शुक्रवार, 18 दिसंबर 2015

यही सच है ...

😢 मेरा दर्द 😢

यह इंडिया है मेरे यार...!

😢 हम बेटियों की पढ़ऐसे देश में रहते हैं जहां पुलिस वालों को देखकर हमाई से ज्यादा उनकी शादी पर खर्च करते हैं।

😢 हम एक ऐसे देश में रहते है जहां हम पुलिस को दरखकर सुरक्षित महसूस करने की बजाय घबरा जाते हैं।

😢 IAS एग्जाम में एक शख्स 'दहेज : एक सामाजिक बुराई' विषय पर 1500 शब्दों का बेहतरीन लेख लिखता है। सबको प्रभावित करता है और एग्ज़ाम पास कर लेता है। एक साल बाद यही शख्स दहेज में 1 करोड़ रुपये मांगता है क्योंकि वह एक IAS अफसर है।

😢 भारतीय बहुत शर्मीले होते हैं लेकिन फिर भी 121 करोड़ हैं।

😢 भारतीयों को स्क्रैचप्रूफ गर्रिला ग्लास वाले स्मार्टफोन पर स्क्रीन गार्ड लगवाना जरूरी लगता है लेकिन बाइक चलाते समय हेल्मेट लगाना नहीं।

😢 भारतीय समाज 'रेप मत करो' की बजाय 'रेप से बचो' सिखाता है।

😢 सबसे बेकार फिल्में सबसे ज्यादा कमाई करती हैं।

😢 यहां का समाज, एक पॉर्न स्टार को तो सिलेब्रिटी के रूप में खास दर्जा दे देता है लेकिन एक रेप पीड़िता को आम इंसान का दर्जा भी नहीं देता।

😢 नेता हमें तोड़ते हैं जबकि आतंकवादी हमें जोड़ते हैं।

😢 हर किसी को जल्दी है लेकिन समय से कोई नहीं पहुंचता।

😢 मैरी कॉम ने जितनी कमाई अपने पूरे करियर में नहीं की, उससे ज्यादा कमाई प्रियंका चोपड़ा ने मैरी कॉम का किरदार निभाकर कर ली।

😢 अजनबियों से बात करना खतरनाक है लेकिन किसी अजनबी से शादी करना हर लिहाज से सही है।

😢 ज्यादातर लोग जो गीता और कुरान पर लड़ते हैं, वे लोग होते हैं जिन्होंने इन्हें कभी पढ़ा भी नहीं है।

😢 जो जूते हम पहनते हैं, वे एयर कंडिशंड शोरूम्स में बिकते हैं और जो सब्जियां हम खाते हैं, वे फुटपाथ पर बिकती हैं।

अब सोचिए ! क्या इन तरीकों से भारत आगे बढ़ेगा?

अगर बात सच्ची लगे तो आगे भेजने से ज़्यादा सिस्टम सुधारो...

