.किसी व्यक्ति की "निजी उपलब्धि " को देश के प्रति जिम्मेदारी से कैसे जोड़ सकते है...??.....सचिन तेंदुलकर या अमिताभ बच्चन जैसे प्रतिभाशाली लोगो ने निसंदेह विश्व में देश का सम्मान बढाया ,.इसमें कोई दो मत नही ,..लेकिन इन्होने अभिनय या क्रिकेट की शुरुवात " देश की सेवा की भावना से ओत प्रोत हो कर की थी इस बात पे मुझे संशय है | सचिन ने जब 4 साल की उम्र में बल्ला थामा या अमिताभ ने मुंबई आकर फिल्मो में काम पाने स्टूडियो के चक्कर लगाने शुरू किये तो मुझे इसमें .." देश सेवा "... का जज्बा नही अपनी रूचि के लिए समर्पण ज्यादा दिखता है |आप मुझसे असहमत हो सकते है | मेरे हिसाब से क्रिकेट और फिल्म इनके गहरी रूचि का विषय था न की देशसेवा .|...इन्होने पूरी तन्मयता से अपने क्षेत्र में अनथक परिश्रम किया और अद्भुत उदाहरण पेश करते हुए सफलता के माउंट एवेरेस्ट पर पहुंचे..|. मैं फिर दोहराना चाहती हूँ.,.....निसंदेह हम उनकी काबिलियत की इज़्ज़त करते है .....लेकिन इनकी निजी उपलब्धि को 'देशसेवा" जैसे कीमती और त्यागी शब्दों से जुड़ने में अभी लंबा सफ़र तय करना होगा .| सचिन तेंदुलकर और अमिताभ बच्चन बेहद शालीन , गंभीर , व्यवहारिक बुद्धि के व्यवसायिक सफल इंसान है | उनके निकट के मित्र अनिल अम्बानी के n.g.o. को भी ये दोनों सपोर्ट कर रहे है जिसमे सचिन ने एक गाँव में बिजली की व्यवस्था का जिम्मा अनिल अम्बानी के साथ लिया है | सचिन तेंदुलकर कांग्रेस द्वारा मनोनित महाराष्ट्र से राज्यसभा सदस्य है | राज्यसभा सदस्य की 50,000 rs प्रतिमाह वेतन और 15000 प्रतिमाह कार्यालय के रख रखाव के लिए अलग से | अभी कुछ दिनों पहले राज्यसभा ने अनुपस्थित सदस्यों की लिस्ट जारी की गई जिसमे पिछले 4 सालो में सचिन को जब न्यूनतम हाजरी होने से सदस्यता खत्म होने का नोटिस दिया तब वो एक दिन के लिए वहाँ पहुंचे | अपने क्षेत्र में खर्च किये जाने के लिए प्रत्येक राज्यसभा सदस्य को जो 60 लाख सरकारी फण्ड जनकल्याण के लिए दिए जाते है उसमे से सचिन द्वारा क्षीण अंश ही की निकासी हुई | सचिन का कार्यकाल मात्र एक वर्ष रह गया है , शायद अब वो कुछ वक़्त निकाले .| पिछले लगातार तीन वर्षो से महाराष्ट्र में भीषण सूखा देखते हुए भी उन्हें उस राशि को निकाल जन कल्याण में लगाने की फुरसत नही मिली जो एक मनोनीत सदस्य को अपने क्षेत्र में जनता पे खर्च करने मिलती है |एक कृषि प्रधान देश जहाँ जय जवान जय किसान के नारों से आकाश गुंजायमान है ,आज उस देश के अन्नदाताओ की टूटती साँसों को हम सबको मिलकर सम्हालने की जरुरत है | निश्चित रूप से सचिन एक व्यस्त क्रिकेटर , bcci से प्रति मैच सबसे ज्यादा पैसे प्राप्त करने वाले सफल वेतनप्राप्त बल्लेबाज़ , सफल होटल व्यसायी और विभिन्न कम्पनियो के लोकप्रिय ब्रांड अम्बेसडर और सर्वाधिक आय प्राप्त करने वाले पेड कोच है रिटायरमेंट के बाद भी | लेकिन राज्यसभा सदस्य के लिए चुना जाना एक नागरिक सम्मान होता है । देश आपको देश से जुडी समस्याओं के प्रति जागरूक , दायित्व के लिए जिम्मेदार और काबिल नागरिक समझता है ,आप पे भरोसा करता है के आप अपनी ऊर्जा , हुनर ,लोकप्रियता और कीमती वक़्त का कुछ हिस्सा राज्यसभा सदस्य के रूप में देश को समर्पित करेंगे | मुझे लगता है के यदि वो अपने कार्यक्रमों में व्यस्त रहते है तो इस सदस्यता के लिए नम्रता से मना कर देते तो बेहतर होता | फ़िल्म अभिनेत्री रेखा , महान पार्श्व गायिका लता मंगेशकर जी जैसे नामी व्यस्त चेहरों को राजनैतिक पार्टी वोट बैंक बटोरने की गरज से राज्यसभा भेजती है , क्या ये नेता अपने बच्चे को किसी ऐसे शिक्षक के हाथ में सौपेंगे जो पढ़ाने के लिए क्लास में ही न आये ????? व्यक्तिगत लाभ से समझौता नही फिर देशहित से क्यू ???? | इन मशहूर हस्तियों के पास देश की समस्याओं से जुड़ने का वक़्त नही है तो निश्चित रूप से देशहित के मद्देनज़र राज्यसभा सदस्यता देना एक गलत फैसला है | राज्यसभा के चयन को पूरी गंभीरता से न लेने और जमीनी मुद्दों से सरोकार न रखने वालो को हम संजीदा कलाकार और वैश्विक क्रिकेटर के रूप में तो सम्मान देते है लेकिन जब देश का मामला हो तो अपने उत्तर दायित्व को हलके में लेने और सम्मानित राज्यसभा की गरिमा को ताक पे रख अपने व्यवसाय को प्राथमिकता देने पर हम प्रश्नचिन्ह भी लगायेंगे | हर सफल व्यक्ति को महानता का तमगा पहनाना गलत होगा.|..इस लेख को पढ़ने वाले दो चार बुद्धिजीवी जरूर निकलेंगे जिन्हें राज्यसभा में अनुपस्थिति का विरोध इन क्रिकेटर या अभिनेता का अपमान लगता है , ये उनकी श्रद्धा का विषय है । यदि कामयाब लोग अपनी अद्भुत योग्यता को किसी भी तरह से देश सेवा कर सार्वजनिक जीवन में एक मिसाल पेश करते तब वो "जिम्मेदार जनसेवक " कहलाने के सचमुच हक़दार है । राज्यसभा में चर्चित नामो के चस्पा कुर्सियों को लगातार खाली देखना असहनीय है | महत्वपूर्ण , ,संभावनाओं से भरी सार्थक देशहित में होने वाली नीतियों की बहस में पूरे साल वक़्त न दे अनुपस्थित रह देशसेवा के दुर्लभ अवसर का उपयोग नही कर इस तरह की बेरुखी से दुःख होता है । .......अच्छे कामो की खुश्बू धीरे धीरे ही सही फ़ैलती तो जरुर है |
... बेतरतीब दाढ़ी वाले ,एक बेहद साधारण से चेहरे वाले असाधारण इंसान ..".नाना पाटेकर " ....जिनका नाम लेते ही उनके चेहरे से पहले जो डायलाग याद आता है..."ये हिन्दू का खून ये मुसलमान का खून " just kidding.............. अभिनय के क्षेत्र में वो किसी महानायक से कम नही ...लेकिन अभी जिस नेक कार्य से वो चर्चा में आये है वो अद्भुत और अविश्वसनीय है ...|.. उन्होंने अपने अकेले के दम पर 5000 से अधिक ऐसे किसान परिवारों को अपने घर से 15000 रूपये आर्थिक सहायता की जिनके किसान मुखिया ने सूखे से व्याकुल हो आत्महत्या कर ली .|...आप में से शायद कुछ लोगो ने न्यूज़ में देखा हो..नाना जब मृतक किसान परिवारों को चेक वितरण कर रहे थे ,.कुछ युवा लडको का समूह मोबाइल पे उनकी चेक देती फोटोज लेने लगा..| नाना उन्हें खदेड़ते हुए बिलकुल नाना वाले अंदाज़ में बिफर पड़े .....यहाँ फंक्शन हो रहा है क्या......? ?........ये 5000 लोगो की मय्यत है और तुम जैसे लोग फोटोज ले रहे हो .| . मुझे उनकी तिरंगा वाली सरफिरा, अक्खड़ , सनकी अदा देख हंसी छुट गयी...