारिश की जा रही है यह मांग भी है कि इनमे से 15,000 मीटर ग्रामीण क्षेत्रों में लगाये जाएँ इस पर तकरीबन 660 करोड़ रुपय का खर्च आएगा.
            टी.आर.पी. को लेकर चैनलों द्वारा कमोबेश उठाये जा रहे अनैतिक क़दमों से भी टी.आर.पी. की शुचिता प्रभावित हो रही है तमाम चैनलों के एजेंट उन घरों के दर्शकों को उपहार आदि देकर चैनलों को अधिक से अधिक देखने का आग्रह कर रहे हैं और मीटर रीडिंग पर सीधा असर पड़ रहा है मुश्किल ये है कि मीटर में चैनल का नाम कहीं नहीं आता बस किसी विशेष चैनल के फ्रीक्वेंसी ही दर्ज होती है अब किसी विशेष चैनल की टी.आर.पी. गिरानी होगी तो केबल ऑपरेटर उस चैनल की फ्रीक्वेंसी को बार-बार बदल कर खेल करता रहेगा और इस तरह किसी विशेष चैनल की टी.आर.पी. गिर जायेगी सर्वेक्षण एजेंसियां ये मानती हैं कि केबल ऑपरेटर के इस खेल पर कोई अन्खुश नहीं लगाया जा सकता सिवा इसके हम उन पर भरोसा करें. टी.आर.पी. के लिए काम करने वाली एजेंसियों का न तो पंजीकरण किया गया है और न इनके लिए कोई आचार सहिंता ही है. इनकी कहीं कोई शिकायत नहीं की जा सकती और इनके द्वारा किये गए नुकसान की भरपाई के लिए किसी तरह का क्लेम पाने का मुकदमा ही दर्ज हो सकता है.
            टी.आर.पी. को लेकर केबल टी.वी. चैनलों में जो आपाधापी मची हुई है उसमे परिवर्तन बेहद आवश्यक हैं. नियम अधिनियम बनाकर सबसे पहले सर्वेक्षण एजेंसियों की सीमा निर्धारित होनी चाहिए चैनलों को उनके कार्यक्रमों और उनके चैनलों की लोकप्रियता के बारे में साप्ताहिक रिपोर्ट न देकर उन्हें 6 महीने में एक बार टी.आर.पी. से जोड़ा जाए. ऐसा करने पर चैनलों के बीच की प्रतिस्पर्धा कम होगी और कार्यक्रमों की गुणवत्ता बढ़ेगी. विज्ञापन दाताओं को भी विज्ञापन पर निवेश करने में आसानी होगी टी.आर.पी. का मुद्दा एक महत्वपूर्ण मुद्दा है इसे गंभीरता से लिया जायेगा तो इससे केबल टी.वी. चैनल इंडस्ट्री का विकास हो पायेगा.
                                                            -अजामिल है ा ेशक  nा ह्लं   a inidhitvसामाजिक kमें सक्षम है ै कि बार्क

शनिवार, 20 अक्टूबर 2012

माओ की असलियत ?

भारत-चीन युद्ध के 20 अक्टूबर को 50 साल पूरे हो रहे हैं। आठ दिन चले इस युद्ध में भारत के 1383 सैनिक मारे गए थे जबकि 1047 घायल हुए थे। 1696 सैनिक लापता हो गए थे और 3968 सैनिकों को चीन ने गिरफ्तार कर लिया था। वहीं चीन के कुल


722 सैनिक मारे गए थे और 1697 घायल हुए थे। एशिया की इन दो ताकतों के बीच जंग के हालात क्‍यों बने, रणनीति तौर पर इसके क्‍या नतीजे हुए, ऐसे तमाम मसलों पर बहस जारी है। लेकिन चीन के ही एक रणनीतिकार ने इस जंग की वजह के बारे में बड़ा खुलासा किया है। चीन की पेंकिंग यूनिवर्सिटी में स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज के डीन वांग जिसि ने कहा है कि चीन के नेता माओ त्से तुंग ने 1962 में भारत के खिलाफ युद्ध का आदेश दिया था ताकि सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी पर उनकी पकड़ बनी रहे। वांग चीनी विदेश मंत्रालय की नीति सलाहकार समिति के भी सदस्य हैं। वांग ने कहा कि खेती आधारित से आधुनिक समाज बनाने का माओ का अभियान 'ग्रेट लीप फारवर्ड' संकट में तब्दील हो गया। हिंसा में लाखों लोगों की जान गई। वांग ने कहा कि इस स्थिति में कम्युनिस्ट पार्टी में माओ की स्थिति कमजोर हो गई। तब सेना पर अपनी पकड़ मजबूत दिखाने के लिए उन्होंने तिब्बत रेजीमेंट के सेना के कमांडर को बुलाया। उससे पूछा कि क्या भारत से युद्ध जीत सकते हो। उसने कहा निश्चित तौर पर। इस पर माओ ने हरी झंडी दे दी।

- जय प्रकाश मानस

मुझे कुछ प्रश्नों के जवाब चाहिए....

जब हमारे पास "गीता" थी तो यह 14 देशों से चोरी करके यह बोझिल सविंधान क्यों बनाया गया?

जब हमारे पास "हिंदी" "संस्कृत" जैसी पवित्र और समृद्ध भाषा थी तो यह अंग्रेजी भाषा क्यों थोपी गई? जब हमारे पास "गुरुकुल प्रणाली" थी तो यह कॉन्वेंट के नाम पर हमें क्यों लुटा गया? हमारे पास आयुर्वेद था तो क्यों नहीं उस पर अनुसंधान किये? हमारे पास पुरात्न अपनी शिक्षा प्रणाली जो ऋषियों मुनियो ने चलाई थी तो क्यों अंग्रेज मैकले की काली शिक्षा व्यवस्था हमारे ऊपर थोपी गई ??

जब हमारे इतिहास में "स्वामी विवेकानंद" जैसे महान विचारशील व्यक्ति थे तो क्यों अंग्रेजों के चरित्र हीन चाटुकार गाँधी परिवार को सब कुछ मान लिया गया??

जब हमारे पास भगत सिंह और उधम सिंह का परिवार था, लौहपुरुष पटेल और श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे महान देशभक्त थे तो क्यों ''नेहरुद्दीन'' को सत्ता दिया गया?

जब हमारे पास वन्देमातरम जैसा ओजस्वी गान था तो क्यों इसे ज्यादा सम्मान नहीं दिया गया?

जब हमारे देश में भगत सिंह, राजगुरू, आजाद, उधम सिंह, लाला लाजपत राए, बाल गंगाधर तिलक, वीर सावरकर और बहुत से देशभक्त थे तो फ़िर क्यों अंग्रेजो गद्दारों के नाम पर देश के समारकों, चौराहों, शहरों आदि के नाम रखे गए ????

जब हमारे देश का इतना सुन्दर नाम भारत__हिन्दुस्तान था क्यो गुलामी का नाम इण्डिया रखा हुआ है ??

-अमित त्रिपाठी

सोमवार, 15 अक्टूबर 2012

राजनीतिक पार्टियों की आमदनी !