गुरुवार, 1 नवंबर 2012

टी आर पी चक्रम



टी आर पी चक्रम
सब गोलमाल है भई गोलमाल है
-अजामिल
      भारत में टेलीविज़न प्रसारण का सफर 15 अगस्त 1959 को दूरदर्शन टी.वी. चैनल के साथ हुआ था यह एक सरकारी टी.वी. चैनल था और सरकार की गाईड लाईन्स पर सरकार के लिए ही काम कर रहा था इसकी बंधी-बंधाई सीमा थी सरकारी नीतियों और योजनाओं का प्रचार-प्रसार करना इसका मुख्य काम था उस समय दूरदर्शन चैनल की विकास की गति को देख कर कोई सोच भी नहीं सकता था कि पांच दशक पूरा करते-करते तक टेलिविज़न प्रसारण देश के सबसे बड़े उद्योगों की पहली पंक्ति में पहुँच जायेगा. आज टेलिविज़न इंडस्ट्री का जो विस्तार हमें दिखाई दे रहा है वह केबल क्रांति का नतीजा तो है ही लाखों केबल ऑपरेटर्स के समर्पण, त्याग और परिश्रम का भी फल है. उन लाखों केबल ऑपरेटर्स का जिन्होंने विषम से विषम परिस्थितियों में इस उद्योग को संभाले रखा ये अलग बात है कि आज मलाई और मख्खन खाने के लिए बड़े उद्योग पतियों और विदेशी कम्पनियों की जमात इस धंधे में कूद पड़ी है और केबल ऑपरेटर्स के हक और हुकूक संकट में आ गये हैं. दरअसल टेलिविज़न उद्योग ने सामाजिक सरोकारों को हाशिए पर डाल दिया है और अब इस इंडस्ट्री में सारा खेल अधिक से अधिक मुनाफा कमाने को लेकर चल रहा है. ज़ाहिर है कि प्रतिस्पर्धा प्रतियोगता में बदल चुकी है आज अच्छे बुरे 200 के लगभग विभिन्न भाषाओँ के राष्ट्रीय और क्षेत्रीय टी.वी. चैनल मैदान में हैं. इनके बीच दांत काट प्रतिस्पर्धा है. सभी की कोशिश ये है कि जैसे भी हो बाज़ार में आगे बने रहो. मूल्यों और संस्काओं की चिन्ता अब इन चैनलों को नहीं है. ये अपना काम बनता, भाड़ में जाए जनता के सिद्धांत पर चल रहे हैं. तभी तो इतना लंबा सफर तय कर लेने के बाद भी भारतीय टेलिविज़न की कोई पहचान नही बन पायी है. इन टेलिविज़न चैनलों से अगर फिल्म इंडस्ट्री का कचरा साफ़ कर दिया जाए तो इन चैनलों के पास दिखने को कुछ नहीं बचेगा.
            लंबे समय तक दूरदर्शन के पास कोई ऐसा रास्ता नहीं था जिससे दूरदर्शन चैनल दर्शकों के बीच अपनी लोकप्रियता का आकलन कर पाता और ना ही विज्ञापन दाताओं के पास ऐसा कोई साधन था कि वे ये पता लगा पाते कि कौन सा चैनल दर्शकों के बीच ज्यादा लोकप्रिय हो रहा है. इस अभाव के बावजूद 70-80 के दशक में दूरदर्शन के पास काफी विज्ञापन थे. भारत में टी.वी. कार्यक्रमों की लोकप्रियता को मापने का काम 1983 में शुरू हुआ. हिन्दुस्तान थॉमसन एसोशिएट और सर्वे एजेंसी इंडियन मार्केट रिसर्च ब्यूरो ये दो ऐसी एजेंसीज़ थी जिन्होंने पहली बार दूरदर्शन कार्यक्रमों की लोकप्रियता का दर्शकों के बीच जाकर सर्वेक्षण किया और यह बताया कि कौन सा कार्यक्रम कितना लोकप्रिय है और लोग उसे किस समय में देखते हैं. बाद में इस एजेंसी के साथ आई.एम्.आरपी. और एम्.आर.एस.ब्रुक एजेंसियां भी जुड गयी. इन एजेंसियों के एक साथ काम करने पर सर्वेक्षण का यह काम ज्यादा गंभीरता से होने लगा. विज्ञापन दाताओं को यह सूचना आसानी से मिलने लगी कि उनके उत्पाद का विज्ञापन टेलिविज़न सेट पर कब देखा जा रहा है उस दौर में इस सर्वेक्षण के दौरान दर्शकों को एक डायरी में टी.वी. कार्यक्रमों के बारे में अपनी राय दर्ज करने के लिए कहा गया था गौरतलब है कि उस ज़माने में दर्शकों की तुलना में टेलिविज़न सेट्स कम हुआ करते थे मोहल्ले में पैसे वाले घरों में टेलिविज़न सेट होता था अडोस-पड़ोस के लोग सुबह-शाम टी.वी. देखने के लिए पहुँच जाया करते थे. लिहाज़ा सर्वेक्षण कंपनियों ने जो डायरी बाटी दर्शकों ने उसमे काफी रूचि दिखाई एजेंसियों ने इस डायरी में दर्शकों के कमेंट्स को टी.वी. कार्यक्रमों की लोकप्रियता का आधार बनाया और इस तरह टी.आर.पी. की सहेजने की प्रक्रिया शुरू हुई. आगे चल कर केबल टी.वी. के आने के बाद सीएनएन, स्टार और एम् टी.वी. जैसे बड़े चैनल जब मैदान में आये और इनका प्रसारण शुरू हुआ तब टी.आर.पी. तय करते समय इनके कार्यक्रमों को भी शामिल कर लिया गया ये अलग बात है कि ये टी.वी. चैनल लंबे समय तक दूरदर्शन के विकल्प के रूप में देखे जाते रहे.
            शुरूआती दौर में दूरदर्शन ने टी.आर.पी. के चक्कर और ज़रूरत से निपटने के लिए दूरदर्शन ऑडियंस रिसर्च टेलिविज़न रेटिंग विंग तैयार किया था यह विंग दूरदर्शन की दर्शक अनुसन्धान इकाई द्वारा 40 केन्द्रों और 100 आकाशवाणी केन्द्रों द्वारा दर्शक और श्रोता की कार्यक्रम लोकप्रियता के आंकड़े एकत्र करता था धीरे-धीरे सर्वेक्षण का यह काम विस्तृत होता गया तब इसमें कठिनाइयाँ पैदा होने लगीं दर्शकों की संख्या में इजाफा हुआ तब दर्शकों तक पहुंचना मुश्किल हो गया डायरी सर्वेक्षण न काफी और अमहत्वपूर्ण दिखाई देने लगा लेकिन टी.आर.पी. का जानना बेहद ज़रूरी था. विज्ञापन दाताओं सर्वेक्षण एजेंसियों और चैनल के प्रतिनिधियों ने मिलजुल कर इस समस्या से निपटने के लिए एक संयुक्त समिति बनाई तय यह किया गया कि टी.आर.पी. को जानने की व्यवस्था पारदर्शी और वैज्ञानिक होने चाहिए ताकि अविश्वसनीयता की कहीं कोई गुन्जायिश न रहे. आई.एम्.आर.बी. और ए.सी.नीलसन ने मिलकर उस समय यह प्रस्ताव रखा कि टी.आर.पी. का काम टैम से करवाया जाना चाहिए यह प्रस्ताव स्वीकार भी कर लिया गया लेकिन बजट से बाहर की यह योजना थी लिहाज़ा टैम के साथ सौदा नहीं पट पाया इस बीच ओ.आर.जी. मार्ग ने इन टैम के माध्यम से टेलिविज़न रेटिंग के सर्वेक्षण का काम शुरू किया. 1998 में टैम के ज़रिये से यह काम विधिवत शुरू हो गया दरअसल टैम को इस काम में उतारने का श्रेय इंडियन सोसायटी ऑफ एडवरटाईजर्स, इंडियन ब्रोडकास्ट फौंडेशन और एडवरटाईजिंग एजेंसीज़ असोशिएसन ऑफ इंडिया को दिया जाना चाहिए.