लेकिन अगले पांच मिनट में स्टेज पर जो हुआ हर देखने वाले की आँखे नम हो गयी |..बेहद कम उम्र की 19 या 20 साल की नाज़ुक , गरीब किसान की ग्रामीण विधवा कापते हाथो से चेक लेते हुए खुद को सम्हाल न पायी..| चेक पकड़ते ही स्टेज पे रोते हुए कांपने लगी |...पितातुल्य हिम्मत बंधाते नाना खुद भी भावुक हो गए...| हज़ारो किसान परिवार जिन्होंने सूखे से अपने घर के मुखिया को खोया और भुखमरी के कगार पर खड़े है |...एक किसान की आपबीती से दिल दहल गया ..जो 30 km वापस अपने गाव पैदल जाने वाला था जिसके पास बस किराए के 30 रुपए न थे...|..नाना ने अपनी जमा पूंजी से 15000 -15000 rs का चेक प्रत्येक परिवार को स्टेज पर ना बुला उस सभा गृह में उन 5000 सीट्स पर जा दोनों हाथो से झुक कर नम आँखों से विधवाओ .,बच्चो ..पिता और उन माताओं को वितरित किये | अपने जीवन की सम्पूर्ण जमा पूंजी का दान कर नाना को समझ आया के समस्या उनके अनुमान और आर्थिक हैसियत से ज्यादा विकराल है |. एकला चलो रे से शुरू हुआ ये सफर धीरे धीरे ..." नाम "... संस्था के रूप में सामने आया है और दाहिने हाथ के रूप में मराठी फिल्मकार मकरंद अनासपुरे का साथ मिला । यहाँ एक नाम "अक्षय कुमार" का जोड़ना जरुरी है जो तुरंत एक करोड़ दान करने वाले पहले फिल्मी कलाकार है., दूसरा नाम आमिर खान का आता है जिन्होंने नाम को सपोर्ट करते हुए दो सूखाग्रस्त गाँव गोद लिए है | "नाम" नाना द्वारा शुरू की गयी सूखा पीड़ित किसानो के लिए आरम्भ की हुई गैर सरकारी संस्था है | .मैंने अभी अभी न्यूज़ में नाना को जमीन पर बैठ बेहद साधारण से अपने घर से अपील करते देखा...कोई किसान आत्महत्या ना करे मेरे घर की आखरी पाई भी दान कर दूंगा , मेरी आंखरी सांस तक मैं किसानो के साथ हूँ .। आप मेरे पास आ जाओ । मैं आपकी सहायता कर कोई अहसान नही कर रहा | ये मेरा देश है और आप किसानो का देश पे बहुत क़र्ज़ है |मैं तो कुछ अंश लौटाने की कोशिश कर रहा हूँ | देशवासियों को भी ग्लास में आधा पानी पीने के बाद आधा फेकते समय जरुर सोचना चाहिए की इस आधे ग्लास पानी के लिए आपके ही देश के एक हिस्से में लोग जान दे और जान ले रहे है | लोग एक मटकी पानी के लिए 10 किलोमीटर की दूरी तय कर घन्टो की लाइन लगा रहे है । स्थिति की भयानकता को समझिये और सम्हलिये | the hindu के दिए गए आकड़ो से स्पष्ट है के 2015 में सिर्फ महाराष्ट्र में 3228 किसानो ने आत्महत्या कर ली | ये संख्या 2016 के अप्रैल तक और बढ़ गयी । 2001 से यदि महाराष्ट्र का आकलन करे तो सूखे की वजह से विदर्भ में आत्महत्या करने वाले किसानो की संख्या 20 हज़ार को पार कर जाती है । ये सूखा ,अकाल अंतिम सेफ्टी सायरन है |......ग्लैमर की दुनिया को छोड़, सुदूर बंज़र खेतो में लाचारी का मातम मनाते परिवारों में, आशा का पानी ले पहुँचे इस हरफनमौला फ़कीर महानायक की सुविधाहीन भटकन को दिल से सलाम....आपसे भी गुजारिश है कम से कम उनके जज्बे की खबर दूर दूर तक फैलाइए .......MADHU ; writer at film association MUMBAI
खरी बात.. अन्याय के खिलाफ चुप हो जाने से बड़ा अपराध कोई नहीं ! खरी बात कहिये चुप मत रहिये....