मित्रों,अभी कुछ दिनों पहले ही भारत की प्रमुख राजनीतिक पार्टियों की आमदनी के बारे में अखबारों में पढ़ने को मिला। देखकर मेरी आँखें फटी-की-फटी रह गईँ। हर्रे लगे न फिटकरी और रंग भी चोखा होए। तेल भी नहीं लगता और पूड़ी भी पकती जाती है,पकती जाती है। कहना न होगा आज राजनीति भी एक व्यवसाय है जिसमें शुरू में जनता में विश्वास बनाना पड़ता है और कुछ पैसा अपने पास से भी लगाना पड़ता है। एक बार पार्टी जनता के बीच स्थापित हो गई फिर तो बीसों ऊंगलियाँ घी में और सिर चाशनी की कड़ाही में। पारिवारिक वर्चस्व के चलते आज सारे दल चापलूसी के बेहतरीन अड्डे बन गए हैं। कोई भी नेता अपने पार्टी-नेतृत्व के खिलाफ जुबान ही नहीं खोल पाता। विरोध करते ही उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। क्या इस तानाशाही को लोकतंत्र का नाम दिया जा सकता है? जब पार्टियों में ही लोकतंत्र नहीं है तो वे क्या खाकर देश में लोकतंत्र और लोकतांत्रिक-संस्कृति को मजबूत करेंगी?
मित्रों,बैठे-बिठाये इतनी आमदनी तो शायद भारत के सबसे बड़े धनकुबेरों को भी नहीं होती होगी जितनी आज हमारे राजनीतिक दलों को हो रही है। आमदनी भरपूर और जिम्मेदारी कुछ भी नहीं। यहाँ तक कि 20000 रूपये से कम प्राप्त चंदे का विवरण देना भी आवश्यक नहीं और इस पर भी वे पूरा और सही विवरण नहीं देती हैं। कोई 10 प्रतिशत आमदनी का विवरण दे रहा है तो कोई 40 प्रतिशत का और कानून और न्यायालय फिर भी कुछ कर नहीं पा रहे हैं,क्यों? जब केजरीवाल अपने दल का आय-व्यय बताने को तैयार हैं तो अन्य पार्टियों को क्या परेशानी है और क्यों है? यह 20000 रूपये वाली सीमा भी सिर्फ जनता को धोखा देने के लिए है। अगर कोई 20000 रूपये की 20000 किस्तों में पैसा दे तो या फिर इस तरह ही चंदे की रकम दर्ज की जाए तो? इसलिए इन दलों के लिए एक-एक पैसे का हिसाब देना अनिवार्य किया जाए। पार्टियाँ बातें तो आम आदमी की करती हैं और काम पूंजीपतियों का करती हैं। उनको बताना ही चाहिए उनके खजाने में पैसा कहाँ से आता है। वे कौन-से लोग हैं जो उनकी पार्टी के फंड में करोड़ों-करोड़ रुपए देते हैं और क्यों देते हैं? इसके बदले में धनपतियों को क्या मिला,पार्टी ने क्या दिया तभी तो सामने आ पाएगा? दोनों मुद्दे एक-दूसरे से अंतर्गुंथित हैं। करोड़ों रुपए पार्टी फंड में देनेवाले पूंजीपति ऐसा कोई परोपकार की भावना से नहीं करते हैं बल्कि उनकी कुछ-न-कुछ बदले में पाने की उम्मीद लगी रहती है फिर चाहे लाभार्थी दल सत्ता में हो या विपक्ष में। सत्ता में हुआ तो वह धनपति को सीधे लाभ पहुँचाने की स्थिति में होता है जैसे बाड्रा और हरियाणा सरकार या फिर कोयला आबंटन में टाटा,अंबानी और जिंदल को प्राप्त लाभ का उदाहरण भी हम ले सकते हैं और अगर विपक्ष में हुआ तो फिर मंत्री को सिफारिशी पत्र तो लिख ही सकता है जैसा पिछले दिनों गडकरी ने संचेती के लिए लिखा। इतना ही नहीं कई बार तो धनपति राजनीतिक दलों को पैसा देकर सीधे लोकसभा या राज्यसभा का सदस्य ही बन जाते हैं जैसे अनिल अंबानी या विजय माल्या। वैसे हमारे कई परंपरागत नेता भी अब उद्योगों और व्यापार में हाथ आजमाने में पीछे नहीं हैं। चाहे वे दिवंगत विलासराव देशमुख हों या शरद पवार हों या फिर कमलनाथ जी हों। जाहिर है ये लोग भी सरकार में रहते हुए सरकार की नीतियों को अपने व्यापार के हितार्थ प्रभावित करते ही होंगे और बदले में पार्टी फंड में अपना अमूल्य योगदान भी करते होंगे।
         मित्रों,राजनीतिक दलों के लिए आय के स्रोत के साथ-साथ उन्होंने चंदे से प्राप्त धन का व्यय कहाँ-कहाँ किया यह बताना भी कानूनन जरूरी बनाया जाए। हवाई-यात्रा पर खर्च कर दिया या 8000 रूपये प्रति प्लेट वाला खाना खाया गया या पार्टियों और चुनावों के समय दारू की नदी बहा दी गई या इनका दुरूपयोग वोट खरीदने में किया गया? 'माल महाराज के मिर्जा खेले होली' बहुत दिन चल गया अब नहीं चलने वाला है,किसी भी कीमत पर नहीं। वोट हमारा काम तु्म्हारा आखिर कहाँ का न्याय है?
          मित्रों,क्या विडंबना है कि लगभग पूरा देश,पूरा शासन-प्रशासन आरटीआई के दायरे में है और शासन-प्रशासन को चलानेवाले दल ही इसके दायरे में नहीं हैँ। जबकि उनके बारे में जानने का जनता का अधिकार तो और भी ज्यादा है? जनता के लिए य़ह जानना तो और भी ज्यादा जरूरी है कि वे जिन राजनीतिक दलों को वोट दे रहे हैं वे कर क्या रहे हैं? कहीं वे लेन-देन की दुकान तो नहीं बन गए हैं?
           मित्रों, जैसा कि हम इस आलेख की शुरुआत में भी अर्ज कर चुके हैं कि आज लोकतंत्र की सबसे महत्त्वपू्र्ण ईकाई राजनीतिक पार्टियों में ही लोकतंत्र नहीं है। भाजपा और साम्यवादी दलों को छोड़कर सारे दल पारिवारिक कंपनियों की तरह हैं। पार्टियों का दुकानों में बदल जाना और वो भी खानदानी दुकानों में किसी भी तरह से भारतीय लोकतंत्र की प्रगति की दिशा में स्वस्थ गतिविधि नहीं है। जब जी चाहा पार्टी का संविधान बदल दिया। यह अधिकार उनको दिया ही क्यों गया है और कैसे दिया जा सकता है? इन दलों के हित सिर्फ इनके व्यक्तिगत हित नहीं हैं बल्कि इनसे हमारे देश और प्रदेशों के हित भी प्रभावित होते हैं,जुड़े हुए हैं। हमारे देश में एक ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि जिससे सारे दलों के लिए एक समान नियम हों। जैसे कि पार्टी के पंजीकृत-कार्यकर्ता सीधे पार्टी-पदाधिकारियों का चुनाव करें। जैसे कि कोई व्यक्ति या उसका रक्त-संबंधी लगातार एक या दो बार से ज्यादा एक ही पद को धारण नहीं कर पाए। ऐसी व्यवस्था हमारे यहाँ प्राचीन काल में भी थी। संगम काल में या चोल-शासन में तमिलनाडु में स्थानीय-निकायों में एक ही व्यक्ति या उसका रक्त-संबंधी लगातार दो सालों तक एक ही पद के लिए चुना नहीं जा सकता था। ऐसा नहीं होता था कि खुद पद से हटना पड़े तो भाई,लड़के या पत्नी को बिठा दिया। जब ऐसा प्राचीन काल में हो सकता था तो अब ऐसा क्यों संभव नहीं है?
मित्रों,सिर्फ व्यवस्था बना देने से भी कुछ नहीं होगा यह भी देखना पड़ेगा कि नियमों-उपनियमों का अनुपालन हो भी रहा है कि नहीं। तो इसके लिए या तो चुनाव आयोग को ही अधिकृत कर दिया जाए या ज्यादा अच्छा हो कि किसी पूरी तरह से स्वायत्त-निकाय की स्थापना की जाए जिसके अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति की प्रक्रिया पूरी तरह से पारदर्शी हो और जिसकी चयन समिति में न तो सरकार का बहुमत हो और न तो अन्य राजनीतिक दलों का ही। इसके साथ ही नियमों-कानूनों का उल्लंघन करने पर पार्टियों के लिए सख्त सजा का भी प्रावधान होना चाहिए। उनकी मान्यता रद्द कर देनी चाहिए और उनके प्रमुख नेताओं के चुनाव लड़ने पर आजीवन प्रतिबंध लगा दिया जाना चाहिए।
मित्रों,आर्थिक सुधारों से कम महत्वपूर्ण नहीं हैं ये प्रस्तावित और विलंबित सुधार क्योंकि इन सुधारों पर ही हमारे लोकतंत्र का भविष्य टिका हुआ है न कि आर्थिक सुधारों पर। दलों के संचालन और नियंत्रण के मामले में पारदर्शिता लाना जरूरी ही नहीं महाजरूरी है क्योंकि ऐसा नहीं होने से ही देश-प्रदेश में भ्रष्टाचार और धनिकतंत्र को बढ़ावा मिलता है। इसके चलते ही राजनीति आज एक गंदी गाली बनकर रह गई है। इस तरह के ऐहतियाती उपायों के बावजूद अगर धनपति चाहें तो पार्टी फंड में पैसा नहीं देकर उसी तरह से पार्टी नेतृत्व को लाभ पहुँचा सकते हैं जैसा कि वाड्रा के मामले में डीएलएफ ने किया फिर भी इससे काफी हद तक राजनीति के क्षेत्र से गंदगी को साफ करने में मदद मिल सकेगी, इसमें सन्देह नहीं। इन उपायों को लागू करने के लिए अगर संविधान में हजारों संशोधन भी करना पड़े,यहाँ तक कि संविधान को ही फिर से लिखना पड़े तो वह भी किया जाए क्योंकि ऐसा किए बिना राह से भटके हुए भारतीय लोकतंत्र को फिर से पटरी पर लाया ही नहीं जा सकता।