            2002 में एसी नीलसन का अधिग्रहण ओ.आर.जी. मार्ग की प्रमुख कम्पनी वी.एन.यू. ने कर लिया इसी के साथ इनटैम टैम में मर्ज हो गयी और नई कम्पनी का नाम टैम मिडिया रिसर्च टी.वी. रेटिंग सर्वेक्षण करने वाली भारत की अकेली संस्था बन गयी. 2004 में एक और कम्पनी एमैप भी बाज़ार में आई लेकिन टैम नीलसन कम्पनी और कंटर मिडिया रिसर्च के काम को आज ज्यादा महत्व दिया जा रहा है.
            टेलिविज़न रेटिंग पॉइंट की आकलन व्यवस्था को दुरस्त किये जाने के प्रयास अभी भी चल रहे हैं टी.वी. चैनल प्रसारकों और विज्ञापन क्षेत्र की बड़ी कम्पनियों ने मिलकर इस काम के लिए ब्रोडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउन्सिल यानी बार्क का गठन किया है यह कम्पनी अधिनियम 1956 की धारा 25 के तहत काम कर रही है यह एक गैर लाभकारी संस्था है और ब्रिटेन की ब्रोडकास्टर्स ऑडियंस रिसर्च बोर्ड यानी बार्ब के मॉडल को अपनाये हुए है विशेषज्ञों का मानना है कि यह मॉडल भारतीय टेलिविज़न इंडस्ट्री का आकलन ठीक प्रकार नहीं कर पाता शायद यही वजह है कि बार्ब अभी तक कुछ भी उल्लेखनीय परिणाम नहीं दे पाया जबकि कुछ विशेषज्ञ भारतीय टेलिविज़न इंडस्ट्री के हालातों का आकलन करते हुए बार्ब की कार्य पद्धिति को सबसे ज्यादा उपयोगी मान रहे हैं उनका मानना है कि इसके पैनल का डिजाईन सामान अनुपात में है और भौगोलिक और जनसँख्या से जुड़े अनुपात हीनता को दूर करने में सक्षम है. बार्ब के पैनल में समाज के सभी आयु वर्ग और सामाजिक  वर्ग का प्रतिनिधित्व सुनिशिचित किया गया है बाब अपने सर्वेक्षण के दौरान लगभग 52,000 लोगो से मिलता है और इंटरव्यू के ज़रिये निष्कर्षों पर पहुचता है बार्ब एक ऐसी सर्वेक्षण कम्पनी है जो अकेले काम नहीं करती यह अपना हर काम किसी दूसरी कम्पनी या एजेंसी के साथ मिलकर करती है इसका परिणाम यह होता है कि इस कम्पनी द्वारा संकलित आंकड़ो के साथ छेड़-छाड संभव नहीं हो पाती. बार्ब के आंकड़े हर रोज भी मिल सकते हैं और साप्ताहिक स्तर पर भी. इसके बावजूद टी.आर.पी. ज़ारी करने वाली एजेंसी टैम मिडिया रिसर्च के सर्वेक्षण में आई.आर.एस.और एन.आर.एस. की तरह न तो पारदर्शिता है और न आंकड़ो की जाँच की कोई व्यवस्था. इसीलिए टैम का टी.आर.पी. सर्वेक्षण संदेह के दायरे में रहता है जब तक इसे जांचने का कोई रास्ता नहीं निकलता तब तक टी.आर.पी. का खेल ऐसे ही चलेगा.
            टी.आर.पी. के खेल को एक लंबे समय तक महत्वपूर्ण मानकर अपने टी.वी. चैनलों की रीति-नीति तय करने वाले चैनल इन दिनों टी.आर.पी. नाम की खराब व्यवस्था से खुद बहुत परेशान है और उनकी समझ में नहीं आ रहा है कि वे कार्यक्रमों की गुणवत्ता देखे या टी.आर.पी. की प्रतिस्पर्धा में खुद को बरबाद करते रहें उनका मानना है कि टी.आर.पी. की पूरी व्यवस्था ही बीमार और संदेहास्पद है इसमें न तो अभी तक सामाज के हर तबके की भागीदारी सुनिशिचित हो पायी है और न हर क्षेत्र की. टी.आर.पी. को लेकर टी.वी. चैनलों में 24 घंटे तनाव बना रहता है चैनल प्रमुखों के दिलों की धडकन इन दिनों टी.आर.पी. के उतार चढ़ाव पर ही निर्भर कर रही हैं न्यूज़ ब्रेक करने की जल्दबाजी में बड़ी से बड़ी खबर टी.वी. से गायब हो जाती हैं. टी.आर.पी. ने हालात ऐसे कर दिए हैं कि कई चैनलों में तो चैनल प्रमुख की नौकरी मुश्किल में पड़ गयी है इन चुनौतियों के चलते कुछ भी नया करने की न सम्भावना बची है और न उत्साह ही. दूसरी ओर टी.आर.पी. की व्यवस्था पर भी सवाल या निशान लाग रहे हैं.
            सर्विक्षण एजेंसी एमैप के बंद होने की खबर आ रही है लेकिन कम्पनी के प्रबंध निर्देशक का कहना है कि कम्पनी अपना कारोबार समेट नहीं रही है बल्कि इसमें तकनीकी बदलाव किये जा रहे हैं यह कम्पनी अपने शुरूआती दौर में 7200 मीटरों के ज़रिये रेटिंग तैयार कर रही थी उधर 1998 में शुरू हुई टैम के पास कुल मीटरों की संख्या 8150 थी इनमे से 1007 मीटर डी.टी.एच. कैस और आई.पी.टी. वाले घरों में है जबकि 5532 मीटर एनालॉग केबल और 1611 मीटर गैर केबल यानी दूरदर्शन वाले घरों में है. कुल मिलाकर यह भारी भरकम निवेश पर आधारित व्यवस्था है एक मीटर की लागत 75000 से लेकर 100000 रुपये के बीच बैठती है टी.आर.पी. की प्रतिस्पर्धा में बने रहना टी.वी. चैनलों की विवशता भी है उन्हें विज्ञापन दाताओं को अपने चैनलों और कार्यक्रमों के बारे में बताने का टी.आर.पी. के अलावा और कोई जरिया भी नहीं है हालाकि ज़्यादा तर विज्ञापन दाता कम्पनियाँ और ब्रोडकास्ट एडिटर असोशिएसन से जुड़े लोग यह मानते हैं कि टी.आर.पी. के आकलन में तकनीकी बदलाव की बहुत आवश्यकता है. किसी उत्पाद की खपत का बाज़ार में पैटर्न क्या है इसे सिर्फ टी.आर.पी. के ज़रिये कैसे निर्धारित किया जा सकता है विज्ञापन दाताओं को अपने उत्पाद की खपत का आधार और रणनीति खुद बनानी होगी. टी.आर.पी. तो एक इशारा है, फैसला नहीं. दरअसल किसी भी टी.आर.पी. सर्वेक्षण एजेंसी की भूमिका आंकड़े एकत्र करके टेलिविज़न, विज्ञापन उद्योग से जुड़े लोगों और शोध करने वालों को सौंप देने तक ही सीमित है एजेंसियां कभी नहीं कहती कि कोई चैनल टी.आर.पी. के आधार पर कार्यक्रमों में किसी तरह का परिवर्तन करे. कार्यक्रम बनाने और उसे परोसने कि रणनीती चैनल जब चाहे तब बना सकते हैं. आज बहुत से टी.वी. चैनलों के कार्यक्रम प्रमुखों ने खुल कर यह कहना शुरू कर दिया है कि वे दर्शकों के लिए काम नहीं कर रहे हैं उन्हें तो हर हाल में विज्ञापन दाताओं को खुश करना है. आखिर रोटी तो विज्ञापन के बढ़ने पर ही मिलेगी.
