शुक्रवार, 17 अगस्त 2012

क्या ये भ्रष्टाचार के श्रेणी में नहीं आता ?

विभिन्न पत्रकारिता संस्थानों से डिग्री, डिप्लोमा हासिल कर पत्रकारिता की दुनिया में एक दिन छा जाने और अपना मुकाम बनाने का सपना देखने वाले हजारों-हजार छात्रों को शायद ही इस बात का एहसास हो कि इलेक्ट्रानिक मीडिया में सौ से ज्यादा अच्छे-बुरे चैनल होने के बावजूद इस इण्डस्ट्री में काम के अवसर लगातार कम होते जा रहे हैं। आर्थिक मंदी के बाद इस क्षेत्र में नफा-नुकसान के जो हालात बने हैं, उसने पूरी दुनिया को व्यवस्था और कायदे-कानून का पाठ सिखाने वाले टीवी चैनलों को खुद ही अफरा-तफरी और अव्यवस्था में फंसा दिया है। जाहिर है कि पत्रकारिता का विधिवत् प्रशिक्षण लेकर इस क्षेत्र में आने वाले नवोदित पत्रकारों के सपनों के टूट जाने की संभावना शत्-प्रतिशत हो गई है।
टेलीविजन चैनलों ने बढ़ते आर्थिक दबावों के मद्देनजर न सिर्फ अपनी कार्य-संस्कृति में परिवर्तन किया है, बल्कि ये चैनल सारी मर्यादायें तोड़कर एक रुपये में चार अठन्नी भुनाने के फार्मूले पर चल रहे हैं। ऐसे आदमी की तलाश की जा रही है, जो कई काम एक साथ निपटाने की क्षमता रखता हो। शायद यही वजह है कि कल तक जो समाचार चैनल कवरेज के दौरान कैमरामैन को जरुरी मानते थे, वे आज संवाददाता से ही कैमरा हैण्डल करने की अपेक्षा कर रहे हैं, और इस काम के लिए वे संवाददाता को अलग से कोई पारिश्रमिक भी नहीं देना चाहते।
समाचार चैनलों की स्थिति तो बहुत खराब है। इन चैनलों ने देश भर में जगह-जगह अपने संवाददाता और स्ट्रिंगर्स तो बना लिए हैं, लेकिन काम के बदले में टीवी चैनल्स इन्हे जो पारिश्रमिक दे रहे हैं, वह बेहद शर्मनाक है। कुछ समाचार चैनलों ने आर्थिक मुश्किलों से निपटने के लिए एक अलग ही रणनीति बना रखी है। ये चैनल अपने यहाँ कार्यरत पत्रकारों को पे-स्लिप पर बहुत कम तनख्वाहें देते हैं, लेकिन अनेक भत्तों के नाम पर अलग से इतना पैसा दे देते हैं जो कभी-कभी उनके वेतन से ज्यादा हो जाता है। इस तरह ये टेलीविजन चैनल टैक्स तो बचाते ही हैं, कर्मचारी अंशदान निधि में भी उन्हे कम हिस्सा देना पड़ता है। दूसरी ओर यह भी देखने में आ रहा है, कि तकनीकि विकास का फायदा टीवी चैनल तो उठा रहे हैं, लेकिन पत्रकारों के हाथ कुछ नहीं लग रहा है। जाहिर है कि ऐसी स्थिति में पत्रकारिता मौजूदा दौर में शांत मन से काम करने वाला मिशन नहीं रह गया है, बल्कि यहाँ एक अटूट संघर्ष की स्थिति बनी हुई है। टीवी पत्रकारों और स्ट्रिंगर्स पर इतना दबाव बना दिया गया है कि मानसिक-रुप से स्वस्थ रहने की संभावना इस पेशे में कम होती जा रही है।
इस बाजार में कुछ वरिष्ठ पत्रकार तो एक-दूसरे को धकेलते-धकियाते अपना अस्तित्व किसी तरह बनाए हुए हैं, लेकिन युवा टीवी पत्रकारों की हालत बहुत पतली हो गई है। प्रशिक्षण के नाम पर लगभग सभी प्रतिष्ठित चैनल छः-छः महीने के लिए इन युवा पत्रकारों को ट्रेनिंग पर रखते हैं, और फिर जैसे ही मतलब पूरा हो जाता है, चैनल उन्हे अयोग्य बताकर या राजनीति करने का आरोप लगाकर निकाल देते हैं। ऐसे में समर्पित भावना से काम करने वाले पत्रकारों के उत्साह की हत्या हो जाती है। इन टीवी चैनलों में बैठे आका इन दिनों मुफ्त में काम करने वाले मीडिया मजदूरों की फौज बनाने में लगे हुए हैं। इन चैनलों में काम करने की शर्त सिर्फ इतनी है, कि पैसे की मांग कभी मत करो। अत्याचार की सीमा अब यहाँ तक हो गई है, कि टीवी चैनलों में भी वेतन का कोई मानक नहीं रह गया है। जिसके साथ सौदा जितने में पट गया वह उतने में रख लिया गया।
टीवी चैनलों की नौकरी में ग्लैमर इतना है, कि मुफ्त में काम करने वाला टीवी पत्रकार वेतन की चर्चा होने पर कम से कम बीस हजार रुपये प्रतिमाह तो बताता ही है। दुःख इस बात का है कि वह भी जानता है कि झूठ के सहारे जिंदगी नहीं काटी जा सकती। ये विडम्बना ही है कि कैमरे के सामने खड़ा होकर अन्याय के खिलाफ दहाड़ने वाला पत्रकार या रिपोर्टर खुद इन टीवी चैनलों में अन्याय का शिकार हो रहा है, और चुप्पी साधे हुए है, और कमाल देखिए कि पत्रकार बिरादरी में एक-दूसरे के लिए लड़ने, संघर्ष करने का जज्बा भी नहीं बचा है। हालात ये हो गए हैं कि लोग अपनी ही नौकरी बचाने में लगे हुए हैं।