- ब्रज किशोर सिंह 

राजनीति भी एक व्यवसाय है

मित्रों,अभी कुछ दिनों पहले ही भारत की प्रमुख राजनीतिक पार्टियों की आमदनी के बारे में अखबारों में पढ़ने को मिला। देखकर मेरी आँखें फटी-की-फटी रह गईँ। हर्रे लगे न फिटकरी और रंग भी चोखा होए। तेल भी नहीं लगता और पूड़ी भी पकती जाती है,पकती जाती है। कहना न होगा आज राजनीति भी एक व्यवसाय है जिसमें शुरू में जनता में विश्वास बनाना पड़ता है और कुछ पैसा अपने पास से भी लगाना पड़ता है। एक बार पार्टी जनता के बीच स्थापित हो गई फिर तो बीसों ऊंगलियाँ घी में और सिर चाशनी की कड़ाही में। पारिवारिक वर्चस्व के चलते आज सारे दल चापलूसी के बेहतरीन अड्डे बन गए हैं। कोई भी नेता अपने पार्टी-नेतृत्व के खिलाफ जुबान ही नहीं खोल पाता। विरोध करते ही उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। क्या इस तानाशाही को लोकतंत्र का नाम दिया जा सकता है? जब पार्टियों में ही लोकतंत्र नहीं है तो वे क्या खाकर देश में लोकतंत्र और लोकतांत्रिक-संस्कृति को मजबूत करेंगी?
मित्रों,बैठे-बिठाये इतनी आमदनी तो शायद भारत के सबसे बड़े धनकुबेरों को भी नहीं होती होगी जितनी आज हमारे राजनीतिक दलों को हो रही है। आमदनी भरपूर और जिम्मेदारी कुछ भी नहीं। यहाँ तक कि 20000 रूपये से कम प्राप्त चंदे का विवरण देना भी आवश्यक नहीं और इस पर भी वे पूरा और सही विवरण नहीं देती हैं। कोई 10 प्रतिशत आमदनी का विवरण दे रहा है तो कोई 40 प्रतिशत का और कानून और न्यायालय फिर भी कुछ कर नहीं पा रहे हैं,क्यों? जब केजरीवाल अपने दल का आय-व्यय बताने को तैयार हैं तो अन्य पार्टियों को क्या परेशानी है और क्यों है? यह 20000 रूपये वाली सीमा भी सिर्फ जनता को धोखा देने के लिए है। अगर कोई 20000 रूपये की 20000 किस्तों में पैसा दे तो या फिर इस तरह ही चंदे की रकम दर्ज की जाए तो? इसलिए इन दलों के लिए एक-एक पैसे का हिसाब देना अनिवार्य किया जाए। पार्टियाँ बातें तो आम आदमी की करती हैं और काम पूंजीपतियों का करती हैं। उनको बताना ही चाहिए उनके खजाने में पैसा कहाँ से आता है। वे कौन-से लोग हैं जो उनकी पार्टी के फंड में करोड़ों-करोड़ रुपए देते हैं और क्यों देते हैं? इसके बदले में धनपतियों को क्या मिला,पार्टी ने क्या दिया तभी तो सामने आ पाएगा? दोनों मुद्दे एक-दूसरे से अंतर्गुंथित हैं। करोड़ों रुपए पार्टी फंड में देनेवाले पूंजीपति ऐसा कोई परोपकार की भावना से नहीं करते हैं बल्कि उनकी कुछ-न-कुछ बदले में पाने की उम्मीद लगी रहती है फिर चाहे लाभार्थी दल सत्ता में हो या विपक्ष में। सत्ता में हुआ तो वह धनपति को सीधे लाभ पहुँचाने की स्थिति में होता है जैसे बाड्रा और हरियाणा सरकार या फिर कोयला आबंटन में टाटा,अंबानी और जिंदल को प्राप्त लाभ का उदाहरण भी हम ले सकते हैं और अगर विपक्ष में हुआ तो फिर मंत्री को सिफारिशी पत्र तो लिख ही सकता है जैसा पिछले दिनों गडकरी ने संचेती के लिए लिखा। इतना ही नहीं कई बार तो धनपति राजनीतिक दलों को पैसा देकर सीधे लोकसभा या राज्यसभा का सदस्य ही बन जाते हैं जैसे अनिल अंबानी या विजय माल्या। वैसे हमारे कई परंपरागत नेता भी अब उद्योगों और व्यापार में हाथ आजमाने में पीछे नहीं हैं। चाहे वे दिवंगत विलासराव देशमुख हों या शरद पवार हों या फिर कमलनाथ जी हों। जाहिर है ये लोग भी सरकार में रहते हुए सरकार की नीतियों को अपने व्यापार के हितार्थ प्रभावित करते ही होंगे और बदले में पार्टी फंड में अपना अमूल्य योगदान भी करते होंगे।
         मित्रों,राजनीतिक दलों के लिए आय के स्रोत के साथ-साथ उन्होंने चंदे से प्राप्त धन का व्यय कहाँ-कहाँ किया यह बताना भी कानूनन जरूरी बनाया जाए। हवाई-यात्रा पर खर्च कर दिया या 8000 रूपये प्रति प्लेट वाला खाना खाया गया या पार्टियों और चुनावों के समय दारू की नदी बहा दी गई या इनका दुरूपयोग वोट खरीदने में किया गया? 'माल महाराज के मिर्जा खेले होली' बहुत दिन चल गया अब नहीं चलने वाला है,किसी भी कीमत पर नहीं। वोट हमारा काम तु्म्हारा आखिर कहाँ का न्याय है?
          मित्रों,क्या विडंबना है कि लगभग पूरा देश,पूरा शासन-प्रशासन आरटीआई के दायरे में है और शासन-प्रशासन को चलानेवाले दल ही इसके दायरे में नहीं हैँ। जबकि उनके बारे में जानने का जनता का अधिकार तो और भी ज्यादा है? जनता के लिए य़ह जानना तो और भी ज्यादा जरूरी है कि वे जिन राजनीतिक दलों को वोट दे रहे हैं वे कर क्या रहे हैं? कहीं वे लेन-देन की दुकान तो नहीं बन गए हैं?
           मित्रों, जैसा कि हम इस आलेख की शुरुआत में भी अर्ज कर चुके हैं कि आज लोकतंत्र की सबसे महत्त्वपू्र्ण ईकाई राजनीतिक पार्टियों में ही लोकतंत्र नहीं है। भाजपा और साम्यवादी दलों को छोड़कर सारे दल पारिवारिक कंपनियों की तरह हैं। पार्टियों का दुकानों में बदल जाना और वो भी खानदानी दुकानों में किसी भी तरह से भारतीय लोकतंत्र की प्रगति की दिशा में स्वस्थ गतिविधि नहीं है। जब जी चाहा पार्टी का संविधान बदल दिया। यह अधिकार उनको दिया ही क्यों गया है और कैसे दिया जा सकता है? इन दलों के हित सिर्फ इनके व्यक्तिगत हित नहीं हैं बल्कि इनसे हमारे देश और प्रदेशों के हित भी प्रभावित होते हैं,जुड़े हुए हैं। हमारे देश में एक ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि जिससे सारे दलों के लिए एक समान नियम हों। जैसे कि पार्टी के पंजीकृत-कार्यकर्ता सीधे पार्टी-पदाधिकारियों का चुनाव करें। जैसे कि कोई व्यक्ति या उसका रक्त-संबंधी लगातार एक या दो बार से ज्यादा एक ही पद को धारण नहीं कर पाए। ऐसी व्यवस्था हमारे यहाँ प्राचीन काल में भी थी। संगम काल में या चोल-शासन में तमिलनाडु में स्थानीय-निकायों में एक ही व्यक्ति या उसका रक्त-संबंधी लगातार दो सालों तक एक ही पद के लिए चुना नहीं जा सकता था। ऐसा नहीं होता था कि खुद पद से हटना पड़े तो भाई,लड़के या पत्नी को बिठा दिया। जब ऐसा प्राचीन काल में हो सकता था तो अब ऐसा क्यों संभव नहीं है?
मित्रों,सिर्फ व्यवस्था बना देने से भी कुछ नहीं होगा यह भी देखना पड़ेगा कि नियमों-उपनियमों का अनुपालन हो भी रहा है कि नहीं। तो इसके लिए या तो चुनाव आयोग को ही अधिकृत कर दिया जाए या ज्यादा अच्छा हो कि किसी पूरी तरह से स्वायत्त-निकाय की स्थापना की जाए जिसके अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति की प्रक्रिया पूरी तरह से पारदर्शी हो और जिसकी चयन समिति में न तो सरकार का बहुमत हो और न तो अन्य राजनीतिक दलों का ही। इसके साथ ही नियमों-कानूनों का उल्लंघन करने पर पार्टियों के लिए सख्त सजा का भी प्रावधान होना चाहिए। उनकी मान्यता रद्द कर देनी चाहिए और उनके प्रमुख नेताओं के चुनाव लड़ने पर आजीवन प्रतिबंध लगा दिया जाना चाहिए।
मित्रों,आर्थिक सुधारों से कम महत्वपूर्ण नहीं हैं ये प्रस्तावित और विलंबित सुधार क्योंकि इन सुधारों पर ही हमारे लोकतंत्र का भविष्य टिका हुआ है न कि आर्थिक सुधारों पर। दलों के संचालन और नियंत्रण के मामले में पारदर्शिता लाना जरूरी ही नहीं महाजरूरी है क्योंकि ऐसा नहीं होने से ही देश-प्रदेश में भ्रष्टाचार और धनिकतंत्र को बढ़ावा मिलता है। इसके चलते ही राजनीति आज एक गंदी गाली बनकर रह गई है। इस तरह के ऐहतियाती उपायों के बावजूद अगर धनपति चाहें तो पार्टी फंड में पैसा नहीं देकर उसी तरह से पार्टी नेतृत्व को लाभ पहुँचा सकते हैं जैसा कि वाड्रा के मामले में डीएलएफ ने किया फिर भी इससे काफी हद तक राजनीति के क्षेत्र से गंदगी को साफ करने में मदद मिल सकेगी, इसमें सन्देह नहीं। इन उपायों को लागू करने के लिए अगर संविधान में हजारों संशोधन भी करना पड़े,यहाँ तक कि संविधान को ही फिर से लिखना पड़े तो वह भी किया जाए क्योंकि ऐसा किए बिना राह से भटके हुए भारतीय लोकतंत्र को फिर से पटरी पर लाया ही नहीं जा सकता।