            सवाल उठता है कि क्या यह कह देने भर से टी.आर.पी. को लेकर चल रही बहस खत्म हो जाती आंकड़े बताते हैं कि करीब 10,000 करोड़ रुपय की भारी रकम किन चैनलों पर खर्च की जाये यह टी.आर.पी. ही तय करती है. ऐसे में तकनीकी स्तर पर टी.आर.पी. से मिलने वाले निष्कर्ष महत्वपूर्ण होते हैं देश में 607 के लगभग अच्छे बुरे टी.वी. चैनल देखे जा रहे हैं और 250 के लगभग नए चैनल खोलने के आवेदन सूचना प्रसारण मंत्रालय के पास हैं ज़ाहिर है कि आने वाले समय में टी.आर.पी. में घमासान युद्ध की संभावनाएं और बढेंगी. भूत-प्रेत, चुड़ैल और सनसनी बेचने वाले चैनलों को अपनी टी.आर.पी. बढ़ाने के लिए नए-नए तरीके खोजने पड़ेंगे. जिस चैनल की टी.आर.पी जितनी ज़्यादा होगी उसकी कमाई भी उतनी ज़्यादा होगी आईबीएन 7 के सम्पादक आशुतोष टी.आर.पी. व्यवस्था को बंद करने की मांग कर रहे हैं वो इसे दोषपूर्ण और अवैज्ञानिक मानते हैं उनका मानना है कि किसी भी तबके की क्रय क्षमता से कार्यक्रम या चैनल की लोकप्रियता तय किया जाना गलत है टी.आर.पी. के लिए चैनलों के लगातार आग्रह ने हिन्दी चैनलों के सोच को ही बदल दिया है. तमाम देशी-विदेशी टी.वी. चैनलों के मालिकान व्यापारी हो गए हैं और इनकी नज़र सिर्फ अपने फायेदे पर टिकी हुई है क्रिकेट, क्राईम और सिनेमा न हो तो किसी भी चैनल की टी.आर.पी. को धराशाई होते वक्त नहीं लगेगा.
            ये सच है कि हजारों-हज़ार करोड़ के इस व्यापार से अब लाभ कमाने की होड़ को डीलीट कर पाना आसान नहीं है लेकिन उन 13.8 करोड़ घरों में कैसे परिवर्तन होंगे जहाँ टेलिविज़न पहुँच गया है यह भी तो देखना होगा सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय भी यह मानता है कि एजेंसियों द्वारा किये गए सर्वेक्षण के आधार पर तैयार की गयी टी.आर.पी. रिपोर्ट में कई तरह की खामियां हैं आखिर ये भरोसा कैसे किया जाए कि एजेंसियां टी.आर.पी. आंकड़ों के साथ छेड़-छाड नहीं करती होंगी इन आंकड़ों को कोई बाहरी एजेंसी द्वारा ऑडिट भी तो नहीं कराया जाता सब मानते हैं कि टी.आर.पी. सर्वेक्षण में कमियां हैं और विज्ञापन दाता काफी समय से इन कमियों को नज़रअंदाज करते हुए 10,000 करोड़ का दांव बाज़ार में हर साल लगा रहे हैं कोई पूछने वाला नहीं है कि 150 करोड़ की आबादी वाले इस देश में टी.वी. दर्शकों की पसंद न पसंद कुछ सर्वेक्षण एजेंसियां 165 शहरों में लगे 8150 मीटरों के ज़रिये कैसे तय कर दे रहीं है. सेम्पल सिर्फ सेम्पल होते हैं प्रयोग के बाद सेम्पल की आखरी हैसियत तय हो पाती है. चैनल भी मानते हैं कि यह व्यवस्था न काफी है आंकड़ों पर नज़र डालिए तो लगभग 60 करोड़ लोग टेलिविज़न देखते हैं. 10.3 करोड़ घरों में केबल और डी.टी.एच के ज़रिये टी.वी. देखा जा रहा है शहरों में टी.आर.पी. तय करने के लिए मीटर लगाये गए हैं. गाँवों और कस्बों में यह व्यवस्था नहीं है. पूर्वोत्तर और जम्मू-कश्मीर तक तो ये मीटर पहुंचे ही नहीं हैं बिहार में 165 मीटर लगे हैं सबसे ज़्यादा मीटर दिल्ली और मुंबई में हैं तमाम टी.वी. चैनलों का दबाव पड़ने पर एक सर्विक्षण एजेंसी ने 165 मीटर और जोड़ दिए हैं लगातार मीटरों की संख्या बढ़ा कर 30,000 किये जाने की सिफारिश की जा रही है यह मांग भी है कि इनमे से 15,000 मीटर ग्रामीण क्षेत्रों में लगाये जाएँ इस पर तकरीबन 660 करोड़ रुपय का खर्च आएगा.
            टी.आर.पी. को लेकर चैनलों द्वारा कमोबेश उठाये जा रहे अनैतिक क़दमों से भी टी.आर.पी. की शुचिता प्रभावित हो रही है तमाम चैनलों के एजेंट उन घरों के दर्शकों को उपहार आदि देकर चैनलों को अधिक से अधिक देखने का आग्रह कर रहे हैं और मीटर रीडिंग पर सीधा असर पड़ रहा है मुश्किल ये है कि मीटर में चैनल का नाम कहीं नहीं आता बस किसी विशेष चैनल के फ्रीक्वेंसी ही दर्ज होती है अब किसी विशेष चैनल की टी.आर.पी. गिरानी होगी तो केबल ऑपरेटर उस चैनल की फ्रीक्वेंसी को बार-बार बदल कर खेल करता रहेगा और इस तरह किसी विशेष चैनल की टी.आर.पी. गिर जायेगी सर्वेक्षण एजेंसियां ये मानती हैं कि केबल ऑपरेटर के इस खेल पर कोई अन्खुश नहीं लगाया जा सकता सिवा इसके हम उन पर भरोसा करें. टी.आर.पी. के लिए काम करने वाली एजेंसियों का न तो पंजीकरण किया गया है और न इनके लिए कोई आचार सहिंता ही है. इनकी कहीं कोई शिकायत नहीं की जा सकती और इनके द्वारा किये गए नुकसान की भरपाई के लिए किसी तरह का क्लेम पाने का मुकदमा ही दर्ज हो सकता है.
            टी.आर.पी. को लेकर केबल टी.वी. चैनलों में जो आपाधापी मची हुई है उसमे परिवर्तन बेहद आवश्यक हैं. नियम अधिनियम बनाकर सबसे पहले सर्वेक्षण एजेंसियों की सीमा निर्धारित होनी चाहिए चैनलों को उनके कार्यक्रमों और उनके चैनलों की लोकप्रियता के बारे में साप्ताहिक रिपोर्ट न देकर उन्हें 6 महीने में एक बार टी.आर.पी. से जोड़ा जाए. ऐसा करने पर चैनलों के बीच की प्रतिस्पर्धा कम होगी और कार्यक्रमों की गुणवत्ता बढ़ेगी. विज्ञापन दाताओं को भी विज्ञापन पर निवेश करने में आसानी होगी टी.आर.पी. का मुद्दा एक महत्वपूर्ण मुद्दा है इसे गंभीरता से लिया जायेगा तो इससे केबल टी.वी. चैनल इंडस्ट्री का विकास हो पायेगा.
                                                            -अजामिल है ा ेशक  nा ह्लं   a inidhitvसामाजिक kमें सक्षम है ै कि बार्क