आज टेलीविजन चैनलों के साथ ग्लैमर, ताकत, पैसा और सत्ता सभी कुछ है, इसलिए लोग इस भ्रष्ट प्लेटफार्म पर नाचकर भी संतोष का अनुभव कर रहे हैं। लेकिन क्या ये संतोष सचमुच संतोष देने वाला है? इससे केवल एक बेचैनी पैदा हो रही है। तमाशा देखिए कि कार्पोरेट जगत की लगभग सभी बड़ी कम्पनियां विधिवत् विज्ञापन करके कर्मचारियों की भर्ती करती हैं। बकायदा कैम्पस इण्टरव्यू होता है, लेकिन टेलीविजन चैनलों के लिए जैसे ये नियम बना ही नहीं है, कर्मचारी भर्ती के सिलसिले में टीवी चैनलों के पास कोई व्यवस्थित और पारदर्शी आधार है ही नहीं। अधिकतर चैनलों में संपर्को और जान-पहचान के आधार पर भर्तियाँ हो रही हैं। सिफारिशों का जितना सम्मान टीवी चैनलों में है, उतना किसी और सेक्टर में नहीं दिखाई देता। हद तो यहाँ तक हो गई है कि टीवी चैनल इन नए पत्रकारों को सिर्फ सुन्दर चेहरा देखकर भर्ती कर ले रहे हैं। उदारता इतनी है कि ये इन नए पत्रकारों को सहयोग के रुप में भी कुछ आर्थिक मदद नहीं करते और जब चाहते हैं, हटा देते हैं। फार्मूला केवल एक ही है कि कम से कम लोगों से अधिक से अधिक काम निकाला जाए। ऐसे में नए पत्रकार का कोई जीवन नहीं रह जाता। काम के घंटे अनियमित और लम्बे होते हैं और वेतन होता है पांच हजार। करना हो तो करो वरना चलते बनो, लाईन में बहुत लोग खड़े हैं।
दुःखद पहलु तो यह भी है कि ये पत्रकारिता पढ़ाने वाले अध्यापक भी टेलीविजन चैनलों की हकीकत को छात्रों से छुपाकर रखते हैं, क्योंकि उन्हे पता है कि इस हकीकत के सार्वजनिक होते ही उनकी पत्रकारिता की दुकान में भी ताला लग जायेगा। गौरतलब है कि देश भर में चल रही पत्रकारिता सिखाने वाली दुकानें हजारों की संख्या में चल रहीं हैं, और ये हजारों की संख्या में ही प्रतिवर्ष तथाकथित पत्रकार भी बनाती हैं। आश्चर्य इस बात का है कि इनमें से अधिकतर पत्रकारिता संस्थानों में काम कर रहे अध्यापकों के पास पत्रकारिता की मामूली-सी डिग्री भी नहीं है। ये अध्यापक खुद इधर-उधर से सर्टिफिकेट और डिप्लोमा कोर्स करके पत्रकारिता की डिग्री बेंचने में सहयोग कर रहे हैं। यह एक तरह का छात्रों के साथ धोखा है। छात्रों को ये बताया जाना चाहिए कि टीवी चैनलों में दो लाख और चार लाख रुपया प्रतिमाह वेतन लेने वाले पत्रकारों की संख्या पांच प्रतिशत भी नहीं है। ऐसे लोगों को किसी भी स्थिति में आदर्श नहीं माना जा सकता।
टीवी चैनलों का एक और घटिया पक्ष पिछले दिनों उजागर हुआ है। अधिकतर टीवी चैनलों ने प्रशिक्षण के नाम पर खुद ही अपने इन्स्टीट्यूट खोल लिए हैं और वे प्रशिक्षण के बाद अपने चैनल में नौकरी देने का लालच देकर टीवी पत्रकारिता में आने के इच्छुक छात्रों से मोटी रकम वसूल कर रहे हैं। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो अधिकतर छात्रों को ये चैनल नौकरी पर नहीं रखते। कुछ टीवी चैनलों ने समाचार चैनलों की फुटेज बेंचने का धंधा भी शुरु कर दिया है। कुल मिलाकर उद्देश्य अब टीवी चैनलों का अधिक से अधिक कमाई करने का हो गया है। सब महसूस करते हैं कि ये सभी परिवर्तन उचित नहीं है।
यह सच है कि टीवी चैनल इण्डस्ट्री को कभी न कभी एक बड़े बाजार में बदलना ही था, लेकिन अपने देश में यह बच्चा तभी बिगड़ गया जब ये घुटने-घुटने चल रहा था। टीवी चैनलों ने सारी बुराईयों को आत्मसात समय से पहले ही कर लिया है, इसलिए अब इसमें अच्छी बातें, संस्कार कब और कैसे दाखिल होंगे इसे अभी से कुछ भी नहीं बताया जा सकता। लेकिन ये तय है कि प्रयोग के नाम पर टीवी चैनलों में कुछ भी किया जाए, लेकिन जब तक प्रसारण सामग्री की गुणवत्ता में सुधार नहीं आयेगा तब तक इस माध्यम से कोई उम्मीद नहीं की जानी चाहिए। गुणवत्ता तभी बनेगी जब पत्रकारों की मानसिक, शारीरिक और आर्थिक स्थितियों को सुधारने की दिशा में भी सोचा जायेगा। पत्रकार स्वस्थ नहीं होंगे तो स्वस्थ पत्रकारिता कैसे होगी ?

- लखन मिश्र