भाजपा उनसे ज्यादा भयभीत है।

जल्द ही नया राजनीतिक दल बनाने जा रहे अरविंद केजरीवाल भले ही लगातार दिल्ली सरकार व सोनिया गांधी के जवांई राबर्ड वाड्रा के बहाने कांग्रेस पर हमले बोलते जा रहे हों, मगर भाजपा उनसे ज्यादा भयभीत है। उसे डर है कि वे न केवल कांग्रेस विरोधी वोटों में, जो कि इस बार भाजपा को मिलने की उम्मीद थी, में हिस्सा बांटेंगे, अपितु भाजपा से निराश मतदाताओं में भी सेंध डालेंगे।
हिंदूवादी भाजपा केजरीवाल से कितनी भयभीत है, इसका अनुमान इस विश्लेषण के साथ दिए गए चित्र से, जो कि किसी हिंदूवादी ने फेसबुक पर लगाया है, से लगाया जा सकता है। जैसे ही यह चित्र फेसबुक पर लगा, टिप्पणियों का तांता लग गया। हिंदूवादियों ने केजरीवाल को न केवल भद्दी-भद्दी गालियां बकीं, अपितु उन्हें कांग्रेस व सोनिया का एजेंट तक करार दे दिया। इस बहसबाजी में बेचारे केजरीवाल समर्थक बार-बार शालीन भाषा में सफाई देते रहे, मगर हिंदूवादियों ने उन पर ताबड़तोड़ हमले जारी रखे।
असल में प्रतीत ये होता है कि जो केजरीवाल पहले कांग्रेस पर हमले बोलने के कारण भाजपा को बड़े प्रिय लग रहे थे और इसी वजह से भाजपाइयों ने उनका साथ दिया, वे ही जब दोधारी तलवार की तरह भाजपा पर भी हमले करने लगे तो भाजपाइयों को सांप सूंघ गया है। संघ व भाजपा ने टीम अन्ना का पीछे से साथ दिया ही इस कारण था कि जो काम वह खुद नहीं कर पाई, वह टीम अन्ना कर रही थी। जो माहौल भाजपा के दिग्गज लाल कृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा से नहीं बन पाया, वह टीम अन्ना ने खड़ा करके दिखा दिया। जाहिर सी बात है कि खुद भी भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी भाजपा स्वयं तो कांग्रेस के विरोध में सशक्त आंदोलन खड़ा नहीं कर पाई, मगर बिना स्वार्थ के केवल देशभक्ति के लिए आंदोलन करने वाली टीम अन्ना ने वह माहौल खड़ा कर दिया, जिसका सीधा-सीधा लाभ भाजपा को होना था। तब तक इस बात की आशंका नहीं थी कि केजरीवाल अलग से पार्टी बनाएंगे, इस कारण भाजपा यही सोच रही थी कि वह टीम अन्ना के आंदोलन से बना कांग्रेस विरोधी माहौल अपने पक्ष में वोटों के रूप में भुना लेगी। मगर जैसे ही केजरीवाल टीम अन्ना से अलग हो कर नई पार्टी बनाने का उतारु हुए, भाजपा का सोचा हुआ प्लान बिगड़ गया। इतना ही नहीं केजरीवाल ने भाजपा को भी निशाने पर ले लिया। कोयला घोटाले में तो उन्होंने कांग्रेस व भाजपा को एक ही तराजू में तोल दिया। इससे बड़ा नुकसान ये हुआ कि जो भाजपा कांग्रेस के विकल्प के रूप में लोगों को स्वीकार्य थी, उस पर भी कालिख पुत गई। कांग्रेस तो चलो पहले से बदनाम थी, इस कारण कोयला घोटाले की कालिख से जहां सत्यानाश, वहां सवा सत्यानाश वाली कहावत की चरितार्थ हो रही थी, मगर दूध की धुली कहलाने वाली भाजपा की सफेद कमीज पर लगी थोड़ी भी कालिख उभर कर मुंह चिढ़ा रही है। इतने पर भी भाजपा ने सबक नहीं लिया। बिजली बिल को लेकर दिल्ली में चल रहे आंदोलन में भाजपा नेता विजय गोयल ने सदाशयता में केजरीवाल को मंच पर बुला लिया और केजरीवाल ने सिला ये दिया कि पलट कर भाजपा पर ही हमला बोल दिया। गोयल पछताए तो बहुत, मगर रोने के सिवाय उनके पास कोई चारा नहीं था। इस घटना के बाद अब भाजपा बेहद सतर्क हो गई है।
इसी कड़ी में किसी भाजपाई ने फेसबुक पर मुहिम के रूप में यह चित्र शाया किया, ताकि हिंदूवादी वोट खिसक कर केजरीवाल की ओर न चले जाएं। इस चित्र पर प्रतिक्रिया करते हुए भाजपाइयों ने अनेक उदाहरण देते हुए केजरीवाल को कांग्रेस जैसा ही सेक्युलर कुत्ता करार दिया। ये बहस इतनी घटिया स्तर पर हो रही है कि उसमें प्रयुक्त शब्दों का उल्लेख तक करना मर्यादा के खिलाफ प्रतीत होता है।
कुल मिला कर सच ये है कि कांग्रेस व भाजपा को एक जैसा बताने की कोशिश में केजरीवाल कांग्रेस से ज्यादा नुकसान भाजपा को पहुंचा रहे हैं। आगे आगे देखें होता क्या है?
-तेजवानी गिरधर