शनिवार, 20 अक्टूबर 2012

माओ की असलियत ?

भारत-चीन युद्ध के 20 अक्टूबर को 50 साल पूरे हो रहे हैं। आठ दिन चले इस युद्ध में भारत के 1383 सैनिक मारे गए थे जबकि 1047 घायल हुए थे। 1696 सैनिक लापता हो गए थे और 3968 सैनिकों को चीन ने गिरफ्तार कर लिया था। वहीं चीन के कुल


722 सैनिक मारे गए थे और 1697 घायल हुए थे। एशिया की इन दो ताकतों के बीच जंग के हालात क्‍यों बने, रणनीति तौर पर इसके क्‍या नतीजे हुए, ऐसे तमाम मसलों पर बहस जारी है। लेकिन चीन के ही एक रणनीतिकार ने इस जंग की वजह के बारे में बड़ा खुलासा किया है। चीन की पेंकिंग यूनिवर्सिटी में स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज के डीन वांग जिसि ने कहा है कि चीन के नेता माओ त्से तुंग ने 1962 में भारत के खिलाफ युद्ध का आदेश दिया था ताकि सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी पर उनकी पकड़ बनी रहे। वांग चीनी विदेश मंत्रालय की नीति सलाहकार समिति के भी सदस्य हैं। वांग ने कहा कि खेती आधारित से आधुनिक समाज बनाने का माओ का अभियान 'ग्रेट लीप फारवर्ड' संकट में तब्दील हो गया। हिंसा में लाखों लोगों की जान गई। वांग ने कहा कि इस स्थिति में कम्युनिस्ट पार्टी में माओ की स्थिति कमजोर हो गई। तब सेना पर अपनी पकड़ मजबूत दिखाने के लिए उन्होंने तिब्बत रेजीमेंट के सेना के कमांडर को बुलाया। उससे पूछा कि क्या भारत से युद्ध जीत सकते हो। उसने कहा निश्चित तौर पर। इस पर माओ ने हरी झंडी दे दी।

- जय प्रकाश मानस

मुझे कुछ प्रश्नों के जवाब चाहिए....

जब हमारे पास "गीता" थी तो यह 14 देशों से चोरी करके यह बोझिल सविंधान क्यों बनाया गया?

जब हमारे पास "हिंदी" "संस्कृत" जैसी पवित्र और समृद्ध भाषा थी तो यह अंग्रेजी भाषा क्यों थोपी गई? जब हमारे पास "गुरुकुल प्रणाली" थी तो यह कॉन्वेंट के नाम पर हमें क्यों लुटा गया? हमारे पास आयुर्वेद था तो क्यों नहीं उस पर अनुसंधान किये? हमारे पास पुरात्न अपनी शिक्षा प्रणाली जो ऋषियों मुनियो ने चलाई थी तो क्यों अंग्रेज मैकले की काली शिक्षा व्यवस्था हमारे ऊपर थोपी गई ??

जब हमारे इतिहास में "स्वामी विवेकानंद" जैसे महान विचारशील व्यक्ति थे तो क्यों अंग्रेजों के चरित्र हीन चाटुकार गाँधी परिवार को सब कुछ मान लिया गया??

जब हमारे पास भगत सिंह और उधम सिंह का परिवार था, लौहपुरुष पटेल और श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे महान देशभक्त थे तो क्यों ''नेहरुद्दीन'' को सत्ता दिया गया?

जब हमारे पास वन्देमातरम जैसा ओजस्वी गान था तो क्यों इसे ज्यादा सम्मान नहीं दिया गया?

जब हमारे देश में भगत सिंह, राजगुरू, आजाद, उधम सिंह, लाला लाजपत राए, बाल गंगाधर तिलक, वीर सावरकर और बहुत से देशभक्त थे तो फ़िर क्यों अंग्रेजो गद्दारों के नाम पर देश के समारकों, चौराहों, शहरों आदि के नाम रखे गए ????

जब हमारे देश का इतना सुन्दर नाम भारत__हिन्दुस्तान था क्यो गुलामी का नाम इण्डिया रखा हुआ है ??

-अमित त्रिपाठी

सोमवार, 15 अक्टूबर 2012

राजनीतिक पार्टियों की आमदनी !