शुक्रवार, 3 जून 2016
नाना पाटेकर की दो टूक
बुधवार, 4 मई 2016
शुक्रवार, 18 दिसंबर 2015
यही सच है ...
😢 मेरा दर्द 😢
यह इंडिया है मेरे यार...!
😢 हम बेटियों की पढ़ऐसे देश में रहते हैं जहां पुलिस वालों को देखकर हमाई से ज्यादा उनकी शादी पर खर्च करते हैं।
😢 हम एक ऐसे देश में रहते है जहां हम पुलिस को दरखकर सुरक्षित महसूस करने की बजाय घबरा जाते हैं।
😢 IAS एग्जाम में एक शख्स 'दहेज : एक सामाजिक बुराई' विषय पर 1500 शब्दों का बेहतरीन लेख लिखता है। सबको प्रभावित करता है और एग्ज़ाम पास कर लेता है। एक साल बाद यही शख्स दहेज में 1 करोड़ रुपये मांगता है क्योंकि वह एक IAS अफसर है।
😢 भारतीय बहुत शर्मीले होते हैं लेकिन फिर भी 121 करोड़ हैं।
😢 भारतीयों को स्क्रैचप्रूफ गर्रिला ग्लास वाले स्मार्टफोन पर स्क्रीन गार्ड लगवाना जरूरी लगता है लेकिन बाइक चलाते समय हेल्मेट लगाना नहीं।
😢 भारतीय समाज 'रेप मत करो' की बजाय 'रेप से बचो' सिखाता है।
😢 सबसे बेकार फिल्में सबसे ज्यादा कमाई करती हैं।
😢 यहां का समाज, एक पॉर्न स्टार को तो सिलेब्रिटी के रूप में खास दर्जा दे देता है लेकिन एक रेप पीड़िता को आम इंसान का दर्जा भी नहीं देता।
😢 नेता हमें तोड़ते हैं जबकि आतंकवादी हमें जोड़ते हैं।
😢 हर किसी को जल्दी है लेकिन समय से कोई नहीं पहुंचता।
😢 मैरी कॉम ने जितनी कमाई अपने पूरे करियर में नहीं की, उससे ज्यादा कमाई प्रियंका चोपड़ा ने मैरी कॉम का किरदार निभाकर कर ली।
😢 अजनबियों से बात करना खतरनाक है लेकिन किसी अजनबी से शादी करना हर लिहाज से सही है।
😢 ज्यादातर लोग जो गीता और कुरान पर लड़ते हैं, वे लोग होते हैं जिन्होंने इन्हें कभी पढ़ा भी नहीं है।
😢 जो जूते हम पहनते हैं, वे एयर कंडिशंड शोरूम्स में बिकते हैं और जो सब्जियां हम खाते हैं, वे फुटपाथ पर बिकती हैं।
अब सोचिए ! क्या इन तरीकों से भारत आगे बढ़ेगा?
अगर बात सच्ची लगे तो आगे भेजने से ज़्यादा सिस्टम सुधारो...
गुरुवार, 1 नवंबर 2012
टी आर पी चक्रम
शनिवार, 20 अक्टूबर 2012
माओ की असलियत ?