किसी को इज्जत की परवाह नहीं !

हरियाणा में एक महीने में बलात्कार की 16 घटनाएं हो जाती हैं...पुलिस ज्यादातर मामलों में आरोपियों को गिरफ्तार करने में भी नाकाम साबित होती है...ऐसे में यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी जो कि खुद एक महिला हैं...हरियाणा के जींद में एक पीड़ित दलित परिवार के घर पहुंचती है...सोनिया पीड़ित परिवार को ढ़ांढ़स तो बंधाती हैं...लेकिन घर से बाहर निकलते ही वे भूल जाती हैं कि वे भी शायद एक महिला हैं...ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि बाहर निकलकर सोनिया गांधी से तो कम से कम एक इतने संवेदनशील मुद्दे पर ऐसे बयान की उम्मीद कतई नहीं थी। सोनिया इन घटनाओं के लिए राज्य की कांग्रेस सरकार...जो कि उनकी ही पार्टी की है...पर ये कहते हुए पर्दा डालने की कोशिश करती हैं...कि बलात्कार की घटनाएं तो देशभर में हो रही हैं...खैर सोनिया ने ये कहा सो कहा...सोनिया के इस बयान के बाद से इस मुद्दे पर राजनीति गर्मा जाती है...और तमाम विपक्षी दल सोनिया के इस बयान की आलोचना करते हैं...लेकिन योगगुरु बाबा रामदेव जिनकी कर्मभूमि भले ही हरिद्वार हो लेकिन उनकी जन्मभूमि तो हरियाणा हैं...लगता है इस बयान से कुछ ज्यादा ही आहत हो गए...और सोनिया पर ये कहकर वार करते हैं कि...सोनिया जी अगर ये घटना आपकी बेटी के साथ होती तो क्या तब भी आप ऐसा ही बयान देती। अब रामदेव के इस बयान के पीछे की वजह सिर्फ और सिर्फ सोनिया का बयान ही था या फिर केन्द्र सरकार के खिलाफ उनकी बौखलाहट ये तो आप भी बेहतर समझ गए होंगे। बहरहाल सोनिया के बयान के बाद उठे बवाल को रामदेव ने ये कहकर उबाल जरूर दे दिया...अबकी बार रामदेव ने सीधा सोनिया गांधी पर हमला बोला था...वो भी तीखा तो कांग्रेसी कहां पीछे रहने वाले थे। एक एक कर केन्द्र सरकार के मंत्री और कांग्रेसी नेता रामदेव पर बरस पड़ते हैं...औऱ रामदेव के योगगुरु होने पर ही सवाल खड़े कर देते हैं। बड़ा सवाल ये भी है कि रामदेव के जिस बयान पर कांग्रेस बौखलाई हुई है...शायद कांग्रेस ये भूल गई कि ऐसा ही कुछ बयान कांग्रेस नेता रीता बहुगुणा ने करीब ढाई साल पहले दिया था...जब रीता ने बुलंदशहर में सरेआम एक सभा में कहा था कि उत्तर प्रदेश में अपराध का बोलबाला है और यूपी में लड़कियों की ईज्जत लूटी जा रही है...और बसपा सरकार तसल्ली के लिए मुआवजा बांट रही हैं...इसलिए मैं कहती हूं की दो लाख रूपए मुझ से ले लो और कर दो मायावती का बलात्कार फिर देखते हैं क्या होता है। रीत बहुगुणा जोशी के इस बयान के बाद बसपा कार्यकर्ताओं ने रीता के घर में आग लगा दी थी...लेकिन आज रामदेव सोनिया गांधी पर कुछ ऐसा ही बयान देते हैं तो कांग्रेस बौखला जाती है। राजनीति को इसी लिए सियूटिब्लयूटी का खेल कहा जाता है...जो अपने पर सूट करे वो तो सही है...जो न करे उस पर सामने वाले की जमकर खबर ले लो। बयानों की इस जंग के बीच इनेलो के ओम प्रकाश चौटाला साहब खाप पंचायतों के उस फैसले का समर्थन करते दिखाई देते हैं...जिसमें खाप पंचायतें कहती हैं...कि लड़कियों की शादी 15 वर्ष की उम्र तक कर देनी चाहिए ताकि बलात्कार की घटनाओं को कम किया जा सके। एक नई जुबानी जंग शुरू  जाती है...लेकिन हरियाणा में एक महीने में हुई बलात्कार की घटनाओं के पीड़ित औऱ उनके परिवार पर क्या गुजर रही होगी...इसका ख्याल किसी को नहीं है। विडंबना तो ये है कि पीडितों के हिमायती बनने वाले ये राजनीतिक दल किसी भी घटना के बाद घड़ियाली आंसू बहाते तो दिखाई दे जाते हैं...लेकिन इन घटनाओं को कम करने या रोकने के लिए...और आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए कोई सख्त कदम उठाने के लिए पहल करते नहीं दिखाई देते। इसे देश का दुर्भाग्य ही कहेंगे कि हमारे राजनेता हर घटना पर राजनीति करने से बाज नहीं आते फिर चाहे किसी की बहू – बेटी की इज्जत आबरू की क्यों न दांव पर लगी हो। राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के आंकड़ें तो इसकी भयावहता खुद बयां करते नजर आते हैं कि वाकई में देशभर में महिलाएं कितनी सुरक्षित हैं। हरियाणा की ही अगर बात कर लें तो औसतन यहां रोज दो लड़कियां बलात्कार की शिकार हो रही हैं। पुलिस के आंकड़ें कहते हैं कि 2012 में हरियाणा में अब तक करीब 460 बलात्कार की घटनाएं हो चुकी हैं। जबकि 2011 में ये संख्या 733 थी। ये तो महज वे आंकड़ें हैं जो दर्ज हैं...ऐसे सैंकड़ों मामले और भी हैं जो किसी सरकारी रजिस्टर में लोक लाज के भय से या फिर दबंगों के डर से दर्ज नहीं हो पाते...यानि कि ये घटनाएं जितनी सामने आती हैं...उससे कही ज्यादा होती हैं। ऐसे में सवाल यही उठता है कि आखिर कब भले मानस का लबादा ओढ़कर हमारे बीच में घूम रहे ऐसे वह्शी दरिंदों के खिलाफ पुलिस और राज्य सरकारें उनके रसूख औऱ राजनीतिक कनेक्शन को दरकिनार करते हुए दबंगई से उनके खिलाफ कार्रवाई करेंगी...और उन्हें जेल की सलाखों के पीछे भेजेंगी ताकि युवतियां – महिलाएं बैखौफ होकर घर से बाहर निकल सकें...हालांकि ऐसा तब तो कम से कम संभव नहीं दिखाई देता जब तक सरकार में बैठे लोग भाई भतीजावाद और अपनी कुर्सी की महत्वकांक्षा को त्याग कर काम नहीं करेंगे। उम्मीद करते हैं कि अगली बार देश के जिम्मेदार नेताओं और लोगों से तो कम से कम ऐसे बयान सुनने को न ही मिले...जिनसे लोगों को बड़ी उम्मीदें हैं। उम्मीद तो ये भी कर सकते हैं कि ऐसी घटनाएं ही हमें सुनने को न मिले...हालांकि ऐसी बातें तो हमारे राजनेता भी बखूबी कर लेते हैं...लेकिन कहते हैं न अच्छा सोचना और अच्छा करना दोनों में बड़ा फर्क है...बस जरूरत है तो इस बात को समझने कि...देखते हैं इस चीज को समझने वाले हमारे देश में कितने लोग हैं।
 