मित्रों,अभी कुछ दिनों पहले ही भारत की प्रमुख राजनीतिक पार्टियों की आमदनी के बारे में अखबारों में पढ़ने को मिला। देखकर मेरी आँखें फटी-की-फटी रह गईँ। हर्रे लगे न फिटकरी और रंग भी चोखा होए। तेल भी नहीं लगता और पूड़ी भी पकती जाती है,पकती जाती है। कहना न होगा आज राजनीति भी एक व्यवसाय है जिसमें शुरू में जनता में विश्वास बनाना पड़ता है और कुछ पैसा अपने पास से भी लगाना पड़ता है। एक बार पार्टी जनता के बीच स्थापित हो गई फिर तो बीसों ऊंगलियाँ घी में और सिर चाशनी की कड़ाही में। पारिवारिक वर्चस्व के चलते आज सारे दल चापलूसी के बेहतरीन अड्डे बन गए हैं। कोई भी नेता अपने पार्टी-नेतृत्व के खिलाफ जुबान ही नहीं खोल पाता। विरोध करते ही उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। क्या इस तानाशाही को लोकतंत्र का नाम दिया जा सकता है? जब पार्टियों में ही लोकतंत्र नहीं है तो वे क्या खाकर देश में लोकतंत्र और लोकतांत्रिक-संस्कृति को मजबूत करेंगी?
मित्रों,बैठे-बिठाये इतनी आमदनी तो शायद भारत के सबसे बड़े धनकुबेरों को भी नहीं होती होगी जितनी आज हमारे राजनीतिक दलों को हो रही है। आमदनी भरपूर और जिम्मेदारी कुछ भी नहीं। यहाँ तक कि 20000 रूपये से कम प्राप्त चंदे का विवरण देना भी आवश्यक नहीं और इस पर भी वे पूरा और सही विवरण नहीं देती हैं। कोई 10 प्रतिशत आमदनी का विवरण दे रहा है तो कोई 40 प्रतिशत का और कानून और न्यायालय फिर भी कुछ कर नहीं पा रहे हैं,क्यों? जब केजरीवाल अपने दल का आय-व्यय बताने को तैयार हैं तो अन्य पार्टियों को क्या परेशानी है और क्यों है? यह 20000 रूपये वाली सीमा भी सिर्फ जनता को धोखा देने के लिए है। अगर कोई 20000 रूपये की 20000 किस्तों में पैसा दे तो या फिर इस तरह ही चंदे की रकम दर्ज की जाए तो? इसलिए इन दलों के लिए एक-एक पैसे का हिसाब देना अनिवार्य किया जाए। पार्टियाँ बातें तो आम आदमी की करती हैं और काम पूंजीपतियों का करती हैं। उनको बताना ही चाहिए उनके खजाने में पैसा कहाँ से आता है। वे कौन-से लोग हैं जो उनकी पार्टी के फंड में करोड़ों-करोड़ रुपए देते हैं और क्यों देते हैं? इसके बदले में धनपतियों को क्या मिला,पार्टी ने क्या दिया तभी तो सामने आ पाएगा? दोनों मुद्दे एक-दूसरे से अंतर्गुंथित हैं। करोड़ों रुपए पार्टी फंड में देनेवाले पूंजीपति ऐसा कोई परोपकार की भावना से नहीं करते हैं बल्कि उनकी कुछ-न-कुछ बदले में पाने की उम्मीद लगी रहती है फिर चाहे लाभार्थी दल सत्ता में हो या विपक्ष में। सत्ता में हुआ तो वह धनपति को सीधे लाभ पहुँचाने की स्थिति में होता है जैसे बाड्रा और हरियाणा सरकार या फिर कोयला आबंटन में टाटा,अंबानी और जिंदल को प्राप्त लाभ का उदाहरण भी हम ले सकते हैं और अगर विपक्ष में हुआ तो फिर मंत्री को सिफारिशी पत्र तो लिख ही सकता है जैसा पिछले दिनों गडकरी ने संचेती के लिए लिखा। इतना ही नहीं कई बार तो धनपति राजनीतिक दलों को पैसा देकर सीधे लोकसभा या राज्यसभा का सदस्य ही बन जाते हैं जैसे अनिल अंबानी या विजय माल्या। वैसे हमारे कई परंपरागत नेता भी अब उद्योगों और व्यापार में हाथ आजमाने में पीछे नहीं हैं। चाहे वे दिवंगत विलासराव देशमुख हों या शरद पवार हों या फिर कमलनाथ जी हों। जाहिर है ये लोग भी सरकार में रहते हुए सरकार की नीतियों को अपने व्यापार के हितार्थ प्रभावित करते ही होंगे और बदले में पार्टी फंड में अपना अमूल्य योगदान भी करते होंगे।
         मित्रों,राजनीतिक दलों के लिए आय के स्रोत के साथ-साथ उन्होंने चंदे से प्राप्त धन का व्यय कहाँ-कहाँ किया यह बताना भी कानूनन जरूरी बनाया जाए। हवाई-यात्रा पर खर्च कर दिया या 8000 रूपये प्रति प्लेट वाला खाना खाया गया या पार्टियों और चुनावों के समय दारू की नदी बहा दी गई या इनका दुरूपयोग वोट खरीदने में किया गया? 'माल महाराज के मिर्जा खेले होली' बहुत दिन चल गया अब नहीं चलने वाला है,किसी भी कीमत पर नहीं। वोट हमारा काम तु्म्हारा आखिर कहाँ का न्याय है?
          मित्रों,क्या विडंबना है कि लगभग पूरा देश,पूरा शासन-प्रशासन आरटीआई के दायरे में है और शासन-प्रशासन को चलानेवाले दल ही इसके दायरे में नहीं हैँ। जबकि उनके बारे में जानने का जनता का अधिकार तो और भी ज्यादा है? जनता के लिए य़ह जानना तो और भी ज्यादा जरूरी है कि वे जिन राजनीतिक दलों को वोट दे रहे हैं वे कर क्या रहे हैं? कहीं वे लेन-देन की दुकान तो नहीं बन गए हैं?
           मित्रों, जैसा कि हम इस आलेख की शुरुआत में भी अर्ज कर चुके हैं कि आज लोकतंत्र की सबसे महत्त्वपू्र्ण ईकाई राजनीतिक पार्टियों में ही लोकतंत्र नहीं है। भाजपा और साम्यवादी दलों को छोड़कर सारे दल पारिवारिक कंपनियों की तरह हैं। पार्टियों का दुकानों में बदल जाना और वो भी खानदानी दुकानों में किसी भी तरह से भारतीय लोकतंत्र की प्रगति की दिशा में स्वस्थ गतिविधि नहीं है। जब जी चाहा पार्टी का संविधान बदल दिया। यह अधिकार उनको दिया ही क्यों गया है और कैसे दिया जा सकता है? इन दलों के हित सिर्फ इनके व्यक्तिगत हित नहीं हैं बल्कि इनसे हमारे देश और प्रदेशों के हित भी प्रभावित होते हैं,जुड़े हुए हैं। हमारे देश में एक ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि जिससे सारे दलों के लिए एक समान नियम हों। जैसे कि पार्टी के पंजीकृत-कार्यकर्ता सीधे पार्टी-पदाधिकारियों का चुनाव करें। जैसे कि कोई व्यक्ति या उसका रक्त-संबंधी लगातार एक या दो बार से ज्यादा एक ही पद को धारण नहीं कर पाए। ऐसी व्यवस्था हमारे यहाँ प्राचीन काल में भी थी। संगम काल में या चोल-शासन में तमिलनाडु में स्थानीय-निकायों में एक ही व्यक्ति या उसका रक्त-संबंधी लगातार दो सालों तक एक ही पद के लिए चुना नहीं जा सकता था। ऐसा नहीं होता था कि खुद पद से हटना पड़े तो भाई,लड़के या पत्नी को बिठा दिया। जब ऐसा प्राचीन काल में हो सकता था तो अब ऐसा क्यों संभव नहीं है?
मित्रों,सिर्फ व्यवस्था बना देने से भी कुछ नहीं होगा यह भी देखना पड़ेगा कि नियमों-उपनियमों का अनुपालन हो भी रहा है कि नहीं। तो इसके लिए या तो चुनाव आयोग को ही अधिकृत कर दिया जाए या ज्यादा अच्छा हो कि किसी पूरी तरह से स्वायत्त-निकाय की स्थापना की जाए जिसके अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति की प्रक्रिया पूरी तरह से पारदर्शी हो और जिसकी चयन समिति में न तो सरकार का बहुमत हो और न तो अन्य राजनीतिक दलों का ही। इसके साथ ही नियमों-कानूनों का उल्लंघन करने पर पार्टियों के लिए सख्त सजा का भी प्रावधान होना चाहिए। उनकी मान्यता रद्द कर देनी चाहिए और उनके प्रमुख नेताओं के चुनाव लड़ने पर आजीवन प्रतिबंध लगा दिया जाना चाहिए।
मित्रों,आर्थिक सुधारों से कम महत्वपूर्ण नहीं हैं ये प्रस्तावित और विलंबित सुधार क्योंकि इन सुधारों पर ही हमारे लोकतंत्र का भविष्य टिका हुआ है न कि आर्थिक सुधारों पर। दलों के संचालन और नियंत्रण के मामले में पारदर्शिता लाना जरूरी ही नहीं महाजरूरी है क्योंकि ऐसा नहीं होने से ही देश-प्रदेश में भ्रष्टाचार और धनिकतंत्र को बढ़ावा मिलता है। इसके चलते ही राजनीति आज एक गंदी गाली बनकर रह गई है। इस तरह के ऐहतियाती उपायों के बावजूद अगर धनपति चाहें तो पार्टी फंड में पैसा नहीं देकर उसी तरह से पार्टी नेतृत्व को लाभ पहुँचा सकते हैं जैसा कि वाड्रा के मामले में डीएलएफ ने किया फिर भी इससे काफी हद तक राजनीति के क्षेत्र से गंदगी को साफ करने में मदद मिल सकेगी, इसमें सन्देह नहीं। इन उपायों को लागू करने के लिए अगर संविधान में हजारों संशोधन भी करना पड़े,यहाँ तक कि संविधान को ही फिर से लिखना पड़े तो वह भी किया जाए क्योंकि ऐसा किए बिना राह से भटके हुए भारतीय लोकतंत्र को फिर से पटरी पर लाया ही नहीं जा सकता।