722 सैनिक मारे गए थे और 1697 घायल हुए थे। एशिया की इन दो ताकतों के बीच जंग के हालात क्यों बने, रणनीति तौर पर इसके क्या नतीजे हुए, ऐसे तमाम मसलों पर बहस जारी है। लेकिन चीन के ही एक रणनीतिकार ने इस जंग की वजह के बारे में बड़ा खुलासा किया है। चीन की पेंकिंग यूनिवर्सिटी में स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज के डीन वांग जिसि ने कहा है कि चीन के नेता माओ त्से तुंग ने 1962 में भारत के खिलाफ युद्ध का आदेश दिया था ताकि सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी पर उनकी पकड़ बनी रहे। वांग चीनी विदेश मंत्रालय की नीति सलाहकार समिति के भी सदस्य हैं। वांग ने कहा कि खेती आधारित से आधुनिक समाज बनाने का माओ का अभियान 'ग्रेट लीप फारवर्ड' संकट में तब्दील हो गया। हिंसा में लाखों लोगों की जान गई। वांग ने कहा कि इस स्थिति में कम्युनिस्ट पार्टी में माओ की स्थिति कमजोर हो गई। तब सेना पर अपनी पकड़ मजबूत दिखाने के लिए उन्होंने तिब्बत रेजीमेंट के सेना के कमांडर को बुलाया। उससे पूछा कि क्या भारत से युद्ध जीत सकते हो। उसने कहा निश्चित तौर पर। इस पर माओ ने हरी झंडी दे दी।
- जय प्रकाश मानस
मुझे कुछ प्रश्नों के जवाब चाहिए....
जब हमारे पास "हिंदी" "संस्कृत" जैसी पवित्र और समृद्ध भाषा थी तो यह अंग्रेजी भाषा क्यों थोपी गई? जब हमारे पास "गुरुकुल प्रणाली" थी तो यह कॉन्वेंट के नाम पर हमें क्यों लुटा गया? हमारे पास आयुर्वेद था तो क्यों नहीं उस पर अनुसंधान किये? हमारे पास पुरात्न अपनी शिक्षा प्रणाली जो ऋषियों मुनियो ने चलाई थी तो क्यों अंग्रेज मैकले की काली शिक्षा व्यवस्था हमारे ऊपर थोपी गई ??
जब हमारे इतिहास में "स्वामी विवेकानंद" जैसे महान विचारशील व्यक्ति थे तो क्यों अंग्रेजों के चरित्र हीन चाटुकार गाँधी परिवार को सब कुछ मान लिया गया??
जब हमारे पास भगत सिंह और उधम सिंह का परिवार था, लौहपुरुष पटेल और श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे महान देशभक्त थे तो क्यों ''नेहरुद्दीन'' को सत्ता दिया गया?
जब हमारे पास वन्देमातरम जैसा ओजस्वी गान था तो क्यों इसे ज्यादा सम्मान नहीं दिया गया?
जब हमारे देश में भगत सिंह, राजगुरू, आजाद, उधम सिंह, लाला लाजपत राए, बाल गंगाधर तिलक, वीर सावरकर और बहुत से देशभक्त थे तो फ़िर क्यों अंग्रेजो गद्दारों के नाम पर देश के समारकों, चौराहों, शहरों आदि के नाम रखे गए ????
जब हमारे देश का इतना सुन्दर नाम भारत__हिन्दुस्तान था क्यो गुलामी का नाम इण्डिया रखा हुआ है ??
-अमित त्रिपाठी
सोमवार, 15 अक्टूबर 2012
राजनीतिक पार्टियों की आमदनी !