- दीपक तिवारी 

हत्या एक जुर्म है, चाहे मनुष्य की हत्या हो या किसी पशु, पंछी की.......

''Right to live'' should be equal for Animals and Human......Think it.

शेर , बाघ या हीरण मारने पर देश का कानून सजा का निर्धारण करता है और बकरा , गौ , मुर्गे और मछली को मारने पर कोई कानून नही जबकि हत्या तो हत्या ही है जिसको भगवान ने धडकता हुआ दिल , सांस लेने का अधिकार दिया है उसकी हत्या एक जुर्म मानी चाहिए और रोक लगाने का कदम उठाना चाहिए वो चाहे मनुष्य की हत्या हो या किसी पशु, पंछी की.......

''जीवन का अधिकार सब का ही है''.......... संविधान में संशोधन की आवश्यकता है......
अगर राक्षस ढूंढने हो तो प्राचीन युग मे जाने की आवश्यकता नहीं .....ये चिकिन,बिरियानी ,मटन आदि खाने वाले गिद्ध आपको अपने आस पास ही मिल जाएगे। सात्विक भोजन के लाखो विकल्प है , अनेक व्यंजन है , पर नहीं ये तो मुर्गो ,और बकरो को काट काट कर ही खाएँगे कलयुग के राक्षस का तमगा तभी तो मिलेगा ऐसे लोगो को ।

थोड़ा सोचो ...मनुष्य हो या पशु......... देह का आकार अलग है , देह कीबनावट अलग है ... पर आत्मा तो दोनों मे एक सी ही है ..... शरीर स्वयं तो नहीं जीता आत्मा ही उसेजीवटता प्रदान करती है तो
एक मनुष्य की हत्या करने पर जितना पाप लगता है उससे भी अधिक पाप एक पशु की हत्या करने पर लगता है , पशु पर अधिक इसलिए क्यो को इंसानगलतिया करते है पाप भी करते है उनकी हत्या पर पाप कम होगा किन्तु तुम कुत्ते जिन निर्मुक जीवो की खाल को खींच खीच कर उनके मास को नोचते हो उन्होने तुम्हारा न कुछ बुरा किया न वो कुछ गलत करते है ।

तुम्हारी एक उंगली थोड़ी सी कट भी जाये तो कितनी पीड़ा होती होगी तुम्हें ..... सोचो उस बेचारेपशु को जब काटा जाता होगा तो क्या उसे पीड़ा नही होती होगी वोचिल्ला नहीं सकता पर आत्मिक चीख तो उसकी भी निकल पड़ती होगी जब वो देखता होगा हा अब उसे काटकर कुछ नीच , राक्षस अपना भोजन बनाने वाले है ।

जो मास खाते है वो ये बताए अगर तुम्हारी संतान को कोई काटकर ऐसे ही .......तो ????? अगर तुम अपनीसंतान की एक उंगली में थोड़ा सा खून भी नहीं देख सकते तो फिर निर्मुक जीवो को काटकर तुम लोग कैसे खा जाते हो ? अगर तुम जानवरो को को मार कर खा सकते हो तो इन्सानो का भी मास खाना तुम लोगो के लिए कोई बड़ी बात नहीं है । तो किसी पशु को खाने का अधिकार तुम्हें तभी होगा यदि तुममे अपनी संतान को काटकर खाने की हिम्मत है और तुम खा भी सकते हो क्यो की दया ,प्रेम जैसे भाव तो तुम्हारे उसी दिन खत्म हो जाते है जब तुम मास सटकते हो ।

तुम जानवरो का मास खा रहे हो .......तो तुम्हारी औलादों इन्सानो का मास खाने से परहेज नहीं करेगी.........जो भी आज इन्हे काट रहे है , या मास भक्षण कर रहे है ... वो याद रखे एक दिन उन्हे भी ऐसे ही काटकर खाया जाएगा .......


और में अपनी तरफ से उन्हे एक सुझाव दूंगा --"आगर तुम लोगो की प्रवर्ती राक्षसो जैसी ही हो गयी है .....और असात्विक भोजन ही करना है तो किसी शोचलाय में जाकरमलभक्षण कर लिया करो ...... मास खाने से तो अच्छा रहेगा ये तुम्हारे लिए, पाप भी नहीं लगेगा। और फिर ये तुम लोगो के लिये बड़ी बात थोड़े ही है जब तुम लोगे अंडे से मुर्गे के वीर्य कोनिकालकर तल कर खा सकते हो तो ये कौन सी बड़ी बात है ............... ............... .......... अब भी संभल जाओ........ जय जय श्री राम

- पंडित राजन शर्माजी

रविवार, 14 अक्टूबर 2012

उ.प्र. नीचता में भी लल्लन टॉप !