- ब्रज किशोर सिंह 

राजनीति भी एक व्यवसाय है

मित्रों,अभी कुछ दिनों पहले ही भारत की प्रमुख राजनीतिक पार्टियों की आमदनी के बारे में अखबारों में पढ़ने को मिला। देखकर मेरी आँखें फटी-की-फटी रह गईँ। हर्रे लगे न फिटकरी और रंग भी चोखा होए। तेल भी नहीं लगता और पूड़ी भी पकती जाती है,पकती जाती है। कहना न होगा आज राजनीति भी एक व्यवसाय है जिसमें शुरू में जनता में विश्वास बनाना पड़ता है और कुछ पैसा अपने पास से भी लगाना पड़ता है। एक बार पार्टी जनता के बीच स्थापित हो गई फिर तो बीसों ऊंगलियाँ घी में और सिर चाशनी की कड़ाही में। पारिवारिक वर्चस्व के चलते आज सारे दल चापलूसी के बेहतरीन अड्डे बन गए हैं। कोई भी नेता अपने पार्टी-नेतृत्व के खिलाफ जुबान ही नहीं खोल पाता। विरोध करते ही उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। क्या इस तानाशाही को लोकतंत्र का नाम दिया जा सकता है? जब पार्टियों में ही लोकतंत्र नहीं है तो वे क्या खाकर देश में लोकतंत्र और लोकतांत्रिक-संस्कृति को मजबूत करेंगी?
मित्रों,बैठे-बिठाये इतनी आमदनी तो शायद भारत के सबसे बड़े धनकुबेरों को भी नहीं होती होगी जितनी आज हमारे राजनीतिक दलों को हो रही है। आमदनी भरपूर और जिम्मेदारी कुछ भी नहीं। यहाँ तक कि 20000 रूपये से कम प्राप्त चंदे का विवरण देना भी आवश्यक नहीं और इस पर भी वे पूरा और सही विवरण नहीं देती हैं। कोई 10 प्रतिशत आमदनी का विवरण दे रहा है तो कोई 40 प्रतिशत का और कानून और न्यायालय फिर भी कुछ कर नहीं पा रहे हैं,क्यों? जब केजरीवाल अपने दल का आय-व्यय बताने को तैयार हैं तो अन्य पार्टियों को क्या परेशानी है और क्यों है? यह 20000 रूपये वाली सीमा भी सिर्फ जनता को धोखा देने के लिए है। अगर कोई 20000 रूपये की 20000 किस्तों में पैसा दे तो या फिर इस तरह ही चंदे की रकम दर्ज की जाए तो? इसलिए इन दलों के लिए एक-एक पैसे का हिसाब देना अनिवार्य किया जाए। पार्टियाँ बातें तो आम आदमी की करती हैं और काम पूंजीपतियों का करती हैं। उनको बताना ही चाहिए उनके खजाने में पैसा कहाँ से आता है। वे कौन-से लोग हैं जो उनकी पार्टी के फंड में करोड़ों-करोड़ रुपए देते हैं और क्यों देते हैं? इसके बदले में धनपतियों को क्या मिला,पार्टी ने क्या दिया तभी तो सामने आ पाएगा? दोनों मुद्दे एक-दूसरे से अंतर्गुंथित हैं। करोड़ों रुपए पार्टी फंड में देनेवाले पूंजीपति ऐसा कोई परोपकार की भावना से नहीं करते हैं बल्कि उनकी कुछ-न-कुछ बदले में पाने की उम्मीद लगी रहती है फिर चाहे लाभार्थी दल सत्ता में हो या विपक्ष में। सत्ता में हुआ तो वह धनपति को सीधे लाभ पहुँचाने की स्थिति में होता है जैसे बाड्रा और हरियाणा सरकार या फिर कोयला आबंटन में टाटा,अंबानी और जिंदल को प्राप्त लाभ का उदाहरण भी हम ले सकते हैं और अगर विपक्ष में हुआ तो फिर मंत्री को सिफारिशी पत्र तो लिख ही सकता है जैसा पिछले दिनों गडकरी ने संचेती के लिए लिखा। इतना ही नहीं कई बार तो धनपति राजनीतिक दलों को पैसा देकर सीधे लोकसभा या राज्यसभा का सदस्य ही बन जाते हैं जैसे अनिल अंबानी या विजय माल्या। वैसे हमारे कई परंपरागत नेता भी अब उद्योगों और व्यापार में हाथ आजमाने में पीछे नहीं हैं। चाहे वे दिवंगत विलासराव देशमुख हों या शरद पवार हों या फिर कमलनाथ जी हों। जाहिर है ये लोग भी सरकार में रहते हुए सरकार की नीतियों को अपने व्यापार के हितार्थ प्रभावित करते ही होंगे और बदले में पार्टी फंड में अपना अमूल्य योगदान भी करते होंगे।
         मित्रों,राजनीतिक दलों के लिए आय के स्रोत के साथ-साथ उन्होंने चंदे से प्राप्त धन का व्यय कहाँ-कहाँ किया यह बताना भी कानूनन जरूरी बनाया जाए। हवाई-यात्रा पर खर्च कर दिया या 8000 रूपये प्रति प्लेट वाला खाना खाया गया या पार्टियों और चुनावों के समय दारू की नदी बहा दी गई या इनका दुरूपयोग वोट खरीदने में किया गया? 'माल महाराज के मिर्जा खेले होली' बहुत दिन चल गया अब नहीं चलने वाला है,किसी भी कीमत पर नहीं। वोट हमारा काम तु्म्हारा आखिर कहाँ का न्याय है?