मित्रों,बैठे-बिठाये इतनी आमदनी तो शायद भारत के सबसे बड़े धनकुबेरों को भी नहीं होती होगी जितनी आज हमारे राजनीतिक दलों को हो रही है। आमदनी भरपूर और जिम्मेदारी कुछ भी नहीं। यहाँ तक कि 20000 रूपये से कम प्राप्त चंदे का विवरण देना भी आवश्यक नहीं और इस पर भी वे पूरा और सही विवरण नहीं देती हैं। कोई 10 प्रतिशत आमदनी का विवरण दे रहा है तो कोई 40 प्रतिशत का और कानून और न्यायालय फिर भी कुछ कर नहीं पा रहे हैं,क्यों? जब केजरीवाल अपने दल का आय-व्यय बताने को तैयार हैं तो अन्य पार्टियों को क्या परेशानी है और क्यों है? यह 20000 रूपये वाली सीमा भी सिर्फ जनता को धोखा देने के लिए है। अगर कोई 20000 रूपये की 20000 किस्तों में पैसा दे तो या फिर इस तरह ही चंदे की रकम दर्ज की जाए तो? इसलिए इन दलों के लिए एक-एक पैसे का हिसाब देना अनिवार्य किया जाए। पार्टियाँ बातें तो आम आदमी की करती हैं और काम पूंजीपतियों का करती हैं। उनको बताना ही चाहिए उनके खजाने में पैसा कहाँ से आता है। वे कौन-से लोग हैं जो उनकी पार्टी के फंड में करोड़ों-करोड़ रुपए देते हैं और क्यों देते हैं? इसके बदले में धनपतियों को क्या मिला,पार्टी ने क्या दिया तभी तो सामने आ पाएगा? दोनों मुद्दे एक-दूसरे से अंतर्गुंथित हैं। करोड़ों रुपए पार्टी फंड में देनेवाले पूंजीपति ऐसा कोई परोपकार की भावना से नहीं करते हैं बल्कि उनकी कुछ-न-कुछ बदले में पाने की उम्मीद लगी रहती है फिर चाहे लाभार्थी दल सत्ता में हो या विपक्ष में। सत्ता में हुआ तो वह धनपति को सीधे लाभ पहुँचाने की स्थिति में होता है जैसे बाड्रा और हरियाणा सरकार या फिर कोयला आबंटन में टाटा,अंबानी और जिंदल को प्राप्त लाभ का उदाहरण भी हम ले सकते हैं और अगर विपक्ष में हुआ तो फिर मंत्री को सिफारिशी पत्र तो लिख ही सकता है जैसा पिछले दिनों गडकरी ने संचेती के लिए लिखा। इतना ही नहीं कई बार तो धनपति राजनीतिक दलों को पैसा देकर सीधे लोकसभा या राज्यसभा का सदस्य ही बन जाते हैं जैसे अनिल अंबानी या विजय माल्या। वैसे हमारे कई परंपरागत नेता भी अब उद्योगों और व्यापार में हाथ आजमाने में पीछे नहीं हैं। चाहे वे दिवंगत विलासराव देशमुख हों या शरद पवार हों या फिर कमलनाथ जी हों। जाहिर है ये लोग भी सरकार में रहते हुए सरकार की नीतियों को अपने व्यापार के हितार्थ प्रभावित करते ही होंगे और बदले में पार्टी फंड में अपना अमूल्य योगदान भी करते होंगे।
मित्रों,राजनीतिक दलों के लिए आय के स्रोत के साथ-साथ उन्होंने चंदे से प्राप्त धन का व्यय कहाँ-कहाँ किया यह बताना भी कानूनन जरूरी बनाया जाए। हवाई-यात्रा पर खर्च कर दिया या 8000 रूपये प्रति प्लेट वाला खाना खाया गया या पार्टियों और चुनावों के समय दारू की नदी बहा दी गई या इनका दुरूपयोग वोट खरीदने में किया गया? 'माल महाराज के मिर्जा खेले होली' बहुत दिन चल गया अब नहीं चलने वाला है,किसी भी कीमत पर नहीं। वोट हमारा काम तु्म्हारा आखिर कहाँ का न्याय है?
मित्रों,क्या विडंबना है कि लगभग पूरा देश,पूरा शासन-प्रशासन आरटीआई के दायरे में है और शासन-प्रशासन को चलानेवाले दल ही इसके दायरे में नहीं हैँ। जबकि उनके बारे में जानने का जनता का अधिकार तो और भी ज्यादा है? जनता के लिए य़ह जानना तो और भी ज्यादा जरूरी है कि वे जिन राजनीतिक दलों को वोट दे रहे हैं वे कर क्या रहे हैं? कहीं वे लेन-देन की दुकान तो नहीं बन गए हैं?