चोरी-चमारी भ्रष्टाचार हत्या बलात्कार अपहरण घोटाला महा घोटाला नीचता कमीनापन अधर्म कुकर्म की जब कभी भी आगे आने वाले इतिहास में चर्चा होगी तब उत्तर प्रदेश का नाम इन सदगुणों को अपनाने वाले भारतीय राज्यों में सबसे ऊपर स्वर्ण अक्षरों में लिखा जायेगा यह दुर्भाग्यपूर्ण है की उत्तर प्रदेश को आज़ादी के बाद राज्य सँभालने के नाम पर जो भी नेतृत्व मिला वह स्वार्थी भ्रष्ट और नीचता की पराकाष्ठा पर रहा. यहाँ की जनता अपनी छोटी-छोटी समस्याओं को लेकर त्राहि-त्राहि करती रही और यहाँ के अवसर वादी परिवारवादी नेता जनता के पैसे पर अय्याशी करते रहे. दूसरे राज्य के लोग उत्तर प्रदेश का क्या मुकाबला करेंगे. 100-50 करोड़ का घोटाला करके अन्य राज्यों के नेता अपने आपको तीस मार खां समझते हैं उत्तर प्रदेश में महाकुम्भ घोटाला ही हजारों करोड़ का हो गया आपको उत्तर प्रदेश के नेताओं, कार्यदायी संस्थाओं के अधिकारिओं, प्रशासन के लोगों नेताओं और हजारों बाबुओं के चेहरे पर शर्म दिखाई दे रही है. नीचता ने इन्हें बे शर्मी की भी पराकाष्ठा पर पहुंचा दिया है. जबसे उत्तर प्रदेश का शाशन एक पिता ने भावुकता में अपने बच्चे को सौंप दिया है तबसे इस राज्य में खेल ही खेल हो रहा है. विकास के सारे कार्य भरपूर पैसा दिए जाने के बावजूद रुक गए हैं. जिसे देखिये वही अपनी जेब भर रहा है और सरकार भ्रष्टाचारीयों, अपराधियों और मक्कारों की पीठ थप थपा रही है और ऐसा हो भी क्यों न आखिर उत्तर प्रदेश कमीने पन में किसी से पीछे थोई न रहना चाहेगा. बड़े भाई खुशी मनाईये हम नीचता में लल्लन टॉप हैं और इलाहाबादी हैं इसलिए हमसे आगे कौन जायेगा- सत्य वचन से साभार. 

रोजगार दीजिए अखिलेश जी !


उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रदेश के नौ लाख बेरोजगारों को बेरोज़गारी भत्ता देने का इरादा बनाया था खजाने से इस खैरात को बटने के लिए जुगाड भी कर लिया गया था लेकिन हाय रे सरकार की मजबूरियां. कुल मिला कर तीन लाख स्वाभिमानी सम्मानित लोगों ने इस खैरात के लिए फॉर्म भरा और बाकी छे लाख लोगों को खैरात देने के लिए सरकार इंतज़ार ही करती रह गयी. इन तीन लाख लोगों में से लगभग दस हज़ार लोगों को लाखों रुपय खर्च करके एक भिक्षादान कार्यक्रम में प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने खैरात के चेक दिए. बाकी लोग भी चेक का इंतज़ार कर रहे हैं. आशचर्य है कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री इस तरह की खैरात बात कर मुफ्तखोरी और हरामखोरी को तो बढ़ावा दे रहे हैं लेकिन उनकी समझ में यह बात नहीं आ रही है कि बेरोज़गारी भत्ते के उम्मीदवार सम्मानित लोगों को नए उद्योग स्थापित करके काम पर कैसे लगाया जाये. मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की सरकार में जिन मंत्रियों से यथासमय कुछ बोलने की जनता आशा भी करती रही वो मुलायम सिंह यादव के डर के मारे चूहा बने बैठे हैं. बिल से निकले नहीं कि दबोच लिए जायेंगे इसलिए इन मंत्रियों ने सोह लिया है कि चुप रहने में ही फायेदा है कम से कम लाल बत्ती की गाड़ी तो बनी रहेगी पिछले दिनों आज़म खां साहब ने कुछ विचार रखे थे तब मुलायम सिंह यादव ने उनसे कहा था कि आप काफी योग्य हो गए हैं राजनीति की समझ भी आपकी काफी बढ़ गयी है आपको दिल्ली की राजनीति करनी चाहिए उसके बाद आज़म खां साहब को किसी ने बोलते नहीं सुना. ज़ाहिर है कि अब कोई ऐसा नहीं जो प्रदेश के मुख्यमंत्री को समझा सके कि उन्हें देश के युवाओं के बीच बेरोज़गारी भत्ता बाँट कर हरामखोरी को बढ़ावा नहीं देना चाहिए. हाँ यह भी सोचना होगा कि बाकी छे लाख बेरोजगारों की सरकारी अधिकारी कहीं कोई सूची तैयार करवा कर इनके हिस्से का बेरोज़गारी भत्ता कहीं खुद न लेले क्योंकि प्रदेश में यही तो काबिल लोग हैं जो सरकार में आते ही परमानेंट बेरोजगार हो जाते हैं.- सत्य वचन से साभार.

शुक्रवार, 17 अगस्त 2012

क्या ये भ्रष्टाचार के श्रेणी में नहीं आता ?