          मित्रों,क्या विडंबना है कि लगभग पूरा देश,पूरा शासन-प्रशासन आरटीआई के दायरे में है और शासन-प्रशासन को चलानेवाले दल ही इसके दायरे में नहीं हैँ। जबकि उनके बारे में जानने का जनता का अधिकार तो और भी ज्यादा है? जनता के लिए य़ह जानना तो और भी ज्यादा जरूरी है कि वे जिन राजनीतिक दलों को वोट दे रहे हैं वे कर क्या रहे हैं? कहीं वे लेन-देन की दुकान तो नहीं बन गए हैं?
           मित्रों, जैसा कि हम इस आलेख की शुरुआत में भी अर्ज कर चुके हैं कि आज लोकतंत्र की सबसे महत्त्वपू्र्ण ईकाई राजनीतिक पार्टियों में ही लोकतंत्र नहीं है। भाजपा और साम्यवादी दलों को छोड़कर सारे दल पारिवारिक कंपनियों की तरह हैं। पार्टियों का दुकानों में बदल जाना और वो भी खानदानी दुकानों में किसी भी तरह से भारतीय लोकतंत्र की प्रगति की दिशा में स्वस्थ गतिविधि नहीं है। जब जी चाहा पार्टी का संविधान बदल दिया। यह अधिकार उनको दिया ही क्यों गया है और कैसे दिया जा सकता है? इन दलों के हित सिर्फ इनके व्यक्तिगत हित नहीं हैं बल्कि इनसे हमारे देश और प्रदेशों के हित भी प्रभावित होते हैं,जुड़े हुए हैं। हमारे देश में एक ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि जिससे सारे दलों के लिए एक समान नियम हों। जैसे कि पार्टी के पंजीकृत-कार्यकर्ता सीधे पार्टी-पदाधिकारियों का चुनाव करें। जैसे कि कोई व्यक्ति या उसका रक्त-संबंधी लगातार एक या दो बार से ज्यादा एक ही पद को धारण नहीं कर पाए। ऐसी व्यवस्था हमारे यहाँ प्राचीन काल में भी थी। संगम काल में या चोल-शासन में तमिलनाडु में स्थानीय-निकायों में एक ही व्यक्ति या उसका रक्त-संबंधी लगातार दो सालों तक एक ही पद के लिए चुना नहीं जा सकता था। ऐसा नहीं होता था कि खुद पद से हटना पड़े तो भाई,लड़के या पत्नी को बिठा दिया। जब ऐसा प्राचीन काल में हो सकता था तो अब ऐसा क्यों संभव नहीं है?
मित्रों,सिर्फ व्यवस्था बना देने से भी कुछ नहीं होगा यह भी देखना पड़ेगा कि नियमों-उपनियमों का अनुपालन हो भी रहा है कि नहीं। तो इसके लिए या तो चुनाव आयोग को ही अधिकृत कर दिया जाए या ज्यादा अच्छा हो कि किसी पूरी तरह से स्वायत्त-निकाय की स्थापना की जाए जिसके अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति की प्रक्रिया पूरी तरह से पारदर्शी हो और जिसकी चयन समिति में न तो सरकार का बहुमत हो और न तो अन्य राजनीतिक दलों का ही। इसके साथ ही नियमों-कानूनों का उल्लंघन करने पर पार्टियों के लिए सख्त सजा का भी प्रावधान होना चाहिए। उनकी मान्यता रद्द कर देनी चाहिए और उनके प्रमुख नेताओं के चुनाव लड़ने पर आजीवन प्रतिबंध लगा दिया जाना चाहिए।
मित्रों,आर्थिक सुधारों से कम महत्वपूर्ण नहीं हैं ये प्रस्तावित और विलंबित सुधार क्योंकि इन सुधारों पर ही हमारे लोकतंत्र का भविष्य टिका हुआ है न कि आर्थिक सुधारों पर। दलों के संचालन और नियंत्रण के मामले में पारदर्शिता लाना जरूरी ही नहीं महाजरूरी है क्योंकि ऐसा नहीं होने से ही देश-प्रदेश में भ्रष्टाचार और धनिकतंत्र को बढ़ावा मिलता है। इसके चलते ही राजनीति आज एक गंदी गाली बनकर रह गई है। इस तरह के ऐहतियाती उपायों के बावजूद अगर धनपति चाहें तो पार्टी फंड में पैसा नहीं देकर उसी तरह से पार्टी नेतृत्व को लाभ पहुँचा सकते हैं जैसा कि वाड्रा के मामले में डीएलएफ ने किया फिर भी इससे काफी हद तक राजनीति के क्षेत्र से गंदगी को साफ करने में मदद मिल सकेगी, इसमें सन्देह नहीं। इन उपायों को लागू करने के लिए अगर संविधान में हजारों संशोधन भी करना पड़े,यहाँ तक कि संविधान को ही फिर से लिखना पड़े तो वह भी किया जाए क्योंकि ऐसा किए बिना राह से भटके हुए भारतीय लोकतंत्र को फिर से पटरी पर लाया ही नहीं जा सकता।