मित्रों, जैसा कि हम इस आलेख की शुरुआत में भी अर्ज कर चुके हैं कि आज लोकतंत्र की सबसे महत्त्वपू्र्ण ईकाई राजनीतिक पार्टियों में ही लोकतंत्र नहीं है। भाजपा और साम्यवादी दलों को छोड़कर सारे दल पारिवारिक कंपनियों की तरह हैं। पार्टियों का दुकानों में बदल जाना और वो भी खानदानी दुकानों में किसी भी तरह से भारतीय लोकतंत्र की प्रगति की दिशा में स्वस्थ गतिविधि नहीं है। जब जी चाहा पार्टी का संविधान बदल दिया। यह अधिकार उनको दिया ही क्यों गया है और कैसे दिया जा सकता है? इन दलों के हित सिर्फ इनके व्यक्तिगत हित नहीं हैं बल्कि इनसे हमारे देश और प्रदेशों के हित भी प्रभावित होते हैं,जुड़े हुए हैं। हमारे देश में एक ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि जिससे सारे दलों के लिए एक समान नियम हों। जैसे कि पार्टी के पंजीकृत-कार्यकर्ता सीधे पार्टी-पदाधिकारियों का चुनाव करें। जैसे कि कोई व्यक्ति या उसका रक्त-संबंधी लगातार एक या दो बार से ज्यादा एक ही पद को धारण नहीं कर पाए। ऐसी व्यवस्था हमारे यहाँ प्राचीन काल में भी थी। संगम काल में या चोल-शासन में तमिलनाडु में स्थानीय-निकायों में एक ही व्यक्ति या उसका रक्त-संबंधी लगातार दो सालों तक एक ही पद के लिए चुना नहीं जा सकता था। ऐसा नहीं होता था कि खुद पद से हटना पड़े तो भाई,लड़के या पत्नी को बिठा दिया। जब ऐसा प्राचीन काल में हो सकता था तो अब ऐसा क्यों संभव नहीं है?
मित्रों,सिर्फ व्यवस्था बना देने से भी कुछ नहीं होगा यह भी देखना पड़ेगा कि नियमों-उपनियमों का अनुपालन हो भी रहा है कि नहीं। तो इसके लिए या तो चुनाव आयोग को ही अधिकृत कर दिया जाए या ज्यादा अच्छा हो कि किसी पूरी तरह से स्वायत्त-निकाय की स्थापना की जाए जिसके अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति की प्रक्रिया पूरी तरह से पारदर्शी हो और जिसकी चयन समिति में न तो सरकार का बहुमत हो और न तो अन्य राजनीतिक दलों का ही। इसके साथ ही नियमों-कानूनों का उल्लंघन करने पर पार्टियों के लिए सख्त सजा का भी प्रावधान होना चाहिए। उनकी मान्यता रद्द कर देनी चाहिए और उनके प्रमुख नेताओं के चुनाव लड़ने पर आजीवन प्रतिबंध लगा दिया जाना चाहिए।
मित्रों,आर्थिक सुधारों से कम महत्वपूर्ण नहीं हैं ये प्रस्तावित और विलंबित सुधार क्योंकि इन सुधारों पर ही हमारे लोकतंत्र का भविष्य टिका हुआ है न कि आर्थिक सुधारों पर। दलों के संचालन और नियंत्रण के मामले में पारदर्शिता लाना जरूरी ही नहीं महाजरूरी है क्योंकि ऐसा नहीं होने से ही देश-प्रदेश में भ्रष्टाचार और धनिकतंत्र को बढ़ावा मिलता है। इसके चलते ही राजनीति आज एक गंदी गाली बनकर रह गई है। इस तरह के ऐहतियाती उपायों के बावजूद अगर धनपति चाहें तो पार्टी फंड में पैसा नहीं देकर उसी तरह से पार्टी नेतृत्व को लाभ पहुँचा सकते हैं जैसा कि वाड्रा के मामले में डीएलएफ ने किया फिर भी इससे काफी हद तक राजनीति के क्षेत्र से गंदगी को साफ करने में मदद मिल सकेगी, इसमें सन्देह नहीं। इन उपायों को लागू करने के लिए अगर संविधान में हजारों संशोधन भी करना पड़े,यहाँ तक कि संविधान को ही फिर से लिखना पड़े तो वह भी किया जाए क्योंकि ऐसा किए बिना राह से भटके हुए भारतीय लोकतंत्र को फिर से पटरी पर लाया ही नहीं जा सकता।
- ब्रज किशोर सिंह