विभिन्न पत्रकारिता संस्थानों से डिग्री, डिप्लोमा हासिल कर पत्रकारिता की दुनिया में एक दिन छा जाने और अपना मुकाम बनाने का सपना देखने वाले हजारों-हजार छात्रों को शायद ही इस बात का एहसास हो कि इलेक्ट्रानिक मीडिया में सौ से ज्यादा अच्छे-बुरे चैनल होने के बावजूद इस इण्डस्ट्री में काम के अवसर लगातार कम होते जा रहे हैं। आर्थिक मंदी के बाद इस क्षेत्र में नफा-नुकसान के जो हालात बने हैं, उसने पूरी दुनिया को व्यवस्था और कायदे-कानून का पाठ सिखाने वाले टीवी चैनलों को खुद ही अफरा-तफरी और अव्यवस्था में फंसा दिया है। जाहिर है कि पत्रकारिता का विधिवत् प्रशिक्षण लेकर इस क्षेत्र में आने वाले नवोदित पत्रकारों के सपनों के टूट जाने की संभावना शत्-प्रतिशत हो गई है।
टेलीविजन चैनलों ने बढ़ते आर्थिक दबावों के मद्देनजर न सिर्फ अपनी कार्य-संस्कृति में परिवर्तन किया है, बल्कि ये चैनल सारी मर्यादायें तोड़कर एक रुपये में चार अठन्नी भुनाने के फार्मूले पर चल रहे हैं। ऐसे आदमी की तलाश की जा रही है, जो कई काम एक साथ निपटाने की क्षमता रखता हो। शायद यही वजह है कि कल तक जो समाचार चैनल कवरेज के दौरान कैमरामैन को जरुरी मानते थे, वे आज संवाददाता से ही कैमरा हैण्डल करने की अपेक्षा कर रहे हैं, और इस काम के लिए वे संवाददाता को अलग से कोई पारिश्रमिक भी नहीं देना चाहते।
समाचार चैनलों की स्थिति तो बहुत खराब है। इन चैनलों ने देश भर में जगह-जगह अपने संवाददाता और स्ट्रिंगर्स तो बना लिए हैं, लेकिन काम के बदले में टीवी चैनल्स इन्हे जो पारिश्रमिक दे रहे हैं, वह बेहद शर्मनाक है। कुछ समाचार चैनलों ने आर्थिक मुश्किलों से निपटने के लिए एक अलग ही रणनीति बना रखी है। ये चैनल अपने यहाँ कार्यरत पत्रकारों को पे-स्लिप पर बहुत कम तनख्वाहें देते हैं, लेकिन अनेक भत्तों के नाम पर अलग से इतना पैसा दे देते हैं जो कभी-कभी उनके वेतन से ज्यादा हो जाता है। इस तरह ये टेलीविजन चैनल टैक्स तो बचाते ही हैं, कर्मचारी अंशदान निधि में भी उन्हे कम हिस्सा देना पड़ता है। दूसरी ओर यह भी देखने में आ रहा है, कि तकनीकि विकास का फायदा टीवी चैनल तो उठा रहे हैं, लेकिन पत्रकारों के हाथ कुछ नहीं लग रहा है। जाहिर है कि ऐसी स्थिति में पत्रकारिता मौजूदा दौर में शांत मन से काम करने वाला मिशन नहीं रह गया है, बल्कि यहाँ एक अटूट संघर्ष की स्थिति बनी हुई है। टीवी पत्रकारों और स्ट्रिंगर्स पर इतना दबाव बना दिया गया है कि मानसिक-रुप से स्वस्थ रहने की संभावना इस पेशे में कम होती जा रही है।
इस बाजार में कुछ वरिष्ठ पत्रकार तो एक-दूसरे को धकेलते-धकियाते अपना अस्तित्व किसी तरह बनाए हुए हैं, लेकिन युवा टीवी पत्रकारों की हालत बहुत पतली हो गई है। प्रशिक्षण के नाम पर लगभग सभी प्रतिष्ठित चैनल छः-छः महीने के लिए इन युवा पत्रकारों को ट्रेनिंग पर रखते हैं, और फिर जैसे ही मतलब पूरा हो जाता है, चैनल उन्हे अयोग्य बताकर या राजनीति करने का आरोप लगाकर निकाल देते हैं। ऐसे में समर्पित भावना से काम करने वाले पत्रकारों के उत्साह की हत्या हो जाती है। इन टीवी चैनलों में बैठे आका इन दिनों मुफ्त में काम करने वाले मीडिया मजदूरों की फौज बनाने में लगे हुए हैं। इन चैनलों में काम करने की शर्त सिर्फ इतनी है, कि पैसे की मांग कभी मत करो। अत्याचार की सीमा अब यहाँ तक हो गई है, कि टीवी चैनलों में भी वेतन का कोई मानक नहीं रह गया है। जिसके साथ सौदा जितने में पट गया वह उतने में रख लिया गया।
टीवी चैनलों की नौकरी में ग्लैमर इतना है, कि मुफ्त में काम करने वाला टीवी पत्रकार वेतन की चर्चा होने पर कम से कम बीस हजार रुपये प्रतिमाह तो बताता ही है। दुःख इस बात का है कि वह भी जानता है कि झूठ के सहारे जिंदगी नहीं काटी जा सकती। ये विडम्बना ही है कि कैमरे के सामने खड़ा होकर अन्याय के खिलाफ दहाड़ने वाला पत्रकार या रिपोर्टर खुद इन टीवी चैनलों में अन्याय का शिकार हो रहा है, और चुप्पी साधे हुए है, और कमाल देखिए कि पत्रकार बिरादरी में एक-दूसरे के लिए लड़ने, संघर्ष करने का जज्बा भी नहीं बचा है। हालात ये हो गए हैं कि लोग अपनी ही नौकरी बचाने में लगे हुए हैं।
आज टेलीविजन चैनलों के साथ ग्लैमर, ताकत, पैसा और सत्ता सभी कुछ है, इसलिए लोग इस भ्रष्ट प्लेटफार्म पर नाचकर भी संतोष का अनुभव कर रहे हैं। लेकिन क्या ये संतोष सचमुच संतोष देने वाला है? इससे केवल एक बेचैनी पैदा हो रही है। तमाशा देखिए कि कार्पोरेट जगत की लगभग सभी बड़ी कम्पनियां विधिवत् विज्ञापन करके कर्मचारियों की भर्ती करती हैं। बकायदा कैम्पस इण्टरव्यू होता है, लेकिन टेलीविजन चैनलों के लिए जैसे ये नियम बना ही नहीं है, कर्मचारी भर्ती के सिलसिले में टीवी चैनलों के पास कोई व्यवस्थित और पारदर्शी आधार है ही नहीं। अधिकतर चैनलों में संपर्को और जान-पहचान के आधार पर भर्तियाँ हो रही हैं। सिफारिशों का जितना सम्मान टीवी चैनलों में है, उतना किसी और सेक्टर में नहीं दिखाई देता। हद तो यहाँ तक हो गई है कि टीवी चैनल इन नए पत्रकारों को सिर्फ सुन्दर चेहरा देखकर भर्ती कर ले रहे हैं। उदारता इतनी है कि ये इन नए पत्रकारों को सहयोग के रुप में भी कुछ आर्थिक मदद नहीं करते और जब चाहते हैं, हटा देते हैं। फार्मूला केवल एक ही है कि कम से कम लोगों से अधिक से अधिक काम निकाला जाए। ऐसे में नए पत्रकार का कोई जीवन नहीं रह जाता। काम के घंटे अनियमित और लम्बे होते हैं और वेतन होता है पांच हजार। करना हो तो करो वरना चलते बनो, लाईन में बहुत लोग खड़े हैं।
दुःखद पहलु तो यह भी है कि ये पत्रकारिता पढ़ाने वाले अध्यापक भी टेलीविजन चैनलों की हकीकत को छात्रों से छुपाकर रखते हैं, क्योंकि उन्हे पता है कि इस हकीकत के सार्वजनिक होते ही उनकी पत्रकारिता की दुकान में भी ताला लग जायेगा। गौरतलब है कि देश भर में चल रही पत्रकारिता सिखाने वाली दुकानें हजारों की संख्या में चल रहीं हैं, और ये हजारों की संख्या में ही प्रतिवर्ष तथाकथित पत्रकार भी बनाती हैं। आश्चर्य इस बात का है कि इनमें से अधिकतर पत्रकारिता संस्थानों में काम कर रहे अध्यापकों के पास पत्रकारिता की मामूली-सी डिग्री भी नहीं है। ये अध्यापक खुद इधर-उधर से सर्टिफिकेट और डिप्लोमा कोर्स करके पत्रकारिता की डिग्री बेंचने में सहयोग कर रहे हैं। यह एक तरह का छात्रों के साथ धोखा है। छात्रों को ये बताया जाना चाहिए कि टीवी चैनलों में दो लाख और चार लाख रुपया प्रतिमाह वेतन लेने वाले पत्रकारों की संख्या पांच प्रतिशत भी नहीं है। ऐसे लोगों को किसी भी स्थिति में आदर्श नहीं माना जा सकता।
टीवी चैनलों का एक और घटिया पक्ष पिछले दिनों उजागर हुआ है। अधिकतर टीवी चैनलों ने प्रशिक्षण के नाम पर खुद ही अपने इन्स्टीट्यूट खोल लिए हैं और वे प्रशिक्षण के बाद अपने चैनल में नौकरी देने का लालच देकर टीवी पत्रकारिता में आने के इच्छुक छात्रों से मोटी रकम वसूल कर रहे हैं। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो अधिकतर छात्रों को ये चैनल नौकरी पर नहीं रखते। कुछ टीवी चैनलों ने समाचार चैनलों की फुटेज बेंचने का धंधा भी शुरु कर दिया है। कुल मिलाकर उद्देश्य अब टीवी चैनलों का अधिक से अधिक कमाई करने का हो गया है। सब महसूस करते हैं कि ये सभी परिवर्तन उचित नहीं है।
यह सच है कि टीवी चैनल इण्डस्ट्री को कभी न कभी एक बड़े बाजार में बदलना ही था, लेकिन अपने देश में यह बच्चा तभी बिगड़ गया जब ये घुटने-घुटने चल रहा था। टीवी चैनलों ने सारी बुराईयों को आत्मसात समय से पहले ही कर लिया है, इसलिए अब इसमें अच्छी बातें, संस्कार कब और कैसे दाखिल होंगे इसे अभी से कुछ भी नहीं बताया जा सकता। लेकिन ये तय है कि प्रयोग के नाम पर टीवी चैनलों में कुछ भी किया जाए, लेकिन जब तक प्रसारण सामग्री की गुणवत्ता में सुधार नहीं आयेगा तब तक इस माध्यम से कोई उम्मीद नहीं की जानी चाहिए। गुणवत्ता तभी बनेगी जब पत्रकारों की मानसिक, शारीरिक और आर्थिक स्थितियों को सुधारने की दिशा में भी सोचा जायेगा। पत्रकार स्वस्थ नहीं होंगे तो स्वस्थ पत्रकारिता कैसे होगी ?

- लखन मिश्र